बंगनामा: आमी बांग्ला भालो कोरे बोलते पारी

सरकारी अधिकारी बनने के बाद राज्य की भाषा सीखना ज़रूरी होता है पर बचपन से बांग्ला परिवेश में पले-बढ़े होने के चलते मुझे लगता था कि मैं इसे धाराप्रवाह बोल सकता हूं, इसलिए इसे सीखने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए. पर अहंकार आने के साथ ठोकर खाना भी निश्चित हो जाता है. बंगनामा की इक्कीसवीं क़िस्त.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Nibedita Sen/facebook)

भारतीय प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति के बाद अक्सर आप पाते हैं कि आपको किसी ऐसे राज्य में नियुक्त किया गया है जहां की भाषा आपकी मातृभाषा से भिन्न है. आपको एक नई भाषा सीखने का मौक़ा मिलता है, हालांकि उसमें सक्षम होने में कुछ समय लग सकता है. लेकिन जब मैं 1990 की गर्मियों में बंगाल प्रशिक्षण के लिए पहुंचा तब मेरे सामने ऐसी कोई चुनौती न थी. बांग्ला का अक्षर ज्ञान तो मुझे नियुक्ति के बाद राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में हुआ था परंतु बोलना मैंने बचपन में ही सीख लिया था.

हमारे आस-पड़ोस में तीन-चार बंगाली परिवार रहते थे जिनके बच्चे मेरे संगी-साथी थे. अपने जीवन के पहले नौ साल तक घर में हिंदी परंतु मुहल्ले में मैं अधिकतर बांग्ला बोलता था. इसके बाद स्कूल और कॉलेज में कई बंगाली मित्र बनते गए और बांग्ला से मेरा संबंध बना रहा. इसलिए जब मेरा ज़िला प्रशिक्षण उत्तर 24 परगना में शुरू हुआ तो दफ़्तर में या बाहर मुझे बातचीत में कहीं भी असुविधा नहीं हुई.

काम के सिलसिले में मुझे बैठकों में विस्तार से बोलना पड़ता था. संभवतः इन्हीं वजहों से मुझे लगने लगा था कि अब मैं इस राज्य की भाषा धाराप्रवाह बोल सकता हूं और मुझे बांग्ला सीखने में बहुत समय नष्ट नहीं करना चाहिए. जैसा कहा गया है, अहंकार होने के साथ ही ठोकर खाना भी निश्चित हो जाता है.

सितंबर 1991 की एक खूबसूरत सुबह थी. मैंने कुछ सप्ताह पूर्व ही मिदनापुर ज़िले के कॉनटाई, सबडिवीज़न के एसडीओ का पद भार संभाला था. आज मैं बामुनिया ग्राम पंचायत के रास्ते में था. साक्षरता अभियान के प्रचार-प्रसार के लिए नौ बजे वहां से स्कूल के बच्चों की एक पद यात्रा आरंभ होने वाली थी. उसमें हिस्सा लेने के लिए वहां के पंचायत प्रधान महाशय ने मुझे भी आमंत्रित किया था.

संकरी, नीची, ग्रामीण सड़क पर मंद गति से बढ़ती हुई गाड़ी की खिड़कियों से रास्ते के दोनों ओर दूर-दूर तक हरे-भरे धान के खेत दिख रहे थे. तभी मैंने देखा कि बायीं ओर कुछ दूर पर हिंदी फ़िल्मों के स्वप्न दृश्य की तरह एक विशालकाय कत्थई पतवार वाली नाव लहराते धान की सतह पर शनैः शनैः तैरती हुई गुजर रही है. ड्राइवर से पूछा तो पता चला कि हम लोग रसूलपुर नदी के किनारे चल रहे हैं. मुझे ध्यान आया कि रसूलपुर वही नदी है जिसके किनारे एक काली मंदिर के पास रह कर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘कपाल कुंडला’ की रचना की थी और उसे वहीं स्थित भी किया था.

इस अविस्मरणीय दृश्य को पीछे छोड़, कुछ देर में हम खेतों से निकल, कुछ बस्तियों और एक बड़े गांव को पारकर वहां के ग्राम पंचायत के दफ़्तर पर पहुंच गए. लाउडस्पीकर पर साक्षरता के प्रेरणा गान बज रहे थे और दफ़्तर के चारों ओर स्कूल के बच्चे जमा थे. अधिकतर बच्चे क़तार बनाए खड़े बातें कर रहे थे, कुछ हो-हुल्लड़ तो कुछ छूआ-छुई खेल रहे थे. कुछ शिक्षक भी उनके बीच बसंती आकाश में काले बादलों की तरह मंडरा रहे थे.

प्रधान महोदय ने मेरा परिचय हाईस्कूल के हेडमास्टर मोशाय तथा अन्य कुछ शिक्षकों से कराया. फिर उनसे साक्षरता अभियान के बारे में बातें होने लगीं. समय निकलता जा रहा था. मैंने पहले ही प्रधान महोदय के ‘एक कप चाय’ का प्रस्ताव विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था.

सौहार्दपूर्ण वार्तालाप में कुछ समय बीता तो फिर मैंने उनसे पूछा कि क्या पदयात्रा अब शुरू करें? उन्होंने कहा, ‘माइक आश्चे. आपनी दुटो कथा बोलबेन ना? बाच्चा रा आपनाके शुने अनुप्रेरित होबे (माइक आ रहा है. आप क्या दो शब्द नहीं कहेंगे? बच्चे आपको सुनकर अनुप्रेरित होंगे).’ मैंने समझाने की कोशिश की कि हमें समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए, परंतु वह मानने को तैयार न हुए.

तभी एक साइकिल हाज़िर हुई जिसके हैंडल पर लाउडस्पीकर और कैरियर पर उसे चलाने वाला यंत्र बंधा था. एक तार के सहारे यंत्र के साथ एक माइक जुड़ा था जो एक मास्टर मोशाय (महाशय) ने अपने क़ब्ज़े में कर रखा था. पदयात्रा का उद्घाटन समारोह आरंभ हुआ.

सर्वप्रथम मास्टर मोशाय ने तालियों की बौछारों के बीच हेड मास्टर मोशाय को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया. हेडमास्टर मोशाय अपने शैक्षिक जीवन, साक्षरता की उपयोगिता और साक्षरता अभियान के सामाजिक महत्व के बारे में पंद्रह-बीस मिनट तक दो-दो शब्द कहते चले गए. सूरज आकाश में चढ़ रहा था और मुझे यह विलंब खटकने लगा था. जब मास्टर मोशाय ने मेरा परिचय देकर मुझे दो शब्द कहने तथा पदयात्रा का उद्घाटन करने के लिए माइक थमाया, तो मैंने उस ग्राम पंचायत में साक्षरता अभियान से जुड़े सभी लोगों को, विशेष रूप से पद यात्रा में शामिल बच्चों को, धन्यवाद दिया और अधिकाधिक लोगों की सहभागिता के लिए अपील कर, पदयात्रा के उद्घाटन की घोषणा करके अपना भाषण तीन-चार मिनटों में ख़त्म कर दिया.

प्रधान महाशय इतने छोटे भाषण के लिए उद्यत न थे परंतु संभल गए और माइक उन्होंने थाम लिया. इसके बाद वे शायद मेरे लघु भाषण की कमी पूरी करने के लिए बीस मिनट तक साक्षरता की महिमा पर बोलते रहे. उनकी सारी बातें तो अब याद नहीं किंतु उनके पहले कुछ वाक्य आज भी मेरे कानों में गूंज रहे हैं. उन्होंने आरंभ किया, ‘एसडीओ साहब ने बहुत छोटा भाषण दिया है क्योंकि वह हमारे राज्य में नए आए हैं और उन्हें बांग्ला अभी ठीक से नहीं आती. धीरे-धीरे सीख जाएंगे…’

मुझे कुछ और झटके इस घटना के छह-सात महीने बाद लगे. पश्चिम बंगाल में नवागत अखिल भारतीय सेवाओं- आईएएस, आईपीएस और आईएफएस, के हम लगभग बीस नवनियुक्त अधिकारी मार्च 1992 की एक दोपहर कलकत्ता में राज्य के लोक सेवा आयोग भवन के एक परीक्षा हॉल में बैठे हुए थे. अगली पदोन्नति  के लिए हम सब को विभागीय परीक्षाओं में क़ानून, लेखा-विधि तथा बांग्ला (बंगाली अफ़सरों को हिंदी) के पेपर पास करना अनिवार्य था.

बांग्ला की परीक्षा का यह दूसरा सत्र था. आयोग के एक परीक्षक बंकिम चंद्र चट्टोपादध्यय की पुस्तक ‘कपाल कुंडला’ से श्रुतिलेखन करवा रहे थे. मैं भी ध्यान से सुनकर लिखने की कोशिश कर रहा था. चूंकि यह जानी हुई बात थी कि बांग्ला परीक्षा के कुछ प्रश्न और श्रुतिलेखन ‘कपाल कुंडला’ से आएंगे, परीक्षा से पहले अपने वरिष्ठ अफ़सरों के सुझाव के अनुसार मैं इसे कई बार उलट-पलट चुका था, परंतु बांग्ला साहित्य के इस जाने-माने उपन्यास को उस समय अंत तक पढ़ना मेरे बस का काम न था.

यहां यह बताना ज़रूरी है कि बोलचाल की बांग्ला तथा साहित्य की बांग्ला में अनेक अंतर है. बातचीत की भाषा, जिसे चलित बांग्ला भी कहते हैं, बोलने और सुनने में अत्यंत ही सरल होती है किंतु साहित्य में इसका प्रयोग नहीं किया जाता है. लेख, कहानी, इत्यादि लिखते वक्त ‘साधु’ बांग्ला का व्यवहार होता है, जो लिखने और पढ़ने दोनों में ही क्लिष्ट होती है. एक ही शब्द बोलने और लिखने में भिन्न हो जाता है, उसकी वर्तनी भी बदल जाती है.

श्रुति लेखन के समय अधिकतर शब्द तो मैं समझ रहा था पर चूंकि यह किताब साधु बांग्ला में लिखी गई थी, कुछ शब्द पल्ले नहीं पड़ रहे थे. विशेष रूप से एक शब्द ऐसा था जो बार-बार आ रहा था परंतु जिससे मैं पूर्णतः अपरिचित था- वह शब्द था ‘दाँड़ी’. बिना समझे हुए भी मैं ‘दाँड़ी’ लिखता चला गया. श्रुति लेखन शेष होने के बाद हम सब परीक्षा हॉल से बाहर आए तो बातें होने लगी. किसी ने मुझसे पूछा कि पेपर कैसा गया. मैंने कहा कि वैसे तो अच्छा ही हुआ है पर ‘दाँड़ी’ का क्या अर्थ है? एक मित्र ने कहा, ‘तुम्हें नहीं पता? दाँड़ी तो बांग्ला में पूर्णविराम को कहते हैं.’

मुझे तभी शक हो गया कि मुझे बांग्ला का पेपर शायद फिर से लिखना होगा.

श्रुति लेखन के ठीक बाद मौखिक बांग्ला की परीक्षा थी. इसमें मुझे किसी परेशानी की अपेक्षा न थी. अधेड़, चश्माधारी, तीखी मूंछ वाले बांग्ला के परीक्षक महोदय ने मुझसे नाम इत्यादि जानने के बाद पूछा, ‘आपनी बांग्ला बोलते पारेन (आप क्या बांग्ला बोल सकते हैं)?’ मैंने उत्तर दिया, ‘हैं, आमी बांग्ला भालो कोरे बोलते पारी (मैं बांग्ला अच्छी तरह बोल सकता हूं).

परीक्षक महोदय ने क्षण भर के लिए मुझे घूरा, फिर सौम्य चेहरा बनाते हुए सामने मेज़ पर रखे हुए ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’ अख़बार को खोल कर मेरी ओर सरकाया. फिर संपादकीय की ओर इंगित करते हुए कहा कि इसे पढ़िए.

इस वार के लिए मैं तैयार न था. सभी ने कहा था कि मौखिक बांग्ला में परीक्षक महज़ कुछ सहज प्रश्न भर करते हैं जिसका आसानी से उत्तर दिया जा सकता है. यहां तो मामला गंभीर हो गया था. यह ठीक था कि मैं बांग्ला बेधड़क बोल सकता था, बातचीत कर सकता था. परंतु बांग्ला पढ़ना तो मैंने अभी ही आरंभ किया था. तिस पर ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’ बांग्ला अख़बारों में अपनी साधु बांग्ला के लिए जाना जाता था, विशेषतः उसका संपादकीय.

मैंने अख़बार से नज़र उठाई तो देखा कि मुच्छड़ परीक्षक महोदय आंखें बंदकर एकाग्रता से मुझे सुनने की मुद्रा बनाकर बैठे हुए हैं. किसी तरह अटकते, गिरते-पड़ते मैंने संपादकीय को पढ़ना आरंभ किया और अंत तक लड़खड़ाते हुए पढ़ना बंद किया. तब तक मेरा शक विश्वास में बदल चुका था कि मुझे बांग्ला की दोनों परीक्षाओं के लिए एक बार फिर लोक सेवा आयोग आना पड़ेगा.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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