उस दिन सुबह फोन की घंटी पहली बार बजी लगभग साढ़े नौ बजे. दफ्तर के लिए तैयार होकर मैं बंगले के ऑफिस कक्ष में कुछ फाइलें देख रहा था. मैंने फोन का चोगा उठाया तो टेलीफोन एक्सचेंज में बैठे ऑपरेटर ने मुझे बताया कि जिला मुख्यालय से अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट (एडीएम) बात करेंगे. एडीएम, जो मेरे कॉलेज के सीनियर और मित्र भी थे, ने मुझसे पूछा, ‘तुम्हें पता है क्या, दीघा के बारे में?’
कुछ सप्ताह पूर्व दीघा में एक घटना घट गई थी. मैंने सोचा, अब क्या हुआ दीघा में? और कहा, ‘नहीं, अब क्या हो गया?’
‘मत्स्य मंत्री का फोन आया था. उन्हें कहीं से पता चला है कि समुद्र तट पर कल रात मछुआरों को एक मत्स्य कन्या मिली है. उनका अनुमान है कि वह मछुआरों के जाल में फंस गई थी. वे चाहते हैं कि ज़िला से एक अफसरों का दल जाकर मत्स्य कन्या की खोज-खबर ले और फिर उन्हें स्थिति के बारे में सूचित किया जाए.’
‘उन्हें यह सूचना कहां से मिली है,’ मैंने पूछा.
‘यह स्पष्ट नहीं पर शायद कांथी के ही किसी अख़बार में छपी है. लेकिन अब तक मत्स्य मंत्री खुद भी कलकत्ता से भगवानपुर होते हुए दीघा के लिए रवाना हो चुके होंगे. हो सके तो तुम फोन से पता करो या फिर किसी अफसर को दीघा भेज ही दो. फिर जैसा भी हो मुझे पहले फोन ही पर बता देना.’
वर्ष था 1992 और मैं पिछले छः-सात महीनों से मिदनापुर ज़िले के कॉनटाई, यानी कांथी, सबडिवीज़न के सबडिवीज़नल ऑफिसर (एसडीओ) के पद पर काम कर रहा था. कॉनटाई अविभाजित मिदनापुर ज़िले तथा पश्चिम बंगाल का सबसे दक्षिण-पूर्वी सबडिवीज़न था. इसके दक्षिण में ओडिशा का बालासोर, या बालेश्वर, ज़िला था और पूरब में बंगाल की खाड़ी. तैंतीस वर्ष पहले पर्यटन की दृष्टि से राज्य में एक ही समुद्र तट था, वह था दीघा. यह कांथी सबडिवीज़न में ही कॉनटाई शहर से बस 32 किमी दूर स्थित था. गर्मी हो चली थी परंतु सैलानियों का आना-जाना अब भी जारी था.
मेरे समक्ष प्रश्न यह था कि मत्स्य कन्या की यह खबर किस अखबार में छपी है. बंगाल में कई छोटे-बड़े शहरों से स्थानीय समाचार पत्र छपते आए हैं. कांथी समाज में शिक्षा की प्रधानता, इस भूमि पर स्वतंत्रता संग्राम का गौरवमय इतिहास, तथा लोगों की राजनीतिक जागरूकता की पृष्ठभूमि में यह आश्चर्य की बात न थी कि कांथी इस विषय में अग्रणी था.
मिदनापुर शहर से, जहां ज़िला मुख्यालय स्थित था, एक ही स्थानीय समाचार पत्र छपता था परंतु कांथी से उस वक्त तीन अख़बार प्रकाशित होते थे—‘दैनिक चेतना’, ‘उपकुल बार्ता’ तथा ‘सैकत समाचार.’ इस सबडिवीज़न, विशेष रूप से कांथी शहर के निवासी इन चार से आठ पन्नों के अख़बारों पर स्थानीय समाचार के लिए निर्भर थे. एसडीओ आवास में ये तीनों अख़बार आते थे, परंतु उस दिन सुबह मैंने उन्हें नहीं देखा था.
एडीएम से बात करने के पश्चात मैं दफ्तर पहुंचा, जो कि एसडीओ आवास से पचास कदम की दूरी पर था. दफ्तर पहुंचकर मैंने पाया कि अशित बाबू, मेरे निजी सहायक, काफी उत्तेजित अवस्था में मेरी प्रतीक्षा कर रहें हैं. मैं कुर्सी में बैठ भी न पाया था कि उन्होंने मुझसे पूछा, ‘सार, आपनी खोबोर पेयेचेन (सर, आपको खबर मिली है)?’ मैंने पूछा, ‘की खोबोर (कौन सी खबर)?’ मेरे पूछने भर की देर थी कि अशित बाबू ने बड़ी मेहनत से जुटाई इस सनसनीखेज़ ख़बर का विस्तृत ब्यौरा मेरे सामने बिछा दिया.
घटना पिछली रात घटी थी. दीघा तट के सुनसान छोर पर कुछ मछुआरों को एक बहुत बड़ी मछली पड़ी दिखी. वे दौड़कर उसके पास गए तो पाया कि एक मत्स्य कन्या रेत पर मूर्छित पड़ी है. वह लोग उसे उठाकर तट के निकट एक झोंपड़ी में ले गए और उसके चेहरे पर जल के छींटे मारकर उसे होश में लाने की कोशिश की परंतु विफल रहे. तब मछुआरों ने एक स्थानीय चिकित्सक को बुलाया जिसने जांच के बाद बताया कि मत्स्य कन्या को आराम की ज़रूरत है. अब अशित बाबू यह पता करने की कोशिश में लगे थे कि इसके बाद क्या हुआ.
मैंने पूछा कि यह खबर आई कहां से तो अशित बाबू ने मुझे उस दिन का ‘सैकत समाचार’ थमा दिया. मुख्यपृष्ठ पर एक बॉक्स में छपी छोटी-सी खबर का मोटे अक्षरों में शीर्षक था ‘दीघा में मत्स्य कन्या’. इसमें कुछ और संक्षेप में वही लिखा था जो अशित बाबू ने मुझे बताया था. मैंने उनसे दीघा विकास प्राधिकरण के कार्यकारिणी अधिकारी और दीघा थाना के प्रभारी अधिकारी को टेलीफोन मिलाने के लिए कहा.
अशित बाबू ने कई बार कोशिश की परंतु दीघा से टेलीफोन संपर्क नहीं हो पा रहा था. कॉनटाई अगर शिक्षा और राजनीतिक चेतना के विषयों में राज्य के कई क्षेत्रों से आगे था तो प्रौद्योगिकी के मामले में बहुत पीछे था. इस महकमे में विद्युत का हाल तो आपने पिछले स्तंभ में देखा ही होगा, टेलीफोन परिसेवा की स्थिति और भी करुणाजनक थी. राज्य में जब और शहरों में सब्सक्राइबर ट्रंक डायलिंग (एसटीडी) सेवा आरंभ हो रही थी, तो कांथी शहर में किसी से बात करने के लिए फोन उठाकर टेलीफोन एक्सचेंज में बैठे ऑपरेटर को कहना पड़ता था कि मेरी बात इस नंबर से करवा दें. आए दिन सबडिवीज़न के अंदर भी एक जगह से दूसरी जगह बात करना दूभर हो जाता था. यह ऐसा ही एक दिन था.
इन बातों के बीच मेरे कमरे में एक डिप्टी कलेक्टर आए जिनके हाथ में भी ‘सैकत समाचार’ की एक प्रति थी. उन्होंने बताया कि सारे शहर में बस मत्स्य कन्या की ही बातें हो रही हैं. एक उन्माद-सा छाया हुआ है. दीघा से उठी इस खबर की लहर की चपेट में आकर कांथी से फोटोग्राफरों को साथ लेकर लोग-बाग बिना नहाए-खाए गाड़ियों में भर कर दीघा की ओर बहे चले जा रहे हैं.
मैंने उनसे कहा कि मत्स्य मंत्री भी कलकत्ता से दीघा के लिए कूच कर चुके हैं. ज़िला मुख्यालय से हमें इस समाचार की पुष्टि करके रिपोर्ट भेजने को कहा गया है. इधर टेलीफोन पर दीघा में किसी से बात नहीं हो पा रही है. आप रिलीफ इंस्पेक्टर को दीघा भेजकर कहिए, यथा शीघ्र रिपोर्ट दें. अगर दीघा से टेलेफोन न कर सकें तो थाने से वायरलेस संदेश भेजें. मैंने अशित बाबू को कहा कि टेलीफोन एक्स्चेंज में कह दें कि जब भी लाइन मिले तो मेरी बात दीघा के उन दो अफसरों से अवश्य करवाएं.
आज बुधवार था तथा हर बुधवार दोपहर के बाद एक साप्ताहिक बैठक होती थी जिसमें चल रहे साक्षरता अभियान की समीक्षा की जाती थी. इस बैठक में सबडिवीज़न के तेरहों बीडीओ उपस्थित रहते थे. अक्सर इनमें से कुछ, जिन्हें कोषागार में या दफ्तर की किसी शाखा में अन्य कोई काम होता था, बैठक के समय से पहले आ जाते थे. ऐसे ही एक बीडीओ से मेरी बात हो रही थी कि फोन की घंटी बजी.
फोन पर दीघा थाने के प्रभारी अधिकारी थे. पूछने पर उन्होंने कहा कि दीघा में भी आज सुबह से ही मत्स्य कन्या की चर्चा हो रही है. तरह-तरह की अफवाहें भी फैल रही हैं. एक से अधिक मत्स्य कन्याओं की बात उठ रही है. समुद्र तट पर भीड़ बढ़ने लगी है. पुलिस मछुआरों से उनकी बस्तियों में जाकर भी पूछताछ कर रही है परंतु मत्स्य कन्या को उपचार के लिए कौन और कहां ले गए हैं यह अभी तक पता नहीं चला है. पता चलते ही मुझे सूचित करेंगे.
शीघ्र ही टेलीफोन की घंटी फिर बजी और मैं दीघा विकास प्राधिकरण के कार्यकारिणी अधिकारी से बात करने लगा. उनके पास भी कई फोन आए थे, मत्स्य मंत्री के दफ्तर ने भी संपर्क किया था, परंतु उन्हें भी मत्स्य कन्या के ठिकाने का पता नहीं चल पा रहा था. लेकिन ज़िले के भिन्न शहरों से— कॉनटाई, मिदनापुर, और तामलुक तक से—लोग गाड़ियों में लदकर दीघा पहुंच रहे थे और समुद्र तट के किनारे कैमरों और फोटोग्राफरों के साथ चक्कर लगा रहे थे.
टेलीफोन पर बात करते-करते मैंने अपनी निगाह पुनः सामने मेज़ पर पड़े ‘सैकत समाचार’ पर दौड़ाई. ‘दीघा में मत्स्य कन्या’ की खबर एक बार फिर पढ़ते हुए मेरी नज़र मुख्यपृष्ठ के ऊपरी बाएं कोने पर टिक गई. तारीख थी, ‘1 अप्रैल 1992.’
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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