पिछले दिनों उत्तराखंड में भाजपा की डबल इंजन सरकार ने उन लोगों को विचलित कर दिया है, जो प्रदेश में सामाजिक टकराव और जातीय वैमनस्यता बढ़ने की आशंकाओं से चिंतित हैं. उत्तराखंड में स्थानीय बनाम बाहरी उन्माद और जन अंसतोष की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही हैं. भाजपा सरकार के तीन साल का जश्न मनाने के लिए करोड़ों के बजट को मुख्यमंत्री का चेहरा चमकाने की फिजूलखर्ची में उड़ेला जा रहा है. बेरोजगारी, पलायन, खत्म होती पारंपरिक खेती, घोटालों और भ्रष्टाचार के चर्चे चरम पर हैं.
राज्य के तीन जिलों में मुगल नामों वाले पंद्रह स्थानों के नाम बदल दिए गए. इसमें देहरादून में एक प्राचीन क्षेत्र मियांवाला भी है. यह गांव राजपूत मियां वंशजों का पुश्तैनी गांव है. यहां आज भी राजपूत अपने नाम के आगे मियां लगाते हैं. चूंकि यह नाम मुस्लिम से मिलता जुलता है, अज्ञानता के अंधेरे में भटकती सरकार को नाम बदले जाने पर भारी जनाक्रोष का सामना करना पड़ रहा है.
समस्याओं का समाधान नहीं
ढाई दशक पूर्व अलग राज्य बनने के बाद बनी सरकारों की नाकामियों से यहां से पलायन बेतहाशा बढ़ा है. उत्तराखंड के चार मैदानी क्षेत्रों में अवैध खनन की चोरबाजारी पर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह ने अपनी पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री धामी पर प्रहार कर प्रदेश भाजपा और सरकार में आंतरिक संघर्ष को और तेज कर दिया. त्रिवेंद्र वर्तमान में हरिद्वार लोकसभा सीट से सांसद हैं.
इसे पुष्कर सिंह धामी को हटाने की मुहिम से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि पूर्व केबिनेट मंत्री व टिहरी से भाजपा विधायक किशोर उपाध्याय ने कहा कि अवैध खनन लाइलाज बीमारी है. उनका सुझाव है कि खुद को पाक साफ बताने वाले सभी पूर्व मुख्यमंत्री गणों को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए.
उत्तराखंड में लचर कानून व्यवस्था और सत्ता व अपराधियों का गठजोड़ का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 18 सितंबर 2022 को ऋषिकेश के पास 19 साल की अंकिता भंडारी की हत्या का आरोप भाजपा और संघ के ताकतवर नेता विनोद आर्या के बेटे पुलकित पर लगा था. अंकिता के परिजनों का आरोप है कि मुख्यमंत्री धामी सीबीआई जांच इसलिए नहीं होने दे रहे, क्योंकि इस हत्याकांड के पीछे राज्य के एक भाजपा पदाधिकारी का हाथ होने का आरोप है.
उत्तराखंड में भी हिमाचल की तर्ज पर कड़े भू-कानून के लिए काफी समय से आंदोलन चल रहा है. लेकिन 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार ने दिल्ली से ऐसा भू-कानून राज्य पर थोप दिया, जिससे यहां नाजुक पहाड़ों को बेशकीमती जमीनों की खरीद-फरोख्त की मंडी बनवा डाला.
राज्य व केंद्र सरकार की गलत नीतियों, खेती, जंगल, भूमि, सरकारी संसाधनों और आर्थिक गतिविधियों पर बाहरी प्रदेशों से आए लोगों ने पूरे पहाड़ को कमर्शियल हब में तब्दील कर दिया है. भाजपा सख्त भू कानून और मूल आंदोलन को कुचलने के लिए हथकंडे अपना रही है. दो स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं आशुतोष नेगी और आशीष नेगी को जेल में भी डाल दिया गया.
सामाजिक विद्वेष को बढ़ावा
प्रदेश के कुछ हिस्सों में बसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिये भाजपा और संघ परिवार से जुड़े दर्जनों संगठन सक्रिय हैं. पिछले काफी दिनों से राज्य सरकार के मंत्री और कई पदाधिकारी स्थानीय निवासी बनाम बाहरी के बीच वैमनस्यता बढ़ा रहे हैं.
प्रदेश गठन के बाद पहली बार विधानसभा के भीतर प्रदेश के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल द्वारा मूल पर्वतीय निवासियों के प्रति अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल करने के बाद पूरे राज्य में आंदोलन फैला, और फिर उन्हें पद से हटा दिया गया. उनके प्रति लोगों में गुस्सा इस बात से भी है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड पर सरकार की ओर से पर्दा डालने और हत्याकांड में भाजपा के वीआईपी कथित भूमिका पर भी उन्होंने सच्चाई छुपाने के बयान दिए.
विडंबना यह है कि एक मंत्री के इस्तीफे से भी मुख्यमंत्री धामी सरकार सुरक्षित नहीं है. धामी पार्टी हाईकमान को सफाई देने दिल्ली दौड़ लगाते रहते हैं.
यूसीसी कैसे राज्य को बदलेगा?
यह साल शुरू होते ही सरकार ने राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) बहुमत के बल पर उसे पारित करवा दिया. यूसीसी के बारे में न तो विपक्ष को कुछ ख़ास बताया गया और न ही आम लोगों को पता है कि इसके लागू होने के बाद लोगों की तकदीर किस तरह से बदलने वाली है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल कहते हैं कि भाजपा का उत्तराखंड का यह प्रोजेक्ट देश के संविधान में हस्तक्षेप है. इस तरह का कानून देश की संसद ही बनाने को अधिकृत है. यह प्रावधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 को निष्प्रावी बनाने की कोशिश है. जो अधिकार केवल देश की संसद के पास हैं, उनमें किसी राज्य सरकार को संशोधन की अनुमति देना गैर कानूनी और संविधान के खिलाफ है.
गौरतलब है कि दो साल देश के गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड में यूसीसी बनाने को लेकर कहा था कि इसके बाद धीरे-धीरे देश के सारे राज्य उत्तराखंड जैसा कानून अपने यहां बनाएंगे और उसके बाद संसद कानून पास करेगा. लेकिन कोई राज्य केंद्रीय कानून को केवल अपने राज्य में कैसे लागू कर सकता है और किस तरह मनमाने तरीके से यह नजीर बना सकता है?
दरअसल जनता का ध्यान भटकाने और वोट पाने के लिए उत्तराखण्ड को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिये सामाजिक टकराव की नई प्रयोगशाला बनाया जा रहा है. इस तरह एक संवेदनशील हिमालयी राज्य के तौर पर उसकी पहचान मिटायी जा रही है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
