सुप्रीम कोर्ट पर बयान को लेकर निशिकांत दुबे के ख़िलाफ़ अवमानना ​​कार्रवाई की मांग, एजी को पत्र

सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध टिप्पणी को लेकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के ख़िलाफ़ अवमानना ​​कार्यवाही की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील अनस तनवीर ने कहा कि दुबे ने सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकरण करने वाली टिप्पणी की थी, जो सीधे सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर संदेह पैदा करती है.

निशिकांत दुबे और सुप्रीम कोर्ट का कोलाज. (फोटो: पीटीआई, विकिमीडिया कॉमन्स)

नई दिल्ली: अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को एक पत्र भेजकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने की मंजूरी मांगी गई है. दुबे ने सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और अधिकार को कम करने के उद्देश्य से ‘बेहद निंदनीय’ और ‘भ्रामक’ बयान दिया था.

यह पत्र दुबे द्वारा शनिवार (19 अप्रैल) को दिए गए उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ‘देश में सभी गृहयुद्धों’ के लिए और सर्वोच्च न्यायालय ‘धार्मिक युद्धों’ के लिए जिम्मेदार हैं.

हालांकि, भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि उनकी पार्टी ‘न तो ऐसे बयानों से सहमत है और न ही ऐसे बयानों का कभी समर्थन करती है.’ उन्होंने इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया कि झारखंड के गोड्डा से चार बार के सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाएगी या नहीं.

द वायर द्वारा देखे गए पत्र में दुबे के खिलाफ अवमानना ​​कार्यवाही की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अनस तनवीर ने कहा कि दुबे ने सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकरण करने वाली टिप्पणी की थी, जो सीधे सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर संदेह पैदा करती है.

पत्र में कहा गया है, ‘ये टिप्पणियां न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हैं, बल्कि इनका उद्देश्य माननीय सर्वोच्च न्यायालय को बदनाम करना, जनता का विश्वास खत्म करना और न्यायिक निष्पक्षता में सांप्रदायिक अविश्वास को भड़काना है, जो सभी स्पष्ट रूप से न्यायालय की अवमानना ​​अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी)(आई) के तहत परिभाषित आपराधिक अवमानना ​​के अर्थ में आते हैं.’

जस्टिस खन्ना के खिलाफ दुबे की टिप्पणी का जिक्र करते हुए पत्र में कहा गया कि उनका बयान ‘बेहद अपमानजनक लेकिन खतरनाक रूप से भड़काऊ’ था.

इसमें कहा गया, ‘यह लापरवाही से माननीय मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रीय अशांति का दोषी ठहराता है, इस प्रकार देश के सर्वोच्च न्यायिक कार्यालय को बदनाम करता है और जनता में अविश्वास, आक्रोश और संभावित अशांति को भड़काने का प्रयास करता है. बिना किसी आधार के ऐसा आरोप न्यायपालिका की अखंडता और स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है और यह न्यायालय की अवमानना ​​अधिनियम, 1971 के तहत तत्काल और अनुकरणीय कानूनी जांच के योग्य कृत्य है.’

पत्र में आगे कहा गया है कि दुबे का यह बयान कि अनुच्छेद 368 केवल संसद को इस देश में कानून बनाने का अधिकार देता है, ‘भ्रामक है और न्यायपालिका को विधायिका की शक्तियों का अतिक्रमण करने के रूप में चित्रित करने की कोशिश है, जबकि वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 141 और 142 के तहत संवैधानिक आदेशों को बनाए रखने के लिए बाध्यकारी निर्देश जारी करने का पूरा अधिकार है.

दुबे की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सुप्रीम कोर्ट वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है.

तनवीर, जिन्होंने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखा है, इस मामले में एक याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

बंगाल भाजपा विधायक ने निशिकांत दुबे का समर्थन किया

भारतीय जनता पार्टी की विधायक अग्निमित्रा पॉल ने रविवार को सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ निशिकांत दुबे की टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि अगर देश को सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश चला रहे हैं तो संसद की कोई जरूरत नहीं है.

पॉल ने कहा, ‘उन्होंने सही बात कही है. राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं. फिर भारत के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के आदेश को कैसे नकार सकते हैं? वे देश के सांसदों और नीति निर्माताओं के फैसले को कैसे नकार सकते हैं? अगर देश को सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट चला रहे हैं तो संसद की कोई जरूरत नहीं है. फिर सब कुछ सीजेआई को ही करना चाहिए.’

मालूम हो कि गुरुवार को ही उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी न्यायपालिका की निंदा की थी और अनुच्छेद 142, जो सर्वोच्च न्यायालय को न्याय के हित में आवश्यक आदेश पारित करने की शक्ति देता है, को ‘लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ परमाणु मिसाइल’ करार दिया था.

ऐसा तब हुआ है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्यों के राज्यपालों द्वारा भेजे गए विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय कर दी थी और कहा था कि तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा दस से अधिक विधेयकों पर अपनी सहमति नहीं देना और उन्हें राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखना अवैध है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)