नई दिल्ली: पिछले सप्ताह उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संविधान के अनुच्छेद 142 को ‘लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ परमाणु मिसाइल‘ बताया था, जिसकी व्यापक आलोचना हुई थी. पर इसका कोई असर धनखड़ पर नहीं हुआ और अब मंगलवार (22 अप्रैल) को उन्होंने न्यायपालिका पर अपना हमला दोहराते हुए कहा कि संसद ही ‘सर्वोच्च’ है.
धनखड़ ने उनके पिछले बयान की आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि ‘संविधान लोगों के लिए है और इसकी सुरक्षा का जिम्मा निर्वाचित प्रतिनिधियों का है.’ उन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल का भी हवाला दिया और इसे ‘लोकतांत्रिक दुनिया के मानव इतिहास का सबसे काला दौर’ बताया, क्योंकि तब सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि वह मौलिक अधिकारों का एकमात्र मध्यस्थ है जिसे वह निलंबित कर सकता है.
हालांकि, उन्होंने तब तर्क दिया था कि ‘संविधान में संसद से ऊपर किसी प्राधिकारी की कल्पना नहीं की गई है.’
पिछले सप्ताह धनखड़ की टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले की प्रतिक्रिया के रूप में आई थी, जिसमें न्यायालय ने राज्यों के राज्यपालों द्वारा भेजे गए विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की थी और कहा था कि तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा 10 से अधिक विधेयकों पर मंजूरी नहीं देना और उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखना अवैध है.
मंगलवार को धनखड़ की टिप्पणी में विरोधाभासी बातें शामिल थीं क्योंकि इसमें संवैधानिक योजना की अनदेखी की गई है जो मानती है कि संविधान सर्वोच्च है और संसद स्वयं इसकी रचना है, अन्यथा नहीं.
धनखड़ ने आपातकाल का मुद्दा उठाया
दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए धनखड़ ने 1975 के आपातकाल की ओर ध्यान दिलाते हुए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की. धनखड़ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उस समय के नौ उच्च न्यायालयों के फैसलों की अनदेखी की है, जिसमें कहा गया था कि मौलिक अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती.
उन्होंने कहा, ‘उच्च न्यायालय के नौ फैसले एकमत थे कि लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों पर कभी रोक नहीं लगाई जा सकती, न्यायपालिका तक पहुंच को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकार होने से इनकार तो बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता.’
उन्होंने कहा, ‘लेकिन ऐसा किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? उस समय की कार्यपालिका मौलिक अधिकारों का एकमात्र मध्यस्थ है और वह उन्हें जितने समय के लिए चाहे निलंबित कर सकती है. असहमति की एक आवाज़ थी. असहमति और शालीनता- और यह आवाज़ यहां के एक पूर्व छात्र की थी.’
धनखड़ 1976 के एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले का जिक्र कर रहे थे जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से नौ उच्च न्यायालयों के फैसलों को खारिज कर दिया था, जिसमें आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के पक्ष में फैसला सुनाया गया था. जस्टिस एचआर खन्ना, एकमात्र असहमत व्यक्ति, भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के चाचा थे.
हालांकि, धनखड़ ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि संसद ‘सर्वोच्च’ है और जिस प्रधानमंत्री ने आपातकाल लगाया था, उन्हें 1977 के चुनावों के बाद ‘जवाबदेह’ ठहराया गया था, जिसमें इंदिरा गांधी हार गई थीं.
धनखड़ ने कहा, ‘एक प्रधानमंत्री, जिसने आपातकाल लगाया था, उन्हें 1977 में जवाबदेह ठहराया गया था. और इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए, संविधान लोगों के लिए है और इसकी सुरक्षा का जिम्मा निर्वाचित प्रतिनिधियों का है.’
उन्होंने कहा, ‘संवैधानिक विषयवस्तु क्या होगी, इस बारे में वे अंतिम मालिक हैं. संविधान में संसद से ऊपर किसी प्राधिकारी की कल्पना नहीं की गई है. संसद सर्वोच्च है. मैं आपको बता दूं, यह देश के प्रत्येक व्यक्ति जितना ही सर्वोच्च है. ‘हम लोग’ का एक हिस्सा लोकतंत्र में एक अणु है और उस अणु में परमाणु शक्ति है. और वह परमाणु शक्ति चुनावों के दौरान दिखती है और इसीलिए हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं.’
संसद में आपातकाल की ज्यादतियों को नज़रअंदाज़ किया
आपातकाल की आलोचना करते हुए और संसद को सर्वोच्च बताते हुए धनखड़ ने आपातकाल को गहरा करने वाली अवधि के दौरान संसद द्वारा की गई ज्यादतियों का कोई ज़िक्र नहीं किया. संसद ने संविधान में कई संशोधन पारित किए थे, जिससे न्यायिक शक्तियां छीन ली गईं और उन्हें संसद के हाथों में केंद्रित कर दिया गया.
इनमें संविधान (अड़तीसवां संशोधन) अधिनियम शामिल है, जिसने आपातकाल की न्यायिक समीक्षा पर रोक लगा दी तथा संविधान (उनतीसवां संशोधन) अधिनियम, जिसने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से संबंधित चुनावी विवादों पर विचार करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति छीन ली, इस शक्ति को एक अलग निकाय में निहित कर दिया तथा चुनावी कानूनों से प्रधानमंत्री को छूट दी, ताकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त किया जा सके, जिसमें चुनावी कदाचार के आधार पर गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया गया था.
संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, इस अवधि के दौरान एक और अतिशयोक्ति थी, जिसने प्रस्तावना में ‘संप्रभु धर्मनिरपेक्ष समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य’ शब्द जोड़े, लेकिन न्यायपालिका से चुनाव याचिकाओं की सुनवाई करने का अधिकार भी छीन लिया, संसद को संविधान में संशोधन करने के लिए व्यापक अधिकार दिए जो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रहेंगे. इसने यह भी प्रावधान किया कि निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए संसद द्वारा पारित कोई भी कानून न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं होगा.
‘केवल संविधान ही सर्वोच्च है’
धनखड़ ने सरकार के एक अंग को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार संविधान ही सर्वोच्च है.
पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य ने कहा, ‘संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी संविधान की रचनाएं हैं और इसलिए इनमें से कोई भी संस्था सर्वोच्च नहीं है; केवल संविधान ही सर्वोच्च है. और यह सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों द्वारा स्पष्ट किया गया है और यह एक स्थापित स्थिति है. उदाहरण के लिए, संसद कई चीजों में संशोधन कर सकती है लेकिन मूल संरचना में नहीं. यही वह सीमा है जो संसद ने न्यायपालिका पर लगाई है क्योंकि न्यायपालिका का काम संविधान की व्याख्या करना है.’
1973 के केशवानंद भारती निर्णय ने मूल संरचना सिद्धांत को बरकरार रखा और संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सीमाएं लगाईं. 13 न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 6:7 के अनुपात में फैसला सुनाया कि भारत के संविधान का एक मूल ढांचा है जिसे संविधान संशोधन द्वारा भी नहीं बदला जा सकता. न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है और यह कानून के शासन, शक्तियों के पृथक्करण और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांतों सहित संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती.
न्यायालय ने कहा कि यद्यपि शक्तियों का कोई कठोर पृथक्करण नहीं है, फिर भी संविधान स्वयं सरकार के तीनों अंगों के बीच शक्तियों का वितरण करके ‘नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली’ बनाता है, ताकि कोई भी एक दूसरों पर हावी न हो सके.
अदालत ने मामले में कहा था, ‘हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति न्यायपालिका को किसी भी मायने में सर्वोच्च कैसे बनाती है. संघीय संविधान में यह शक्ति सबसे महत्वपूर्ण है. वास्तव में यह कहा गया है कि लोकतंत्र का दिल और मूल न्यायिक प्रक्रिया में निहित है.’
‘संसद संविधान के अधीन है, संविधान से ऊपर या ऊपर नहीं’
संवैधानिक कानून विशेषज्ञ और चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति फैजान मुस्तफा के अनुसार, ब्रिटिश संविधान के विपरीत भारत में संसद की प्रधानता को नहीं अपनाया गया है.
उन्होंने कहा, ‘भारतीय संविधान के निर्माताओं ने ब्रिटेन की तरह संसद की सर्वोच्चता के सिद्धांत को नहीं अपनाया है. भारतीय संसद संविधान के अधीन है, यह संविधान से ऊपर नहीं है. भारतीय संसद संविधान की रचना है. यह संविधान के अधीन किसी भी अन्य प्राधिकरण की तरह है. हमारे यहां संसद की नहीं बल्कि संविधान की सर्वोच्चता है.’
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