पहलगाम: मंगलवार (22 अप्रैल) दोपहर बैसरन घाटी में हुए भीषण हमले में कम से कम दो बंदूकधारी ऐसे थे, जो चुन-चुनकर गैर-मुस्लिमों को निशाना बना रहे थे. कुल आतंकियों की संख्या चार/पांच मानी जा रही है. इस हमले में कम से कम 26 आम नागरिक मारे गए हैं.
द वायर द्वारा जुटाए गए उच्च पदस्थ सूत्रों और चश्मदीदों के बयान—जिनमें से कुछ की अधिकारियों ने पुष्टि भी की है—इस हत्याकांड की भयावह तस्वीर पेश करते हैं. गैर-मुस्लिम पहचान की पुष्टि होने के बाद कई लोगों को बेहद करीब से गोली मारी गई. ऐसा प्रतीत होता है कि हमलावर इस हमले को बॉडी कैमरों से रिकॉर्ड भी कर रहे थे.
एक सरकारी सूत्र के अनुसार, हमला दोपहर करीब 2:50 बजे शुरू हुआ.
जिस मैदान में हमला हुआ वह मुख्य पहलगाम क्षेत्र से लगभग सात किलोमीटर दूर है और एक ओर से घने जंगल से घिरा हुआ है.
चश्मदीदों ने बताया कि हमले के समय वहां लगभग 1,500 से 2,500 लोग मौजूद थे, जिनमें पर्यटक, घोड़ा चलाने वाले, फोटोग्राफर, शॉल बेचने वाले, चाय बेचने वाले और भेलपूरी बेचने वाले जैसे लोग शामिल थे.
‘मिनी स्विट्ज़रलैंड’ के नाम से प्रसिद्ध इस मैदान में प्रवेश करने के लिए टिकट खरीदना होता है. वहां ज़ॉर्बिंग और ज़िपलाइन जैसी गतिविधियां चल रही थीं और कुछ बच्चे ट्रैम्पोलिन पर कूद रहे थे, तभी यह हमला हुआ. कुछ पर्यटक पारंपरिक परिधान पहनकर तस्वीरें भी खिंचवा रहे थे.

एक चश्मदीद के अनुसार, हमलावर जैसे ही जंगल से निकल कर मैदान में आए, उन्होंने चारों ओर फैलकर हमला किया और कई दिशाओं से गोलीबारी की आवाजें सुनाई देने लगीं. एक सूत्र ने बताया कि हमला करीब 30 से 40 मिनट तक चला.
एक युवक ने कहा, ‘एक व्यक्ति से कलमा पढ़ने के लिए कहा गया. जब वह ऐसा करने में असफल रहा, तो उसे सिर में गोली मार दी गई. जो लोग कलमा पढ़ पाए, उन्हें बख्श दिया गया.’
युवक ने यह बात अपने भाई के हवाले से बताई, जो हमले के समय बैसरन में मौजूद था और उसने कम से कम एक हमलावर को देखा. युवक का भाई, जिसका नाम सुरक्षा कारणों से उजागर नहीं किया जा रहा है, बैसरन में काम करने वाले उन कई दिहाड़ी मजदूरों में से है, जो वहां काम करके रोज़ी-रोटी कमाते हैं.
एक शीर्ष सूत्र ने बताया कि हमलावर केवल उन्हीं लोगों को निशाना नहीं बना रहे थे जो मुस्लिम होने का प्रमाण नहीं दे सके.
‘कुछ लोगों को उनके पहनावे के कारण भी निशाना बनाया गया. एक महिला ने सिंदूर और बिंदी लगाई हुई थी. एक हमलावर ने उसके पति को बिना कोई सवाल पूछे बेहद करीब से गोली मार दी.’ सूत्र ने कहा.
अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस हमले की जांच कर रही है और कुछ मजदूरों से पूछताछ की जा रही है. यह हमला 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में शुरू हुए सशस्त्र विद्रोह के बाद से पर्यटकों पर हुआ सबसे घातक हमला माना जा रहा है.
एक अन्य चश्मदीद ने नाम न छापने की शर्त पर द वायर को बताया कि जब हमला हुआ वह बैसरन के एक चाय स्टॉल पर चाय पी रहा था.
‘सबसे पहले मुझे चीखें सुनाई दीं कि आतंकवादियों ने पर्यटकों पर गोली चलाई है. थोड़ी दूरी से मैंने देखा कि सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे, और हवा में रुक-रुककर गोलियों की आवाज गूंज रही थी. मैं चाय स्टॉल से तभी बाहर निकला जब गोलीबारी बंद हो गई.’
एक अन्य गवाह ने बताया कि हमलावरों ने महिलाओं और बच्चों को नुकसान न पहुंचाने का ध्यान रखा. इस दावे की अधिकारियों ने भी पुष्टि की है.
सूत्रों ने कहा, ‘हमलावरों ने मैदान में काफी समय बिताया और अपने शिकार को बहुत सोच-समझकर चुना, जिससे पता चलता है कि उन्होंने पहले से रेकी की थी, प्रशिक्षण लिया था और पूरी योजना के साथ पहुंचे थे.’
इस हमले में मारे गए एकमात्र कश्मीरी मुस्लिम सैयद आदिल हुसैन के बारे में बताया गया है कि वे कुछ पर्यटकों को हमलावरों से बचाने की कोशिश कर रहे थे, तभी उन्हें गोलियां लग गईं.

हमले के दौरान शूट किए गए एक वीडियो में मैदान में दो अलग-अलग किस्म की गोलियों की आवाजें सुनाई देती हैं. हालांकि, पुलिस ने कहा है कि हमलावरों के पास एके-47 राइफलें थीं.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कम से कम तीन संदिग्ध पाकिस्तानी हमलावरों के स्केच जारी किए हैं, जो इस हमले में शामिल बताए जा रहे हैं. आशंका जताई जा रही है कि इस हमले को पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी द रेजिस्टेंस फ्रंट ने अंजाम दिया है.
ऐसा माना जा रहा है कि ये तीनों संदिग्ध हाल ही में दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और पुलवामा जिलों के दो स्थानीय आतंकियों के साथ कश्मीर में घुसे थे.
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