जम्मू-कश्मीर में पहलगाम की बैसरन घाटी में गत 22 अप्रैल को हुए बर्बर आतंकवादी हमले में दो दर्जन से ज्यादा देशवासियों (हां, उनका सबसे अच्छा परिचय यही है) के जानें गंवाने के बाद से अब तक जो भी तथ्य सामने आये हैं और उन्हें लेकर नरेंद्र मोदी सरकार का जैसा रवैया दिखा है, उसके मद्देनजर इस सरकार से बस यही कहने का मन होता है कि वह, बरा-ये-मेहरबानी, आतंकवाद से इस तरह न लड़े.
इतनी गफलतों व चूकों और अपने समर्थकों के आतंकियों को खुश करने वाले विभाजनकारी हिंदू-मुस्लिम सोच के साथ तो कतई नहीं. क्योंकि आतंकवाद से, खासकर सीमा पार के आतंकवाद से, इस तरह लड़ने के अपने जोखिम हैं, जो और बड़े भी हो सकते हैं.
अफसोस कि यह सरकार सीमावर्ती कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से वैसे ही लड़ रही है, जैसे इसके विरोधी देश भर में इस सरकार और इसके ‘परिवार’ की फैलाई सांप्रदायिकता से. विरोधी हैं कि बेचारे लड़ते-लड़ते थके जा रहे हैं और अपना सारा कस-बल लगाकर भी सांप्रदायिकता और उसकी जाई दूषित चेतनाओं से पार नहीं पा पा रहे. उल्टे वह और दुर्जेय होकर धर्मांधता व मतांधता तक जा पहुंची है.
दूसरे शब्दों में कहें, तो जैसे-जैसे वे उससे लड़ रहे हैं, वैसे-वैसे वह और ताकतवर होती जा रही है. इसके बावजूद वे अपनी लड़ाई के खोट देखे और दूर किए बिना बस लड़ते ही चले जा रहे हैं. कई बार तो वे उससे लड़ते कम और लड़ने का भ्रम रचते हुए ज्यादा दिखाई देते हैं.
मनमाने फैसले!
मोदी सरकार बिल्कुल इन्हीं की तरह जम्मू कश्मीर में आतंकवाद से लड़ रही है और जितना लड़ रही है, उतना ही वह रक्तबीज होता जा रहा है. पहलगाम में हुआ हमला उसकी इसी ‘लड़ाई’ की परिणति है.
याद कीजिए, इस हमले से पहले तक इस राज्य की संवेदनशीलता और उस पर सीमा पार की गिद्ध दृष्टि के बावजूद यह सरकार बारम्बार छाती ठोंक रही थी कि उसके प्रयत्नों से वहां आतंकवाद दम तोड़ रहा है और शांति बहाल हो गई है. उसकी मानें तो उसने वहां के आतंकी संगठनों की कमर तो 2014 में सत्ता में आते ही सेना को उनके विरुद्ध कार्रवाइयों की खुली छूट देकर और 08 नवंबर, 2016 को नोटबंदी करके तोड़ दी थी. फिर रही-सही कसर कोई छह साल पहले पांच अगस्त, 2019 को संविधान का अनुच्छेद 370 खत्म करके पूरी कर दी. जबकि सच्चाई यह है कि पहले तो उसने मनमाने ढंग ये सभी फैसले किए, फिर इनसे मनमाने नतीजों की उम्मीद करने लगी. यहां तक कि नोटबंदी की विकराल विफलता से भी कोई सबक नहीं लिया.
अनुच्छेद 370 के खात्मे की मनमानी (उसके शब्दों में वादा) पूरी करने के लिए तो उसने समूची कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व तैनाती कर उसे खुली जेल में बदल दिया था. निस्संदेह, यह कृत्य जम्मू-कश्मीर के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक इस फैसले में उसके निवासियों को भागीदार बनाने के बजाय उन पर गहरा अविश्वास जताना था. लेकिन राज्य के लोग इस अविश्वास को शांतिपूर्वक सह गए तो भी इसने इसे उनकी सदाशयता नहीं, कमजोरी और अपनी विजय के रूप में देखा.
उसके इस विजयोन्माद ने राज्य में आतंकियों द्वारा प्रवासी मजदूरों व कश्मीरी पंडितों की लक्षित हत्याएं और सुरक्षा बलों पर हमले जारी रखने के बावजूद उसकी इस तोता रटंत को थमने नहीं दिया कि राज्य में आतंकवाद बीते दिनों की बात हो गया है. इस रटंत की जाई काहिली और लापरवाही के ही चलते ही हालात ऐसे हो गए कि अब तक किसी भी मामले में अपनी कतई कोई चूक न मानने वाली सरकार को सर्वदलीय बैठक में स्वीकार करना पड़ा है कि यह हमला सुरक्षा चूक का नतीजा है.
विपक्ष ने पूछा कि हमले के वक्त सुरक्षा बल कहां थे, तो उसका जवाब था कि स्थानीय अधिकारियों ने टूर ऑपरेटरों की मिलीभगत से बैसरन घाटी क्षेत्र को पर्यटकों के लिए खोलने से पहले, सुरक्षा बलों तो सुरक्षा बलों, राज्य की पुलिस को भी जानकारी नहीं दी थी. उसके अनुसार यह क्षेत्र सामान्यतः जून में अमरनाथ यात्रा के दौरान खोला जाता है, लेकिन इस बार इसे पहले ही खोल दिया गया.
दूसरी और ‘द हिंदू‘ ने जम्मू-कश्मीर सरकार के एक अधिकारी के हवाले से खबर दी है कि उक्त घाटी को खोलने के लिए अनुमति लिए जाने की कोई परंपरा ही नहीं रही और बर्फबारी के महीनों को छोड़कर वह साल भर खुली रहती आई है. ऐसे में सवाल है कि सच्चाई क्या है भला?
सरकार का यह कथन साफ बताता है कि अपने राष्ट्रवादी खोलों के बावजूद उसने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान को ऐसे बुरे दौर में पहुंचा दिया है जहां उसमें समन्वय का घोर अभाव है.
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के शब्दों में कहें, तो इसी का नतीजा है कि आतंकियों को तो बैसरन घाटी को पर्यटकों के लिए खोले जाने की खबर हो गई और उन्होंने वहां पहुंचकर हमला भी कर दिया, लेकिन सरकार इससे अनजान बनी रही. इससे अंदेशा होता है कि खुफिया एजेंसियों, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के बीच भी कोई समन्वय नहीं रह गया है. जिम्मेदारी लेने का भाव तो नहीं ही है.
‘सीधे नियंत्रण’ का नतीजा
सोचिए जरा, टूर ऑपरेटर और स्थानीय अधिकारी मनमाने निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं तो प्रधानमंत्री महत्वपूर्ण सर्वदलीय बैठक छोड़कर राजनीतिक लाभ के लिए बिहार की चुनावी सभा में हमले के दोषियों को कल्पना से ज्यादा सजा दिलाने व मिट्टी में मिला देने की घोषणा करते हैं! क्या अर्थ है इसका?
‘मन की बात’ में उनके यह कहने का भी कि देशवासी गुस्से से उबल रहे हैं, तब तक कोई अच्छा मतलब कैसे निकाला जा सकता है, जब तक वे यह न समझें कि देशवासियों में गुस्सा सिर्फ पाकिस्तान के प्रति नहीं, इसको लेकर भी है कि उसके भेजे आतंकवादी हमारी सीमा में घुसकर दिनदहाड़े कहर बरपाकर चले गए और हमसे तत्काल उनका कोई प्रतिरोध संभव नहीं हुआ. हम इतनी सतर्कता प्रदर्शित नहीं कर पाए तो इसका जिम्मेदार कौन है?
अपना घर तो आतंकियों को मिट्टी में मिला देने के बाद भी संभालना पड़ेगा और इतने बदनीयत व अगंभीर रवैये से वह संभलेगा भला कैसे?
दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री या सरकार इस स्थिति के लिए अपने सिवा किसी और को दोष भी नहीं दे सकते. क्योंकि उनकी ही कृपा से जम्मू-कश्मीर अब केंद्रशासित प्रदेश है, जिसमें केंद्र की सहमति या अनुमति के बगैर पत्ता भी नहीं खड़क सकता. गृहमंत्री अमित शाह वहां सुरक्षा संबंधी बैठकें करते हैं तो उनमें राज्य के अधिकारी तो शामिल होते हैं, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को बाहर कर दिया जाता है, क्योंकि केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं होती.
ज्ञातव्य है कि राज्य का विशेष दर्जा छीनकर उसे केंद्रशासित बनाते वक्त सरकार की ओर से जोर-शोर से तर्क दिया गया था कि इसके बगैर आतंकवाद से निर्णायक ढंग से निपटने में बाधा आ रही है, जिसे दूर करने और स्थिति पर केंद्र के सीधे नियंत्रण की दरकार है. लेकिन अब यह सीधा नियंत्रण है तो भी न सिर्फ सुरक्षा चूक जानलेवा हो गई है बल्कि आतंकी हमले के शिकार देशवासियों को मदद पहुंचाने में भी घंटों लग जा रहे हैं. उन्हें डेढ़-डेढ़ घंटे तक प्राथमिक चिकित्सा के बगैर तड़प कर जान गंवानी पड़ रही है और इसे लेकर सरकार के पास कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है.
जवाब तो खैर उसके पास इसका भी नहीं है कि अगर उसके पास इतने बड़े हमले की जरा-सी भी खुफिया सूचना नहीं थी तो खुफिया एजेंसियां भला क्या कर रही थीं? अभी तक वह सिर्फ यह कह रही है कि पता लगायेगी कि चूक आखिरकार कहां और कैसे हुई!
अकारण नहीं कि लोग मनमोहन सरकार के दौरान हुए आतंकी हमलों के वक्त के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असहनशील व आक्रामक बयानों के वीडियो ढूंढ लाए हैं और उनकी रौशनी में उनका और उनके गृहमंत्री का नया चेहरा देख रहे हैं. पूछ पाते तो पूछते भी कि उन हमलों के वक्त बड़ी-बड़ी बातें करने वाले उनके मुंहों को अब क्या हो गया है? अपने काल के पिछले सालों के आतंकी हमलों के वक्त सर्जिकल स्ट्राइक व एयर स्ट्राइक करके ‘घर में घुसकर मार देने’ के भरपूर प्रचार से अधिकतम राजनीतिक लाभ तो वे उठा चुके. फिर भी आतंकी हमले नहीं थमे हैं तो हासिल क्या हुआ है भला?
अब जब सोते पकड़े जाने के बाद उनके द्वारा जिस तरह पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद करने जैसी कार्रवाइयां करके खुद को सख्त साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं और पाकिस्तान भी जवाबी कदम उठा रहा है, उससे भी भला क्या हासिल होगा?
सबसे बड़ा सवाल
ऐसे, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा कड़े, कदम पहले भी कई बार आजमाये जा चुके हैं पर समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है. 2001 में 13 दिसंबर को संसद पर आतंकी हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सेना को सीमाओं पर भेजकर लंबे समय तक ‘आज नहीं तो कल युद्ध’ की स्थिति बनाए रखी थी. एक समय वे ‘हाट परस्यूट’ यानी आतंकियों को खदेड़कर मारने की बात भी कहते थे. लेकिन एक समय वे यह ‘उम्मीद’ करने को भी अभिशप्त हुए कि अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ने आया अमेरिका बहुत संभव है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के विरुद्ध भारत के हिस्से की लड़ाई भी लड़ दे.
इस उम्मीद में उन्होंने अमेरिका को तालिबान के खिलाफ कार्रवाई में भारतीय हवाई अड्डे इस्तेमाल करने देने का लालच भी दिया था. लेकिन इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने अपना उल्लू सीधा किया और भारत की पीड़ा को समझने तक से मना कर दिया. अंत में वह अफगानिस्तान को भी उसके हाल पर छोड़कर कहें या तालिबान के हवाले करके सिद्ध कर गया कि हर देश को आतंकवाद के विरुद्ध अपने हिस्से की लड़ाई स्वयं लड़नी पड़ती है.
इसलिए इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है कि मोदी सरकार, जिसे सारे विपक्षी दलों ने फ्री हैंड देने का एलान कर रखा है, इस आतंकवाद से कैसे लड़े और जीते?
उसके स्वार्थी समर्थकों ने पहलगाम हमले को लेकर जिस तरह हिंदू-मुसलमान (‘धर्म पूछा, जाति नहीं’!) कर रहे हैं और आतंकियों के कृत्य के लिए भारतीय मुसलमानों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, उसके नतीजे तो शुभ नहीं ही होने वाले. क्योंकि किसी भी देश में बढ़ते घरेलू उद्वेलनों की भूमि आतंकवाद के लिए उर्वर ही सिद्ध होती है. आतंकवाद सीमा पार से प्रायोजित हो तो और भी. फिर भी कोई भाजपा नेता इन समर्थकों को कतई बरज नहीं रहा.
इससे ‘उत्साहित’ कई समर्थक कुछ इस तरह पाकिस्तान पर चढ़ बैठने की बात कर रहे हैं, जैसे युद्ध ही सबसे बड़ी समझदारी हो! दुनिया का इतिहास गवाह है, युद्धों से बात बनती नहीं और बिगड़ जाती है और विनाशकारी युद्धों के बाद भी संबंधित पक्षों को वार्ताएं करनी पड़ती हैं.
याद आता है, पंजाब खालिस्तानी आतंकवाद ( जिसे अमेरिका में बैठे कुछ स्वनामधन्य प्रायोजित कर रहे थे) की आग में जल रहा था तो 1985 की दस मई को आतंकियों ने राजधानी दिल्ली में कई जगह बम लगे ट्रांजिस्टर लावारिस छोड़ दिए थे. उस दिन लालच में आकर उन ट्रांजिस्टरों को उठाने व बजाने की कोशिश करने वाले अस्सी निर्दोष लोग विस्फोटों के शिकार हो गए थे. उसके बाद हुए एक सम्मेलन में कुछ विद्वानों ने उस आतंकवाद के उन्मूलन को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कहीं तो मेरे गांव के एक बुजुर्ग ने रेडियो पर खबर सुनकर मुझसे पूछा: भइया, ये विद्वान इतना भी नहीं समझते कि आतंकवाद किसी को भी आतंकवादी बताकर मार देने से नहीं, जिन कारणों से वह पैदा हुआ है, उन्हें दूर करने से खत्म होता है?
इतिहास गवाह है कि वह आतंकवाद तभी खत्म हुआ, जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उसके मूल में जाकर वार्ताओं व समझौतों की पहल की. यह और बात है कि बाद में लिट्टे के आतंकवाद ने उनकी जान ले ली.
प्रधानमंत्री जी, प्लीज़!
अफसोस कि आज नरेंद्र मोदी से कोई अपेक्षा तक नहीं कर पाता कि वे वैसी राह चलेंगे क्योंकि उन्होंने खुद को लगातार अपने मन, अपने मान, अपनी मान्यताओं और अपनी संकीर्णताओं का बंदी बना रखा है और समझते ही नहीं कि वे उन देशवासियों के भी प्रधानमंत्री हैं जो उनसे सहमत नहीं हैं. उनके लोग अचानक कौआरोर मचाना शुरू करते हैं (भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल तक से) कि पहलगाम में आतंकियों ने पर्यटकों को धर्म पूछकर गोलियां मारीं, जाति पूछकर नहीं और नफरतभरा विभाजनकारी नैरेटिव गढ़ने लगते हैं कि तो भी प्रधानमंत्री यह कहने के लिए आगे नहीं आते कि कश्मीरियों ने तो यह कहते हुए कि ‘टूरिस्ट हमारी जान है’ धर्म नहीं देखा, जिन्हें बचा सकते थे, उन्हें बचाने में भी नहीं ही देखा.
बहरहाल, प्रधानमंत्री इतना समझ लेते तो भी देश का बहुत भला करते कि वे सारे देशवासियों को साथ लेकर अपने लोगों द्वारा बेवजह फैलाए जा रहे बेवजह के उद्वेलनों के खात्मे की दिशा में बढ़ जाएं तो आतंकवाद और आतंकवादियों से देश की सीमाओं की सुरक्षा का वह काम बहुत आसान हो दिए जो अभी सेना की कड़ी चौकसी के बावजूद कठिन बना हुआ है.
अलबत्ता, यह काम उतना आसान नहीं है जितना हर आतंकी हमले के बाद यह कहना कि हमारा आतंकवाद से लड़ने का संकल्प और मजबूत हुआ है. इस संकल्प की ‘मजबूती’ अगर इसी रूप में सामने आनी है कि जो पर्यटक आतंकियों से बच जाएंगे, उन्हें एयरलाइंस ‘लूट’ लेंगी, तो उसका थोड़ा कम मजबूत रहना ही ठीक है. एयरलाइंस द्वारा की गई लूट तो पाकिस्तान प्रायोजित नहीं थी, प्रधानमंत्री जी!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
