चित्रकथा: मणिपुर में हिंसा की आग और ख़ामोशी के दो साल…

3 मई 2025 मणिपुर में जातीय संघर्ष के शुरू होने के दो साल पूरे होने का दिन है. पिछले दो सालों से जारी हिंसा में क़रीब 260 लोगों की जानें जा चुकी है और तक़रीबन 60,000 लोग बेघर हो चुके हैं. मणिपुर की दुखद दास्तान, तस्वीरों में.

एक जले हुए घर के अवशेष और एक कार की राख अब मणिपुर में पहाड़ी और घाटी के बीच की बैरिकेड का हिस्सा बन गए हैं, जहां जंग खाए हुए बैरियर और 'चेकिंग के लिए रुकें' का एक साइन लगा है, और चारों ओर बालू के थैले और संघर्ष की गूंज है. (सभी फोटो: याक़ूत अली)

मणिपुर: मई 2023 से मणिपुर भीषण जातीय हिंसा की चपेट में है, जहां मेईतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जारी संघर्ष ने अब तक 260 से ज़्यादा जानें ले ली हैं. इस हिंसा के चलते 60,000 से अधिक लोग अपने घरों से बेघर हो चुके हैं, और हज़ारों मकान जलकर खाक हो गए हैं.

यह फोटो रिपोर्ट ज़मीनी हालात की भयावहता को उजागर करती है. तबाही के निशान हर दिशा में दिखते हैं, और समुदायों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी होती जा रही है. राज्य सरकार की निष्क्रियता के खिलाफ जनता का गुस्सा अब उबाल पर है, जो हालात को और अस्थिर बना रहा है.

2023 में मणिपुर में भड़की अभूतपूर्व हिंसा के दौरान उग्रवादी समूहों द्वारा 250 से अधिक चर्च जलाए जाने की खबरें सामने आईं. कुछ चर्च अब भी खड़े हैं, जले-झुलसे ज़रूर हैं, लेकिन अब भी डटे हुए हैं

 

राजधानी इंफाल के न्यू लाम्बुलाने इलाके में एक कुकी समुदाय का घर मई 2023 में उग्रवादी संगठन अरम्बाई तेंगगोल द्वारा जलाकर राख कर दिया गया.

 

इंफाल का न्यू लाम्बुलाने इलाका, जो कभी कुकी समुदाय की चहल-पहल से भरा रहता था, अब केंद्रीय और राज्य सुरक्षाबलों की निगरानी में शांत पड़ा है. आदिवासी मार्केट की खाली सड़क पर कुछ रिक्शे खामोश खड़े इंतज़ार करते हैं.

 

इंफाल वेस्ट ज़िले के जोमी विला इलाके में कुकी समुदाय की संपत्तियों पर अब उग्रवादी संगठन अरम्बाई तेंगगोल  का कब्ज़ा है. इन जगहों का इस्तेमाल कर यह समूह पैसा कमा रहा है. बंद दुकानों के शटरों पर स्प्रे से लिखा गया ‘A.T. H55’ इस जबरन कब्ज़े की पहचान बन गया है.

 

मणिपुर के थौबल ज़िले में भाजपा कार्यालय की जली हुई इमारत — जातीय हिंसा से निपटने में राज्य सरकार की विफलता को लेकर जनता के आक्रोश ने इसे आग के हवाले कर दिया गया था. अब यह ढांचा सुनसान खेतों के बीच सांझ की खामोशी में खड़ा है.

 

राज्य और केंद्रीय सुरक्षाबलों से भरोसा उठ जाने के बाद मेईतेई पुरुष खुद घाटी की सुरक्षा में तैनात रहे हैं.

 

कुकी-बहुल चूड़ाचांदपुर ज़िले में भी वही कहानी दोहराई जा रही है — राज्य और केंद्रीय सुरक्षाबलों पर विश्वास खत्म हो जाने के बाद अब स्थानीय कुकी लोग ही अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

 

मणिपुर में राहत शिविरों में रह रहे बच्चे अपने अनुभवों को रंगों के ज़रिए उकेर रहे हैं — और उन चित्रों में झलकती है केवल एक ही चीज़: हिंसा.

 

मणिपुर में मलबे के बीच पड़ी एक जली हुई साइकिल याद दिलाती है कि कैसे आमजन की सामान्य ज़िंदगी हिंसा के बाद सामान्य नहीं हो सकी.

 

स्मृति की दीवार: चूड़ाचांदपुर ज़िले के डीसी कार्यालय के बाहर यह स्मारक उन लोगों को समर्पित है जिन्होंने हिंसा में अपनी जान गंवाई. दीवार पर लगे मृतकों के चित्र उनकी ख़ामोश कहानियां बयां करते हैं.

 

मणिपुर में लोगों ने लंबे समय से मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग हो रही थी, जो अंततः 9 फरवरी 2025 को पूरी हुई. बड़ी संख्या में लोगों का मानना है कि राज्य में फैली हिंसा के लिए वही ज़िम्मेदार हैं.

 

हत्याओं के अलावा, मणिपुर में अब भी 30 से अधिक लोग लापता हैं. सरकार अब तक उनका पता लगाने में नाकाम रही है, और उनके परिजन अब सबसे बुरा होने का डर झेल रहे हैं. रंजीता थोंगम अपने पति की तस्वीर लिए, जो 2023 से लापता हैं.

(याक़ूत अली स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

(पुलित्जर सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग के साथ साझेदारी में)