साइबर जासूसी: अमेरिकी कोर्ट ने एनएसओ ग्रुप को 168 मिलियन डॉलर हर्जाना देने को कहा

एक अमेरिकी जूरी ने इज़रायली फर्म एनएसओ ग्रुप के ख़िलाफ़ साइबर जासूसी मामले में वॉट्सऐप को लगभग 168 मिलियन डॉलर का हर्जाना देने का आदेश दिया. वॉट्सऐप ने आरोप लगाया था कि एनएसओ ने ऐप के माध्यम से पत्रकारों, वकीलों, कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों को निशाना बनाया था.

(फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: एक अमेरिकी जूरी ने इजरायली फर्म एनएसओ ग्रुप के खिलाफ साइबर जासूसी मामले में मेटा के स्वामित्व वाले वॉट्सऐप को लगभग 168 मिलियन डॉलर का हर्जाना देने का आदेश दिया.

उत्तरी कैलिफोर्निया में संघीय अदालत में 2019 में दायर मुकदमे में एनएसओ पर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के स्मार्टफोन को हैक करने के लिए अपने पेगासस स्पायवेयर का उपयोग करने का आरोप लगाया गया था. वॉट्सऐप ने आरोप लगाया कि एनएसओ ने ऐप के माध्यम से पत्रकारों, वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों को निशाना बनाया.

मेटा ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा कि इस जांच से यह पता चला है कि एनएसओ की सर्विलांस किराए पर लेने की प्रणाली (surveillance-for-hire system) किस प्रकार काम करती है.

कंपनी के अनुसार, पेगासस स्पायवेयर डिवाइस पर मौजूद ऐप्स से डेटा को गुप्त रूप से एकत्र कर सकता है और यूजर्स की जानकारी के बिना फोन के कैमरे या माइक्रोफ़ोन को सक्रिय कर सकता है.

जूरी ने वॉट्सऐप को प्रतिपूरक हर्जाने के रूप में 4,44,719 डॉलर तथा दंडात्मक हर्जाने, जिसका उद्देश्य इस प्रकार के आचरण को रोकना है, के रूप में 16,72,54,000 डॉलर का अतिरिक्त भुगतान करने का आदेश दिया.

एनएसओ के वैश्विक संचार उपाध्यक्ष गिल लैनर ने कहा कि कंपनी फैसले की समीक्षा करेगी और अपील सहित आगे के कानूनी कदमों पर विचार करेगी. उन्होंने कहा कि एनएसओ की तकनीक का इस्तेमाल अधिकृत सरकारी एजेंसियों द्वारा अपराध और आतंकवाद से निपटने के लिए किया जाता है.

उधर, मेटा ने यह भी कहा कि एनएसओ ने मैसेजिंग ऐप, ब्राउज़र और ऑपरेटिंग सिस्टम के ज़रिये स्पायवेयर इंस्टॉल करने के तरीके विकसित करने में हर साल करोड़ों डॉलर खर्च किए.

कानूनी शिकायत में कहा गया है कि एनएसओ ने वैध ट्रैफ़िक फॉलो करने और दुर्भावनापूर्ण कोड देने के लिए वॉट्सऐप एप्लिकेशन को रिवर्स-इंजीनियर किया, जिससे हमलावरों को डिक्रिप्शन के बाद संदेश सामग्री तक पहुंचने की अनुमति मिली. मेटा ने कहा कि स्वतंत्र विशेषज्ञों ने पाया है कि इस स्पायवेयर का इस्तेमाल ऐसे देशों में किया जा रहा है, जहां मानवाधिकारों के मामले में रिकॉर्ड खराब हैं. कंपनी ने कहा है कि वह वैश्विक स्तर पर यूजर्स को निशाना बनाने वाले स्पायवेयर विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी.

एनएसओ ग्रुप की स्थापना 2010 में शालेव हुलियो और ओमरी लावी द्वारा की गई थी, जो तेल अवीव के पास हर्ज़लिया में स्थित है.

पेगासस और भारत

उल्लेखनीय है कि साल 2021 में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम, जिसमें द वायर  भी शामिल था, ने पेगासस प्रोजेक्ट के तहत यह खुलासा किया था कि इजरायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पायवेयर के जरिये दुनियाभर में नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या फिर वे संभावित निशाने पर थे.

इस कड़ी में 18 जुलाई 2021 से द वायर  सहित विश्व के 17 मीडिया संगठनों ने 50,000 से ज्यादा लीक हुए ऐसे मोबाइल नंबरों के डेटाबेस की जानकारियां प्रकाशित करनी शुरू की थीं, जिनकी पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी की जा रही थी या वे संभावित सर्विलांस के दायरे में थे.

इस पड़ताल के मुताबिक, इजरायल की एक सर्विलांस तकनीक कंपनी एनएसओ ग्रुप के कई सरकारों के क्लाइंट्स की दिलचस्पी वाले ऐसे लोगों के हजारों टेलीफोन नंबरों की लीक हुई एक सूची में 300 सत्यापित भारतीय नंबर पाए गए थे, जिन्हें मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, अधिकार कार्यकर्ताओं आदि द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है.

भारत में इसके संभावित लक्ष्यों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर, तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, अब सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव (वे उस समय मंत्री नहीं थे) के साथ कई प्रमुख नेताओं के नाम शामिल थे.

ज्ञात हो कि एनएसओ ग्रुप का कहना है कि वह मिलिट्री ग्रेड के इस स्पायवेयर को सिर्फ सरकारों को ही बेचती है. एनएसओ ग्रुप ने इस अमेरिकी मामले में कहा है कि इसे जिम्मेदार नहीं माना जा सकता क्योंकि पेगासस का संचालन अपराधों और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों की जांच करने वाले ग्राहकों द्वारा किया गया था. इस तर्क को जज ने खारिज कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में इस मामले की जांच के आदेश दिए थे. इसके द्वारा गठित एक तकनीकी समिति ने पांच फोन में ‘मैलवेयर’ पाया था, लेकिन यह नहीं बता पाई कि यह पेगासस था या नहीं. इसके साथ ही समिति ने जोड़ा था कि उनकी जांच में केंद्र सरकार ने सहयोग नहीं किया था.

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार से जब पूछा गया तो उसने इस बात की पुष्टि या खंडन करने से इनकार कर दिया कि उसने पेगासस खरीदा और उसका इस्तेमाल किया.