कई दशकों की हिंसा के बाद अंततः भारत सरकार और भाकपा (माओवादी) के बीच शांति वार्ता का प्रश्न चर्चा में आया है. परंतु जहां माओवादी लगातार युद्धविराम की अपील कर रहे हैं, सरकार इस बात पर अडिग है कि वे एकतरफा आत्मसमर्पण करें .अमित शाह द्वारा मार्च 2026 तक माओवादियों को ‘समाप्त’ करने की घोषणा के मद्देनजर इन दिनों झारखंड और छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर कर्रेगुट्टा/दुर्गमेट्टा की पहाड़ियों में सुरक्षा बलों के ड्रोन और ज़मीनी अभियान जारी हैं.
हाल ही में, केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार ने कहा है कि सरकार माओवादियों से वार्ता नहीं करेगी क्योंकि वह एक प्रतिबंधित संगठन है.
कई नागरिक संगठनों और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने शांति वार्ता की मांग उठाई है. लेकिन जहां तेलंगाना में कांग्रेस और बीआरएस नेतृत्व ने इस पर सकारात्मक रुख दिखाया है, वहीं छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ऐसी वार्ता की कोई वैधता नहीं है.
यह स्पष्ट है कि भाजपा नक्सलवाद को मिटाने का श्रेय लेना चाहती है, जैसे उसने अनुच्छेद 370 हटाने या राम मंदिर निर्माण को अपनी बड़ी ‘उपलब्धियों’ में गिनाया है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि माओवादियों के साथ बातचीत के ज़रिये शांति की स्थापना को क्यों एक बड़ी उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता .
दरअसल, यह जंग में मिली ‘विजय के बाद आई शांति’ से कहीं अधिक निर्णायक और स्थायी साबित हो सकती है . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह दावा कर सकते थे कि वह जहां एक तरफ़ बाहरी ताकतों से लड़ने की दृढ़ता रखते है वहीं दूसरी ओर अपने लोगों से संवाद के लिए भी रहते हैं .
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद केवल दक्षिण बस्तर में कम से कम चार सौ लोग मारे जा चुके हैं. 2024-25 बस्तर के संदर्भ में पिछले बीस सालों की लगातार चली आ रही संघर्ष की कहानी (काउंटर इंसर्जेंसी) में सबसे अधिक खून खराबे वाला साल साबित हुआ है .अगर हम यह भी मान लें कि मृतकों में से अधिकांश माओवादी कैडर हों,इस बात से फिर भी इनकार नहीं किया जा सकता की निर्दोष नागरिक भी मारे जा रहे हैं. चाहें वह पीड़िया की घटना हो जहां मारे गए कथित 12 माओवादियों में से 10 आम नागरिक थे, या अबूझमाड़ के कुम्मम गांव की जहां सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर पांच निर्दोष नागरिकों को मार दिया था . न केवल वयस्क बल्कि इस घटना में चार बच्चों को भी गोली लगी थी.
2025 की छत्तीसगढ़ सरकार की आत्मसमर्पण नीति के तहत पुलिसकर्मियों को माओवादियों को ‘जिंदा या मुर्दा’ लाने पर इनाम मिलता है, और आत्मसमर्पण कराने पर भी प्रतिशत तय है. रेणुका और सिरीपेल्ली सुधाकर सरीखे दिग्गज माओवादी नेताओं को कथित रूप से हिरासत में लेकर मार दिया गया जबकि उन्हें आसानी से गिरफ्तार किया जा सकता था.
पिछले शांति प्रयास
सुरक्षा विशेषज्ञ आमतौर पर माओवादियों की शांति वार्ता की पेशकश को ले कर संदेह में रहें हैं , उन्हें यह सिर्फ वक्त निकालने और राहत पाने की नीति लगती है .लेकिन इस बार जिस तात्कालिकता से माओवादी संवाद का प्रयास कर रहे हैं, वह एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है.
गौरतलब है की इससे पहले भी शांति वार्ता के कई प्रयास हो चुके हैं. चाहें वह आंध्र प्रदेश में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्री एसआर शंकरण के नेतृत्व में कंसर्न्ड सिटिज़न्स कमेटी की पहल हो , 2009 के लालगढ़ आंदोलन के बाद जंगलमहल में शांति के प्रस्ताव, 2009 हों या फिर सिटिज़न्स इनिशिएटिव फॉर पीस, तथा 2013 में सीपीआई द्वारा बस्तर में निकाली गई पदयात्रा की बात हो परंतु ये सभी जल्द ही ठंडे पड़ गए थे.
इस बार सरकार मज़बूत स्थिति में है और माओवादियों के पास संवाद की शक्ति नहीं बची है. अगर यह वार्ता पिछले वर्षों में हुई होती तो वे बस्तर में खनन पर रोक या अपने लिए स्वायत्तता जैसे मुद्दे रख सकते थे, लेकिन इस बार ऐसी शर्तें आसान नहीं होंगी.
यह भी सही है कि सरकार जब कभी कुछ शर्तें मानती भी है- मसलन ओडिशा में कलेक्टर विनील कृष्णा की रिहाई के दौरान हुई वार्ता- तो भी वायदे पूरे नहीं होते. कोलंबिया या नेपाल जैसे देशों में शांति संधियों का क्रियान्वयन अक्सर असंतोषजनक रहा है. इस समय सरकार के लिए वार्ता का अर्थ माओवादियों को आत्मसमर्पण कराना है, कोई व्यापक राजनीतिक समाधान नहीं.
न्यायपालिका की विफलता
इस हिंसक संघर्ष में न्यायपालिका एक निष्पक्ष मध्यस्थ की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती थी, लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं हुआ . 2011 में जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एसएस निज्जर ने सलवा जुडूम और पूर्व नक्सलियों को हथियार देने की प्रक्रिया पर रोक लगाई गई थी, जो एक अहम हस्तक्षेप था. लेकिन उस आदेश को 14 साल बीत चुके हैं. छत्तीसगढ़ सरकार इस निर्णय की अवहेलना करते हुए आत्मसमर्पित माओवादियों को अग्रिम पंक्ति के लड़ाकों के रूप में तैनात करती आ रही है.
सरकार ने बलात्कार, हत्या और आगज़नी जैसे अपराधों और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए भी आज तक किसी को दंडित नहीं किया है, न ही राज्य हिंसा के शिकार नागरिकों को नक्सली हिंसा के शिकार लोगों के बराबर मुआवजा दिया है, जबकि अदालत ने ऐसा करने का निर्देश दिया था. जून 2025 को सलवा जुडूम को बीस वर्ष हो जाएंगे – हिंसा के बीस वर्ष, क्योंकि अदालतें अनदेखी करती रहीं.
आम नागरिक: तीसरा और आवश्यक पक्ष
आज जब सरकार बल प्रयोग पर अड़ी है, माओवादियों के पास शक्ति नहीं है, और न्यायपालिका मूकदर्शक बनी हुई है, यह आवश्यक है कि प्रभावित जनता खुद अपनी मांगें उठाए और यह परिभाषित करे कि उनके लिए ‘शांति’ का क्या अर्थ है. जिनके नाम पर दोनों पक्ष लड़ने का दावा करते हैं, उनके बगैर संवाद नहीं हो सकता. अधिकांश माओवादी कैडर, समर्थक, डीआरजी और बस्तर फाइटर-कोया आदिवासी समुदाय से हैं. यह संघर्ष उस समुदाय में एक गहरी दरार पैदा कर रहा है.
ऐसी स्थिति में पहला कदम युद्धविराम होना चाहिए. सरकार अपने मध्यस्थों के नाम घोषित करे, गुरिल्ला दल आपसी संवाद के जरिये वार्ता की तैयारी करें.
सबसे बेहतर तो यह होता कि सर्वोच्च न्यायालय पहल करते हुए मध्यस्थ नियुक्त करे .
शांति बनाम खनन
सभी पक्षों के लिए शांति का एक भिन्न अर्थ है. सरकार के लिए ‘शांति’ का अर्थ है खनन के लिए बुनियादी परिस्थितियों का निर्माण. छत्तीसगढ़ के प्रस्तावित 108 खनन ब्लॉकों में से 39 बस्तर में हैं. यहां नए खनिज भंडार-कोरंडम, लिथियम, सोना-भी खोजे जा रहे हैं. सरकार कहती है कि हिंसा के कारण गांवों को स्कूल, अस्पताल, बिजली नहीं मिल पा रही, लेकिन सरकार यह नहीं बताती कि माओवादियों से मुक्त क्षेत्रों में ये सुविधाएं आख़िर क्यों नहीं हैं? या फिर सड़कें बनने के बावजूद इन इलाकों में स्कूल क्यों नहीं पहुंचते?
जहां तक माओवादियों की बात है, संभवतः उनके लिए ‘शांति’ का अर्थ थोड़ी सांस लेने की जगह पर उनकी राजनीति का कोई अन्य वैकल्पिक मार्ग हो सकता है. कोलंबिया में एफएआरसी ने ‘मुख्यधारा में पुनःएकीकरण’ का विरोध करते हुए कहा था कि वे कभी जनता से अलग हुए नहीं थे, उन्होंने संगठन को नहीं त्यागा था, बल्कि वे दैनिक राजनीति की भूमि पर संगठितहो रहे थे.
इसके विपरीत आम नागरिक के लिए शांति का अर्थ कहीं अधिक समृद्ध और जटिल है. हथियार की अनुपस्थिति से शांति नहीं आती- शांति का मतलब है दैनिक स्तर की संरचनात्मक हिंसा का अंत. 1980 के दशक में लोगों ने माओवादियों का समर्थन इसलिए किया क्योंकि उन्होंने दमनकारी वन रक्षकों और पटवारी को बाहर रखा और लोगों को नई ज़मीनों पर खेती करने में मदद की. वह ‘शांति’ जो राज्य के भ्रष्टाचार, नागरिक के विस्थापन और बाहरी अतिक्रमण को जंगल में वापस लाती है, शांति नहीं है.
मोनिका केरेर ने 2009 के बाद जंगलमहल की स्थिति पर किताब लिखी है, हाउ पीपल रेस्पोंड टू वायलेंस. वे लिखती हैं कि संथाल समुदाय खुद को मूलतः शांतिप्रिय मानता है जिसे हथियार उठाने के लिए मजबूर किया गया. गांवों में निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं. उनके लिए शांति का अर्थ भय से मुक्ति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन था. बस्तर की तुलना आप कोलंबिया के हिंसक आंदोलनसे कर सकते हैं, जहां ‘क्षेत्रीय शांति’ की अवधारणा प्रमुख थी, और जहां हिंसा के शिकार हुए लोगों की सक्रिय भागीदारी से ज़मीन और संसाधनों का पुनर्वितरण हुआ था.
तत्काल मांगें और न्याय के प्रश्न
शांति के भले ही भिन्न अर्थ हों, बस्तर के नागरिक सर्वसम्मति से मानते हैं कि शांति स्थापना के लिए सबसे पहले सुरक्षा बलों के शिविरों का हटाया जाना चाहिए. आज पूरा बस्तर एक विशाल छावनी बन गया है, जहां थोड़ी दूरी पर, कुछेक किलोमीटर पर सुरक्षा शिविर तैनात हैं. ये शिविर बिना अनुमति के निजी और सामूहिक भूमि पर बने हैं.
शांति वार्ता की सफलता के बाद शिविरों का कोई आधिकारिक औचित्य नहीं रह जाएगा. लेकिन अपने मिलिट्री दृष्टिकोण के तहत सरकार कह सकती है कि बचे-खुचे माओवादियों से निबटने के लिए ये शिविर आवश्यक हैं.
अगर माओवादियों के जाने के बाद भी शिविर बने रहे, तो लोगों को डर है कि पुलिस की बंदूकें खनन का विरोध करने वाले गांववालों पर मुड़ जाएंगी. खनन की प्रक्रिया वन भूमि को नष्ट करती है, विस्थापन लेकर आती है और बेशुमार बाहरी व्यक्तियों को आदिवासी की ज़मीन पर ले आती है. लोगों को यह डर भी है कि उनकी ज़मीनों पर निर्मित हो रहे हाईवे सरकार और ठेकेदारों के भ्रष्ट गठजोड़ को बढ़ावा देते हैं.
पिछले 25 वर्षों में माओवादी-संबंधी आरोपों में गिरफ्तार लगभग 16,733 लोगों की रिहाई किसी भी शांति वार्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए. संविधान की 5वीं अनुसूची के कार्यान्वयन की मांग कर रहे ग्राम युवा मंच ‘मूलवासी बचाओ मंच’ पर लगा प्रतिबंध हटना चाहिए और इसके नेताओं की रिहाई होनी चाहिए. योग्य और सक्षम युवाओं के बिना बस्तर में शांति नहीं आ सकती.
न्याय शांति का रूपक है
पिछले बीस वर्षों की हिंसा-हत्याएं, बलात्कार, विस्थापन-से जुड़े सवालों का समाधान शांति वार्ता का हिस्सा होना चाहिए. अब तक किसी भी राजनेता, सरकारी अधिकारी या पुलिसकर्मी पर फर्ज़ी मुठभेड़ या सलवा जुडूम जैसे निजी मिलिशिया को बढ़ावा देने के लिए मुकदमा नहीं चला है.
सरकार की आत्मसमर्पण नीति 2025 की धारा 7.7.3 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति नक्सलवाद उन्मूलन में योगदान देता है, तो उसके विरुद्ध मामले समाप्त किए जा सकते हैं. यह नीति आत्मसमर्पण करने वालों को ज़बरन पुलिस बल में शामिल करने का हथियार बन गई है. कुछ मामलों में, पहले से आत्मसमर्पण कर चुके लोगों के पुराने मुकदमे फिर से खोले गए हैं.
इस दोहरे मापदंड का विरोध होना चाहिए, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि हिंसा झेल रहे गांववाले क्या चाहते हैं. क्या वे चाहते हैं कि दोनों पक्षों (सुरक्षा बल और माओवादी) को उनकी हिंसा के लिए कटघरे में लाया जाए, या इन दोनों को नई शुरूआत का एक मौका मिले? इसके बावजूद यह न्यायसंगत होगा कि बस्तर में 2005 से अब तक मारे गए नागरिकों, माओवादियों और सुरक्षाकर्मियों की पूरी गणना हो और उनके परिजनों को मुआवजा मिले.
हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार की एक टीम तेलंगाना में उन लोगों से मिली जो सलवा जुडूम के दौरान पलायन कर गए थे. लेकिन यदि उन्हें शिविरों या अलग गांवों में रखा गया, तो इससे फिर टकराव बढ़ेगा. एकमात्र रास्ता है कि गांवों के भीतर जन-आधारित शांति प्रक्रिया स्थापित हो, और एसपीओ तथा उनके परिवार घर लौट सकें.
शांति वार्ता का अमूमन अर्थ होता है गुरिल्ला दलों का विघटन, लड़ाकों का समाज या सुरक्षा बलों में एकीकरण, और पुनर्वास. यही नेपाल में हुआ था. छत्तीसगढ़ में गिरफ्तार या आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों को एसपीओ, डीआरजी या बस्तर फाइटर के रूप में शामिल किया जा रहा है. इसलिए पुलिस के इन सहायक बलों का भी विघटन होना चाहिए. ये बेकाबू हो चुके हैं, हिंसा और उत्पीड़न में लिप्त हैं. इन्हें कोई और रोज़गार देना एक बड़ी चुनौती होगी.
‘शांति’ कोई एक बार में हासिल हो जाने वाली चीज नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया है. किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि ‘शांति’ का मतलब कुछ और होगा सिवाय निजी खनन को और तेज़ी से आगे बढ़ाने के. लेकिन कम से कम सरकार माओवादियों का बहाना लेकर हर विरोध को कुचल नहीं पाएगी, और शायद माओवादियों की ऊर्जा और समझ जन आंदोलनों को और मज़बूत कर सके. सबसे ज़रूरी बात यह है कि जो लोग इस संघर्ष से प्रभावित हुए हैं, वे अपनी आवाज़ खुद उठाएं और शांति को अपने अनुभव और शर्तों के मुताबिक परिभाषित करें — बिना किसी बंदूक की परछाईं के, चाहे वो किसी भी तरफ़ से हो.
(नंदिनी सुंदर दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं. यह लेख मूल अंग्रेजी में लिखा गया था.)
