वाराणसी: पिछले महीने जौनपुर की एससी-एसटी कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए चार पत्रकारों पर दर्ज फर्जी मुकदमे को निरस्त कर दिया. मामला दो साल पुराना था, जब उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के पेसारा गांव की एक गौशाला की बदहाल स्थिति और मरणासन्न गौवंशों पर रिपोर्ट प्रकाशित करने के बाद ग्राम प्रधान चंदा देवी ने चार पत्रकारों पर गंभीर धाराओं में केस दर्ज करवाया था. पत्रकार पंकज सिंह, आदर्श मिश्रा, अरविंद यादव और विनोद कुमार के खिलाफ पुलिस ने गंभीर धाराओं के तहत 24 मार्च 2023 को केस दर्ज किया था.
हाईकोर्ट का फैसला
सितंबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा था, ‘केराकत कोतवाली पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर प्रताड़ना और द्वेष से प्रेरित थी, इसलिए इसे रद्द किया जाता है.’ साथ ही कोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकार लगाई थी और राज्य सरकार से भी रिपोर्ट मांगी थी.
हालांकि, हाईकोर्ट के आदेश की प्रति एससी-एसटी कोर्ट जौनपुर तक पहुंचने और वहां से अंतिम आदेश जारी होने में छह महीने का वक्त लग गया. 17 अप्रैल 2025 को एससी-एसटी कोर्ट के न्यायाधीश अनिल कुमार यादव ने हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए मुकदमे को रद्द करने का आदेश दिया.
मामला एससी-एसटी कोर्ट में क्यों गया?
चूंकि इस मामले की शिकायतकर्ता चंदा देवी दलित थीं, इसलिए मामला विशेष एससी-एसटी कोर्ट में स्थानांतरित किया गया. लेकिन गौरतलब है कि पत्रकार विनोद कुमार स्वयं दलित हैं, बावजूद इसके एफआईआर में उन्हें यादव (पिछड़ी जाति) बताया गया और उनके खिलाफ एससी-एसटी एक्ट समेत पांच गंभीर धाराएं लगाई गईं.
21 मार्च 2023 को इन पत्रकारों ने पेसारा गांव की एक अस्थायी गौशाला में मरणासन्न गायों और बदहाल हालात पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी. यह खबर जौनपुर के स्थानीय अखबार ‘तेजस टुडे’ में प्रकाशित हुई थी, जिसके संवाददाता विनोद कुमार हैं.
खबर छपने के बाद ग्राम प्रधान चंदा देवी ने नाराज़ होकर चारों पत्रकारों एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ 24 मार्च को एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसमें इन पर आरोप लगाया गया कि ‘वे 21 मार्च 2023 को सुबह 7 बजे गांव की गौशाला में घुस आए और वहां मौजूद 115 मवेशियों को परेशान किया, जिससे मवेशी इधर-उधर दौड़ने लगे और आवाज़ करने लगे.’
एफआईआर में लिखा था कि जब ग्राम प्रधान अपने पति के साथ गौशाला पहुंचीं और आरोपियों से पूछा कि उन्होंने बिना अनुमति गौशाला में प्रवेश क्यों किया. एफ़आईआर के अनुसार इसके बाद आरोपियों ने कथित रूप से ग्राम प्रधान को जातिसूचक अपशब्द कहे और मवेशियों का वीडियो बनाया. उन पर आरोप था कि उन्होंने वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड न करने के बदले 20,000 रुपये की मांग भी की.
पुलिस कार्रवाई पर सवाल और पत्रकारों का विरोध
स्थानीय पत्रकारों ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए वरिष्ठ अधिकारियों से कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. अंततः पत्रकारों ने 3 अप्रैल 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की.
हाईकोर्ट ने पाया कि एफआईआर दुर्भावना से दर्ज की गई थी और निष्पक्ष पत्रकारिता पर हमला था. अदालत ने जौनपुर की केराकत कोतवाली में दर्ज एफआईआर को निराधार मानते हुए रद्द कर दिया और यूपी सरकार को फटकार भी लगाई.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, ‘न्यायालय ने पाया कि यह एफआईआर केवल इसलिए दर्ज कराई गई थी ताकि अपीलकर्ताओं (पत्रकारों) द्वारा सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए गौशाला के वीडियो को हटवाने के लिए उन पर दबाव बनाया जा सके. अतः यह एफआईआर विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग है.’
पत्रकार अरविंद यादव ने द वायर हिंदी से बातचीत में बताया, ‘हमने सिर्फ सच्चाई दिखाई थी. बावजूद इसके हमारे खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया.’
पत्रकार दीप नारायण सिंह ने मुकदमे के रद्द होने को सत्य की जीत बताया. उन्होंने कहा, ‘अगर सिस्टम की खामियों को दिखाने पर मुकदमे दर्ज होंगे, तो फिर सच दिखाने की हिम्मत कौन करेगा? यह रवैया तो तानाशाही का प्रतीक है.’
दलित पत्रकार को बनाया गया निशाना
जौनपुर के सेनापुर गांव निवासी पत्रकार विनोद कुमार ने कहा, ‘मैं दलित हूं, बावजूद इसके एफआईआर में मुझे यादव जाति का बताकर मेरे खिलाफ एससी-एसटी एक्ट समेत कई गंभीर धाराएं लगाई गईं. मेरी आर्थिक स्थिति खराब है, इसलिए पुलिसिया उत्पीड़न का डर हमेशा बना रहा.’
हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद उन्हें राहत मिली. विनोद ने कहा, ‘कोर्ट ने परीक्षण में पाया कि मुकदमा फर्जी है और उसे रद्द कर दिया गया.’
अब विनोद कुमार एससी-एसटी आयोग और प्रेस परिषद में मानहानि का मामला उठाने की तैयारी में हैं. वह कहते हैं, ‘ताकि आगे किसी पत्रकार को ऐसी पीड़ा न सहनी पड़े.’
पुलिस की कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी
गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के पुलिस के रवैये पर नाराज़गी जताई थी. कोर्ट ने कहा था कि यूपी पुलिस थानों में मनमाने तरीके से एफआईआर दर्ज कर रही है. हालांकि,सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी का असर अभी तक जमीनी स्तर पर नहीं दिख रहा है.
