मुंबई: कभी प्रतिरोध की आवाज के रूप में विख्यात फैज अहमद फैज की क्रांतिकारी गीत ‘हम देखेंगे‘ पर अब भारत में राजद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा है.
पिछले हफ़्ते अभिनेता और कार्यकर्ता वीरा साथीदार की याद में आयोजित एक कार्यक्रम में युवा सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने फैज़ के मशहूर गीत ‘हम देखेंगे’ का कुछ हिस्सा गया था. अब नागपुर पुलिस ने अब आयोजकों और कार्यक्रम के वक्ता पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के तहत मामला दर्ज किया है, जो राजद्रोह से संबंधित है, साथ ही बीएनएस की अन्य धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया है, जिसमें धारा 196 (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और धारा 353 (सार्वजनिक उपद्रव के लिए अनुकूल बयान) शामिल हैं.
एक सफल अभिनेता, लेखक, पत्रकार और राजनीतिक विचारक साथीदार का 13 अप्रैल, 2021 को कोविड-19 से एक सप्ताह से अधिक समय तक जूझने के बाद निधन हो गया था. उनके निधन के बाद से उनकी पत्नी पुष्पा ने एक वार्षिक मेमोरियल का आयोजन करती हैं जिसमें इस वर्ष सामाजिक कार्यकर्ता उत्तम जागीरदार को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था. हालांकि एफआईआर में स्पष्ट रूप से व्यक्तियों का नाम नहीं है, लेकिन इसमें कार्यक्रम के आयोजक और वक्ता का उल्लेख है.
13 मई को विदर्भ साहित्य संघ में आयोजित कार्यक्रम – जिसमें 150 से अधिक लोग शामिल हुए, में जागीरदार ने विवादास्पद महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक, 2024 के बारे में बात की थी. भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार इस विधेयक को कानून में बदलने और इसे लागू करने के लिए आक्रामक रूप से प्रयास कर रही है.
हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों का मानना है कि अगर यह विधेयक लागू हो जाता है, तो इससे मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होगा और असहमति जताने वालों को ‘अर्बन नक्सली’ करार दिया जाएगा.
‘एक पाकिस्तानी कवि’
नागपुर के एक स्थानीय निवासी दत्तात्रेय शिर्के द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में मराठी चैनल एबीपी माझा पर प्रसारित एक समाचार रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. यह चैनल संभवतः पहला चैनल था जिसने भारत में फैज़ की कविता सुनाने में समस्या पाई. अपनी शिकायत में शिर्के ने दावा किया है, ‘ऐसे समय में जब देश ने पाकिस्तानी सेना के साथ बहादुरी से लड़ाई लड़ी, नागपुर में कट्टरपंथी वामपंथी पाकिस्तानी कवि फैज़ अहमद फैज़ की कविता गाने में व्यस्त थे.’
शिर्के ने आगे दावा किया कि ‘तख्त हिलाने’ वाली पंक्ति सरकार के लिए सीधी धमकी है. हालांकि, एफआईआर में उपरोक्त पंक्ति का हवाला दिया गया है, लेकिन रचना की वास्तविक पंक्ति है ‘सब तख्त गिराए जाएंगे’. इस कविता का प्रदर्शन समता कला मंच के मुंबई स्थित युवा सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया था.
राजद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी रोक के बावजूद नागपुर पुलिस ने आयोजकों और वक्ताओं पर इस धारा के तहत मामला दर्ज किया है.
उल्लेखनीय है कि शीर्ष न्यायालय ने 11 मई को जारी अपने ऐतिहासिक आदेश में इस विवादास्पद कानून पर उस वक्त तक के लिए रोक लगा दी थी, जब तक कि केंद्र औपनिवेशिक काल के इस कानून की समीक्षा करने के अपने वादे को पूरा नहीं करता है.
सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष पीठ ने कहा था कि हम उम्मीद करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें किसी भी एफआईआर को दर्ज करने, जांच जारी रखने या आईपीसी की धारा 124ए (राजद्रोह) के तहत जबरदस्ती क़दम उठाने से तब तक परहेज़ करेंगी, जब तक कि यह पुनर्विचार के अधीन है. यह उचित होगा कि इसकी समीक्षा होने तक क़ानून के इस प्रावधान का उपयोग न किया जाए.
उसके बाद भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने आईपीसी को बीएनएस से बदल दिया है. हालांकि, नया कानून राजद्रोह के प्रावधान को खत्म नहीं करता है. इसके बजाय बीएनएस धारा 152 का प्रावधान देता है, जो राजद्रोह कानून से काफी मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें ‘राजद्रोह’ शब्द का स्पष्ट रूप से उपयोग नहीं किया गया है.
इसी महीने पत्रकार को गिरफ्तार किया गया
इस महीने यह दूसरा मामला है जिसमें नागपुर पुलिस ने किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निशाना बनाया है. इस महीने की शुरुआत में नागपुर आए केरल के 26 वर्षीय पत्रकार रेजाज एम. शीबा सिद्दीक को दो नकली बंदूकों के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट करने और भारतीय सेना का विरोध करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.
नागपुर शहर पुलिस द्वारा शुरू में जांच की गई और अब आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) द्वारा संभाले जा रहे मामले में रेजाज पर ऑपरेशन सिंदूर का विरोध करने का आरोप है.
एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया है कि रेजाज के प्रतिबंधित संगठनों से संबंध हैं, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी), जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) और हिज्ब-उल-मुजाहिदीन शामिल हैं. इन प्रतिबंधित संगठनों की विचारधाराएं बिल्कुल अलग हैं और पुलिस ने रेजाज पर इन प्रतिबंधित समूहों में से प्रत्येक की विचारधाराओं का समर्थन करने का आरोप लगाया है.
वीरा साथीदार का अंतहीन विरोध
अपने जीवनकाल में साथीदार को अपनी राजनीतिक सक्रियता के कारण पुलिस से लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसके कारण वे पुलिस की रडार पर रहे. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले द वायर के साथ एक लंबे साक्षात्कार में साथीदार ने सरकार द्वारा अपने नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए नए-नए तरीके अपनाने की रणनीति पर चिंता जताई थी. उदाहरण के लिए 2013 में कोर्ट फिल्म की शूटिंग के दौरान गोंदिया पुलिस मुंबई के सेट पर पहुंच गई और ‘नागपुर के नक्सली’ की तलाश करने लगी. उनके देहांत से एक साल पहले नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मुख्यालय के खिलाफ मुद्दे उठाने के बाद स्थानीय पुलिस ने उनके घर पर छापा मारा था. छापे के दौरान एक तलवार बरामद हुई थी, लेकिन स्थानीय युवकों ने पुलिस को भगा दिया.
अक्टूबर 2020 में जब एनआईए ने एल्गार परिषद मामले में पूरक आरोपपत्र दाखिल किया, तो साथीदार का नाम तथाकथित ‘अर्बन नक्सलियों’ में शामिल हो गया, यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने असहमति जताने वालों को निशाना बनाने के लिए किया है. अब, महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक के साथ राज्य सरकार कानूनी ढांचे के भीतर ‘अर्बन नक्सल’ शब्द को औपचारिक रूप देना चाहती है.
सरकार ने साथीदार को जीवित रहते हुए अपराधी बनाने के कई प्रयास किए थे और उनकी मृत्यु के बाद भी ऐसे प्रयास जारी रहे.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
