नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल स्थित मुग़लकालीन शाही जामा मस्जिद के सर्वे के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा है कि हिंदू पक्षकारों द्वारा दाखिल की गई याचिका प्रथमदृष्टया साल 1991 के उपासना स्थल अधिनियम के तहत प्रतिबंधित नहीं है.
हाईकोर्ट ने सोमवार (19 मई) को मस्जिद के प्रबंधकों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 19 नवंबर 2024 को संभल की निचली अदालत द्वारा पारित सर्वे आदेश को चुनौती दी गई थी.
हिंदू पक्षकारों द्वारा दी गई अर्जी पर सुनवाई करते हुए नवंबर 2024 में संभल के एक ट्रायल कोर्ट ने मस्जिद का सर्वे कराने का आदेश दिया था और इसके लिए एक अधिवक्ता कमिश्नर की नियुक्ति की थी. याचिकर्ताओं का दावा था कि बाबर के शासनकाल में बनी यह मस्जिद एक प्राचीन हिंदू मंदिर- हरिहर मंदिर थी, जो विष्णु के कल्कि अवतार को समर्पित थी.
निचली अदालत के आदेश के कुछ ही घंटों के भीतर विवादास्पद ढंग से मस्जिद का प्रारंभिक सर्वे किया गया. इसके बाद 24 नवंबर की सुबह अधिवक्ता कमिश्नर रमेश राघव की अगुवाई में सर्वे टीम मस्जिद की दूसरी बार फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करने पहुंची. इस दौरान मस्जिद के आसपास के इलाकों में हिंसा भड़क उठी, जिसमें कम से कम पांच मुस्लिम व्यक्तियों की मौत हो गई.
मस्जिद पक्ष का तर्क: विवाद 1878 में ही निपट चुका है
मस्जिद की प्रबंध समिति ने निचली अदालत के आदेश को तीन आधारों पर हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. समिति ने कोर्ट के समक्ष कहा था कि अदालत ने हिंदू पक्षकारों को नोटिस अवधि समाप्त होने से पहले ही याचिका दायर करने की अनुमति दी थी, और सर्वे के लिए अधिवक्ता कमिश्नर की नियुक्ति और उसी दिन सर्वे हो जाना, जबकि कोई आपात स्थिति नहीं थी.
मस्जिद कमेटी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एसएफए नक़वी ने दलील दी कि यह मस्जिद प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904 (एएमपीए) के तहत संरक्षित स्मारक है. साल 1927 में मुरादाबाद के कलेक्टर और मस्जिद के मुतवल्लियों के बीच एक समझौता हुआ था, जो अब भी लागू है. नक़वी ने यह भी कहा कि 1878 में इस विवाद का समाधान हो चुका था और इसे दोबारा नागरिक अदालत में नहीं उठाया जा सकता.
नक़वी ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि इस कानून के लागू होने के बाद किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव नहीं किया जा सकता, इसलिए यह सुनवाई योग्य नहीं है.
हालांकि, जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने मस्जिद पक्ष की तीनों दलीलों को खारिज कर दिया.
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिवक्ता कमिश्नर की नियुक्ति से मस्जिद प्रबंध समिति को कोई पूर्वाग्रह नहीं हुआ है, क्योंकि वह इस रिपोर्ट पर बाद में आपत्ति दर्ज करा सकती है, जब उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाएगा.
‘निचली अदालत के आदेश में किसी प्रकार के हस्तक्षेप किए जाने की आवश्यकता नहीं है’
जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की 27 फरवरी की रिपोर्ट से पहली नजर में यह साबित होता है कि हिंदू पक्षकारों की यह आशंका सही हो सकती है कि मस्जिद के प्रबंधक जल्दी-जल्दी मंदिर से जुड़े चिह्न या निशान हटा सकती थी, इसलिए मौके पर जांच कराना जरूरी था.
एएसआई की रिपोर्ट में कहा गया था कि मस्जिद प्रबंध समिति ने पहले कई मरम्मत और नवीनीकरण कार्य किए हैं, जिससे ऐतिहासिक ढांचे में ‘संशोधन और बदलाव’ हुआ है. मस्जिद की फ़र्श को पूरी तरह से नए टाइल्स और पत्थरों से बदल दिया गया है और अंदरूनी दीवारों को गाढ़े रंगों की इनेमल पेंट से रंग दिया गया है, जिससे मूल सतह छिप गई है.
जस्टिस अग्रवाल ने कहा, ‘इसलिए स्थानीय जांच की अनुमति देने से याचिकाकर्ता (मस्जिद पक्ष) के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ता. सर्वे करने वाला वकील सिर्फ मौके की जो स्थिति है, वही रिपोर्ट में दर्ज करेगा. अगर मस्जिद पक्ष चाहे तो उस रिपोर्ट पर सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 26, नियम 10(2) के तहत आपत्ति दर्ज कर सकता है, इससे पहले कि उसे रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए.’
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यह मुकदमा प्रथमदृष्टया 1991 के अधिनियम के प्रावधानों से बाधित नहीं है. जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि यह मुकदमा मस्जिद में प्रवेश के अधिकार को लेकर 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम की धारा 18 के तहत दायर किया गया है. यह मामला ‘किसी पूजा स्थल को बदलने या उसकी धार्मिक प्रकृति को बदलने’ का नहीं है.
मस्जिद कमेटी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस अग्रवाल ने कहा, ‘मामले की परिस्थितियों को देखते हुए मैं पाता हूं कि निचली अदालत द्वारा 19 नवंबर 2024 को पारित आदेश में किसी प्रकार का हस्तक्षेप किए जाने की आवश्यकता नहीं है.’
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