नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर एक विदेशी नागरिक को राहत देने से इनकार कर दिया है, जिन्होंने अपनी जान को खतरा बताते हुए अपने देश में निर्वासित न किए जाने की मांग की थी. साथ ही अदालत ने पूछा कि क्या भारत एक धर्मशाला या सराय है, जो सभी के लिए खुला है.
सुप्रीम कोर्ट एक श्रीलंकाई तमिल नागरिक द्वारा आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपनी सात साल की जेल की सजा पूरी करने के बाद भारत में बसने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था.
खबरों के अनुसार, याचिकाकर्ता को 2015 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के साथ कथित संबंधों के लिए गिरफ्तार किया गया था, जिसे एक आतंकवादी संगठन घोषित किया था. तमिलनाडु की एक निचली अदालत ने उन्हें 10 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने इसे घटाकर सात वर्ष कर दिया था, तथा कहा था कि उन्हें अपनी सजा पूरी होने के बाद तमिल शरणार्थी शिविर में रहना होगा, तथा यथाशीघ्र निर्वासित किया जाना होगा.
हालांकि, उनके वकील ने 19 मई को सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि चूंकि उनकी पत्नी और बच्चे भारत में बस गए हैं, इसलिए वह भी देश में रहना चाहेंगे, तथा उन्हें उनके देश वापस नहीं भेजा जाना चाहिए, क्योंकि वहां उनकी जान को खतरा हो सकता है.
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के. विनोद की शीर्ष अदालत की पीठ ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया और उनके वकील से पूछा, ‘क्या भारत को दुनिया भर से शरणार्थियों की मेजबानी करनी है? यह कोई धर्मशाला नहीं है…’
यह सुझाव देते हुए कि याचिकाकर्ता किसी अन्य देश में जा सकता है, दो न्यायाधीशों की पीठ ने आगे सवाल किया, ‘यहां बसने का आपका क्या अधिकार है?’
सीएए में श्रीलंकाई तमिलों को भी शामिल करने की हुई थी मांग
उल्लेखनीय है कि जब नरेंद्र मोदी सरकार ने 2019 में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों को यहां स्थान देने के लिए नागरिकता अधिनियम (सीएए) में संशोधन किया था, तो संशोधन के दायरे में श्रीलंकाई तमिलों को भी शामिल करने की काफी मांग हुई थी.
तमिल याचिकाकर्ता को भारत में रहने की अनुमति देने से शीर्ष अदालत का इनकार सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 8 मई को दिए गए एक अन्य आदेश के बाद आया है, जहां भी अदालत ने रोहिंग्या शरणार्थी के निर्वासन पर रोक लगाने की याचिका के संबंध में इसी तरह के सवाल उठाए थे.
उस पीठ में जस्टिस दीपांकर दत्ता के अलावा सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह भी शामिल थे. उस पीठ ने कथित तौर पर कहा था, ‘निवास का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए है. यह विदेशियों के लिए उपलब्ध नहीं है.’
16 मई को एक रिट याचिका, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों तथा कैंसर जैसी बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों सहित 43 रोहिंग्याओं को भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय जल में फेंकने के बाद जबरन म्यांमार निर्वासित किया गया था, पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सिंह और जस्टिस सूर्यकांत ने रोहिंग्याओं के निर्वासन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाएं दायर करने के लिए वरिष्ठ सर्वोच्च न्यायालय के वकील कोलिन गोंजाल्विस को फटकार लगाई थी.
इसे ‘काल्पनिक’ और ‘खूबसूरती से गढ़ी गई कहानियां’ कहते हुए पीठ ने गोंजाल्विस से कहा था, ‘जब देश ऐसे कठिन समय से गुज़र रहा है, तो आप काल्पनिक विचार लेकर आते हैं.’ कोर्ट ने जोड़ा था, ‘आप हर दिन एक नई कहानी लेकर आते हैं. इस कहानी का आधार क्या है? बहुत खूबसूरती से गढ़ी गई कहानी है!’
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, ‘अदालत ने उनसे यह दिखाने को कहा कि उनके आरोपों को पुष्ट करने के लिए क्या सामग्री है, रोहिंग्याओं के बारे में जानकारी का स्रोत क्या है, उनके दावों को कौन सत्यापित करेगा, तथा उस व्यक्ति का विवरण भी बताने को कहा, जो इस बारे में व्यक्तिगत जानकारी होने का दावा कर रहा है.’
भारत द्वारा इस तरह के निर्वासन पर संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीठ ने गोंजाल्विस से अदालत में सामग्री प्रस्तुत करने को कहा था, जिसमें कहा गया था, ‘बाहर बैठे लोग हमारे अधिकार या हमारी संप्रभुता को निर्देशित नहीं करते हैं.’
