रोहिंग्या शरणार्थियों को समुद्र में फेंकना क्रूर सरकारी नीति की निशानी

स्वामी विवेकानंद आज अपने देश के बारे में क्या सोचते, जो अन्य धर्मों तथा देशों के प्रताड़ित शरणार्थियों को दमनकारी कारागृहों में डाल देता है, उन्हें गोलियों के बीच धकेल देता है, और कभी उन्हें नरसंहार का शिकार बनने के लिए समुद्र में फेंक देता है. 

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले ग्यारह वर्षों में भारत के लोग सरकारी तंत्र द्वारा निशाना बनाकर की जाने वाली क्रूरता के आदी हो गए हैं. ऐसी घटनाएं हमारी चेतना को सुन्न कर देती हैं. बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया के मुसलमानों के घरों को बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया जाता है. असहमति की आवाज़ उठाने वाले लोगों को बिना किसी उचित प्रक्रिया के वर्षों तक जेलों में बंद कर के रखा जाता है. पुलिस की गोलियों से हज़ारों लोग मारे जाते हैं या हमेशा के लिए अपंग हो जाते हैं. धार्मिक स्थलों को ध्वस्त कर दिया जाता है. पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है जबकि भीड़ द्वारा लोगों को पीट-पीटकर मार डाला जाता है.

लेकिन घृणा की राजनीति के इन मानकों के अनुसार भी भारत की सरकार का और अधिक पतन हुआ है. सरकार द्वारा नियंत्रित मीडिया द्वारा निर्मित मोटी दीवारों के बावजूद कई रिपोर्ट सामने आईं कि 40 रोहिंग्याओं – जिनमें महिलाएं, किशोर, बुज़ुर्ग और एक कैंसर रोगी शामिल थे – को नौसेना के जहाज़ से समुद्र में फेंक दिया गया. उन्हें तैर कर म्यांमार के तट पर जाने के लिए छोड़ दिया गया. यह वही भूमि है जहां से नरसंहार से बचने के लिए वे भागकर आए थे. जब मैंने पहली बार ये ख़बर सुनी तो मुझे भरोसा नहीं हुआ. थोड़े समय के बाद मैं शर्म और क्रोध से भर गया.

पहलगाम हमले के बाद भारतीय मुसलमानों और भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए नफरत बढ़ी

यह हास्यास्पद घटना पहलगाम आतंकी हमले के बाद फैली नफ़रत की आंधी के मद्देनज़र हुई. टेलीविज़न स्टूडियो और दक्षिणपंथी सोशल मीडिया हैंडल ग़ुस्से से भर उठे और सिर्फ़ पाकिस्तानियों पर ही नहीं बल्कि उन लोगों पर भी निशाना साधा गया जिनके बारे में उनका आरोप था कि वे पाकिस्तानी आतंकवाद के प्रतिनिधि और समर्थक हैं भारतीय मुसलमान और भारत में रोहिंग्या शरणार्थी. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि ये आरोप इस्लामोफ़ोबिक और पूरी तरह से असभ्य और भड़काऊ थे. सरकार ने इन दावों को ख़ारिज करने या उनका खंडन करने के लिए कुछ नहीं किया. 

भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों की बहुत मामूली सी आबादी, जो सबसे अच्छे समय में भी किसी तरह से अपना जीवन व्यतीत कर रही थी ख़ुद को और भी अधिक असुरक्षित महसूस करने लगी. उनके मन में जो भी आशंका रही हो उसकी पुष्टि करते हुए सरकारी अधिकारियों ने जल्द ही रोहिंग्याओं को घेरने, उन्हें डिटेंशन सेंटर्स में बंद करने और कुछ मामलों में, गुजरात की तरह, उनके घरों को ध्वस्त करने के अभियान शुरू कर दिए.

रोहिंग्या शरणार्थियों को भारतीय नौसेना के जहाज़ से समुद्र में फेंक दिए जाने की ख़बर सबसे पहले मीडिया पोर्टल मकतूब मीडिया ने दी, उसके बाद स्क्रॉल ने एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की. इस घटना की शुरुआत 6 और 7 मई को हुई, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया, दिल्ली पुलिस ने रोहिंग्या शरणार्थियों के ख़िलाफ़ एक बड़ी कार्रवाई की.

नावों से उतरते रोहिंग्या शरणार्थी. (फोटो: Flickr/Prachatai, CC BY-NC-ND 2.0 DEED)

कुछ महिलाओं ने छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया

स्क्रॉल की रिपोर्ट है कि पूरी दिल्ली में पांच झुग्गी बस्तियों – हस्तसाल, उत्तम नगर, मदनपुर खादर, विकासपुरी और शाहीन बाग़ – में मुस्लिम और ईसाई रोहिंग्या शरणार्थियों के घरों पर छापेमारी के बाद कम-से-कम 43 रोहिंग्या पुरुष, महिलाएं और बच्चों को हिरासत में लिया गया. कम-से-कम एक रोहिंग्या व्यक्ति को एक सार्वजनिक अस्पताल से खींचकर ले जाया गया जहां वह अपनी पत्नी की देखभाल कर रहा था. बिना भोजन के पुलिस थानों में घंटों बिताने के बाद उन्हें दिल्ली के इंदरलोक स्थित अवैध शरणार्थीयों के लिए बने डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया. जहां उन्हें यह बताया गया कि उनका बायोमेट्रिक डाटा इकट्ठा करने के लिए उन्हें यहां लाया गया है. शरणार्थियों ने डिटेशन सेंटर में साफ़ सफ़ाई, खाना, पानी की भारी कमी की शिकायत की. 

वहां से उन्हें बस से दिल्ली हवाई अड्डे ले जाया गया और फिर हवाई जहाज़ में बैठाकर 1300 किलोमीटर दूर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर ले जाया गया. इसके बाद, भयभीत समूह ने बताया कि उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई, उनके हाथों में हथकड़ी लगा दी गई और उन्हें नौसेना के एक जहाज़ पर चढ़ा दिया गया. समुद्री यात्रा कष्टदायक थी. कुछ महिलाओं ने छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें इंडोनेशिया में सुरक्षित स्थान पर भेजा जा रहा है. 

तीन या चार घंटे बाद उनकी आंखों पर से पट्टी हटा दी गई और उनकी हथकड़ियां खोल दी दी गईं. जीवन रक्षक जैकेट देने के बाद उन सभी को समुद्र में कूदने के लिए मजबूर किया गया जिनमें बुज़ुर्ग, बच्चे, महिलाएं और बीमार लोग शामिल थे. सौभाग्य से वे सभी बच गए. वे किनारे पर पहुंच गए, लेकिन स्थानीय लोगों से बात करने के बाद उनका डर और बढ़ गया. उन्हें एहसास हुआ कि वे इंडोनेशिया में नहीं बल्कि म्यांमार में वापस आ गए हैं. लेकिन उनकी क़िस्मत अच्छी थी कि इस क्षेत्र पर सैन्य जुंटा का नियंत्रण नहीं था. यहां की कमान नागरिक राष्ट्रीय एकता सरकार के पास थी, जिसे सेना ने हिंसक तरीक़े से हटा दिया था, इसलिए कम-से-कम फ़िलहाल तो वे सुरक्षित थे.

यह भयावह कहानी सबसे पहले दिल्ली में रह गए परिवार के सदस्यों को की गई कॉल से सामने आई. उनके बयानों की सत्यता की पुष्टि करने के लिए, स्क्रॉल ने म्यांमार की राष्ट्रीय एकता सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए 40 शरणार्थियों के नाम और उम्र की तुलना दिल्ली से उठाए गए 43 शरणार्थियों की सूची से की. इसमें पाया गया कि इनमें से 36 एक जैसे या काफ़ी हद तक समान थे. दिल्ली में रह रहे रोहिंग्याओं ने भी तस्वीरों की पुष्टि की.

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‘भारत ने 1951 के शरणार्थी सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किए थे’

ये तथ्य संदेह से परे लगते हैं. भारत की सरकार ने अचानक कार्रवाई करते हुए लगभग 40 रोहिंग्या शरणार्थियों (जिनमें से सभी को संयोगवश यूएनएचसीआर द्वारा शरणार्थी माना गया था) को उठा लिया और अंततः उन्हें केवल एक लाइफ़ जैकेट के साथ समुद्र में फेंक दिया, उस भूमि के तट के पास जहां से वे नरसंहार से बचने के लिए भागे थे. 

म्यांमार की निर्वासित नागरिक सरकार में मंत्री मो ने स्क्रॉल से कहा, ‘जब वे शरण लेने का प्रयास कर रहे थे, तब उन्हें निर्वासित करना उन्हें उस नरक में वापस भेजना है, जहां से वे बचकर आए थे.’ म्यांमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत थॉमस एंड्रयूज़ ने कहा कि ‘यह विचार कि रोहिंग्या शरणार्थियों को नौसेना के जहाज़ों से समुद्र में फेंक दिया गया है’ ‘घृणित’, ‘अनुचित’ और ‘अस्वीकार्य’ है.

यह सच है कि भारत ने 1951 के शरणार्थी सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, जो शरणार्थियों (जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, सामाजिक समूह या राजनीतिक राय के आधार पर उत्पीड़न से बचने वाले व्यक्तियों के रूप में परिभाषित) के क़ानूनी अधिकारों की रक्षा करता है. सम्मेलन के तहत उनका सबसे महत्वपूर्ण अधिकार ‘ग़ैर-वापसी’ का है, जो सरकारों को अपने गृह देशों में उत्पीड़न के शिकार शरणार्थियों को वापस भेजने से रोकता है. वे सम्मेलन के तहत दूसरे स्तर के अधिकारों के भी हक़दार हैं, जैसे शिक्षा, काम और संपत्ति.

लेकिन भले ही भारत शरणार्थी सम्मेलन से क़ानूनी रूप से बंधा न हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रथागत क़ानून अभी भी भारत को नरसंहार उत्पीड़न से बचने वाले लोगों को उस भूमि पर लौटने के लिए मजबूर नहीं करने के लिए बाध्य करता है जहां उनके जीवन को गंभीर रूप से ख़तरा है. इतना ही नहीं. भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 न केवल नागरिकों बल्कि भारत के क्षेत्र में सभी व्यक्तियों को उनकी क़ानूनी स्थिति की परवाह किए बिना सम्मान के साथ जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है. म्यांमार के तट के पास समुद्र में रोहिंग्या को जबरन निर्वासित करना स्पष्ट रूप से अंतरराष्ट्रीय प्रथागत क़ानून और भारतीय संवैधानिक क़ानून दोनों का उल्लंघन करता है.

और, क़ानून द्वारा तय किए गए दायित्वों के अलावा, भारत ने लंबे समय से तर्क दिया है कि कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए बिना भी, उसने व्यवहार में दुनिया के अधिकांश अन्य देशों की तुलना में अधिक शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं खोली हैं. भारतीय गणराज्य में शरण पाने वाले शरणार्थियों में चीन के तिब्बती, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, श्रीलंकाई तमिल और म्यांमार के चिन अल्पसंख्यक शामिल हैं. भारत की एक गौरवशाली परंपरा रही है जिससे वह बहुत नीचे गिर गया है. 

दुनिया के सताए गए लोगों का स्वागत करने की सदियों पुरानी परंपरा; एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान जो क़ानूनी नागरिक नहीं होने वालों को भी जीवन के अधिकार की गारंटी देता है; और अंतरराष्ट्रीय प्रथागत क़ानूनों का दायित्व, इन सबके बीच भारत आज इस स्थिति में कैसे आ गया? एक ऐसा स्थान जहां असाधारण क्रूरता, पूर्वाग्रह और संवैधानिक दायित्वों और प्रथागत अंतरराष्ट्रीय क़ानून की आकस्मिक अवहेलना देश की आधिकारिक नीति बन गई है?

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‘जबरन वापस भेजना अंतरराष्ट्रीय क़ानून, संवैधानिक दायित्वों और सामान्य मानवता के सिद्धांतों का उल्लंघन है’

भारत को निश्चित रूप से दूसरे देशों से अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाले लोगों को वापस भेजने का क़ानूनी अधिकार है. लेकिन क़ानून के अनुसार, विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत दोषी ठहराए गए अवैध प्रवासियों की वापसी के लिए उनके मूल देश के साथ सावधानीपूर्वक बातचीत की जानी चाहिए. इसके अलावा, जब मूल देश उन्हें अपने नागरिक के रूप में मान्यता देने से इनकार कर देता है – जैसे म्यांमार की सैन्य सरकार रोहिंग्या लोगों को अपने नागरिक के रूप में मान्यता देने से इनकार करती है – और इसके बजाय उन्हें नरसंहार की धमकी दी जाती है, तो लोगों को नरसंहार की स्थिति में जबरन वापस भेजना अंतरराष्ट्रीय क़ानून, संवैधानिक दायित्वों और सामान्य मानवता के सिद्धांतों का उल्लंघन है. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि रोहिंग्या शरणार्थियों के निर्वासन की अनुमति नहीं दी जा सकती ‘जब तक कि ऐसे निर्वासन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता’. 

यह भी सच है कि भारत के पास शरणार्थी नीति नहीं है. भारतीय क़ानून एक तरफ़ शरणार्थियों और शरण चाहने वालों और दूसरी तरफ़ अवैध अप्रवासियों के बीच अंतर नहीं करता है. लेकिन इससे सताए गए तिब्बतियों, श्रीलंकाई तमिलों और पाकिस्तानी तथा बांग्लादेशी हिंदुओं के भारत में आकर रहने में कोई बाधा नहीं आई. मोदी के नेतृत्व में भारत ने 2019 में भारत के पड़ोस में सताए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता के अधिकार देने में तेज़ी लाने के लिए क़ानून में संशोधन किया, जिसमें एक बड़ा अपवाद था. वह अपवाद यह है कि वे मुसलमान नहीं होने चाहिए.

रोहिंग्या को अक्सर दुनिया में सबसे ज़्यादा सताए गए अल्पसंख्यकों में गिना जाता है. वे भी पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों की तरह भारत के पड़ोसी देशों से हैं. फिर उन्हें न सिर्फ़ नागरिकता बल्कि लंबी अवधि के वीज़ा से भी क्यों वंचित रखा जाता है? इसके बजाय उन्हें ख़तरनाक और परजीवी कहकर क्यों कलंकित किया जाता है और हाल के वर्षों में उन्हें जबरन बाहर क्यों निकाला गया है? क्या ऐसा सिर्फ़ उनकी धार्मिक पहचान की वजह से है?

दिल्ली में रोहिंग्या लोगों की एक बस्ती. (फाइल फोटो: हिना फातिमा/द वायर)

‘बिना दस्तावेज़ वाले लोगों को वापस भेजना मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा बनाई गई नीति नहीं है’

नौसेना के जहाज़ से लोगों को समुद्र में फेंकना, अवैध व्यक्तियों को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार उस देश में वापस धकेलनेकी नीति का चरम उदाहरण है, जहां से वे आए थे. प्रभावी रूप से वापस धकेलनेकी नीति का अर्थ है कि सरकार उचित क़ानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करके व्यक्तियों को भारत में रहने के उनके दावे के अधिकार से उनको वंचित करना चाहती है. जिस व्यक्ति के बारे में राज्य दावा करता है कि वह एक विदेशी नागरिक है, वह यह दावा कर सकता है कि वह एक भारतीय नागरिक है, कि वह भारत में इसलिए है क्योंकि वह किसी भारतीय से विवाह या किसी अन्य तरह से संबंधित है, या कि वह उत्पीड़न से बचकर इस देश में शरण चाहती है.

वापस धकेलने की नीति अवैध व्यक्ति को ऐसे दावे करने और साबित करने से वंचित करती है. इसके बजाय, राज्य एकतरफ़ा ढंग से यह मान लेता है कि वह व्यक्ति विदेशी है जिसे भारतीय भूमि से बलपूर्वक हटाया जाना चाहिए. 

इसके साथ ही, अवैध व्यक्तियों को वापस धकेलनेकी नीति का सहारा लेकर सरकार विदेशी को स्वीकार करने के लिए मूल देश के साथ राजनयिक चैनलों के माध्यम से बातचीत करने के दायित्व से ख़ुद को मुक्त कर लेता है.

बिना दस्तावेज़ वाले लोगों को वापस भेजना मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा बनाई गई नीति नहीं है. फ़्रंटलाइन में अंगशुमन चौधरी और अपनी पुस्तक Bangladeshi Migrants in India: Foreigners, Refugees or Infiltrators? में रिज़वाना शमशाद ने दर्ज किया है कि कांग्रेस सरकार के केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने 1989 में संसद को बताया कि सरकार ने असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की सीमाओं के ज़रिये 35131 ‘बांग्लादेशी घुसपैठियोंको वापस भेजा है.

1992 में, पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ऑपरेशन पुशबैकनामक एक अभियान शुरू किया, जिसमें दिल्ली से सैकड़ों तथाकथित अवैध बांग्लादेशियोंको पकड़ा गया और उन्हें पश्चिम बंगाल की सीमा के ज़रिये जबरन बांग्लादेश में धकेल दिया गया. 2011 में, फिर से कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के एक मंत्री ने संसद को बताया कि यदि कथित ‘अवैध बांग्लादेशियों’ की पहचान 30 दिनों के भीतर सत्यापित नहीं हो पाती है तो सीमा सुरक्षा बल ‘पुश बैक’ मोड में उन्हें निर्वासित कर देता है.

हालांकि, 2014 से मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में अवैध लोगों को हिरासत में लेने और वापस धकेलनेकी नीतियां टेस्टोस्टेरोन पर आधारित हैं. इसने मारक क्षमता, शक्ति और उग्र-पुरुषत्व हासिल कर लिया है जो भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक, आरएसएस की केंद्रीय वैचारिक परियोजना से निकला है. इसके मूल में भारतीय मुसलमानों के ख़िलाफ़ गहरी नफ़रत है. 2014 में अपने पहले राष्ट्रीय चुनाव अभियान से ही, नरेंद्र मोदी ने उन लोगों से गंभीर ख़तरा उत्पन्न होने का आरोप लगाया जिन्हें वे और उनकी पार्टी के लोग घुसपैठिए या बांग्लादेशी कहते हैं. उन्होंने 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में इस भाषा का और भी अधिक खुलकर इस्तेमाल किया. मोदी के सबसे क़रीबी सहयोगी अमित शाह के नेतृत्व में उनके मंत्रिमंडल और पार्टी के सहयोगियों ने एक क़दम आगे बढ़कर उन्हें (2018 में) कीड़ा और परजीवी कहा. 

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भाजपा नेता और दक्षिणपंथी ट्रोलर्स अवैध अप्रवासियों के ख़िलाफ़ बोलते हैं

ध्यान देने वाली बात यह है कि जब भाजपा नेता और दक्षिणपंथी ट्रोलर्स अवैध अप्रवासियों के ख़िलाफ़ बोलते हैं – जिन्हें वे घुसपैठिए, ‘बांग्लादेशी’, रोहिंग्या, कीड़े और परजीवी कहते हैं – तो वास्तव में वे भारतीय मुसलमानों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहे होते हैं. उनका राजनीतिक संदेश यह है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भारतीय मुसलमानों का ‘तुष्टीकरण’ किया और बांग्लादेशी तथा रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए अवैध रूप से सीमाएं खोल दीं, क्योंकि वे इन विपक्षी दलों को वोट देंगे. केवल भाजपा के पास ही इन ख़तरनाक आंतरिक दुश्मनों से निपटने का राजनीतिक साहस और शक्ति है.

इसलिए भाजपा समर्थकों के समक्ष रोहिंग्या के प्रति क्रूरता को एक शक्तिशाली हिंदू नेता द्वारा हिंदू बहुसंख्यकों को उपहार के रूप में पेश किया जाता है. हालाँकि रोहिंग्या को एक दुश्मन के रूप में, राष्ट्र के लिए एक असहनीय बोझ की तरह पेश करना तर्कसंगत नहीं है. पहले उनकी संख्या पर विचार करें. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरन रिजुजू ने 2017 में संसद को सूचित किया कि भारत में 40,000 रोहिंग्या अवैध रूप से रह रहे हैं. यूएनएचसीआर के अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 22,500 के क़रीब है. वे भारत सरकार की सहायता के बिना जीवन निर्वाह करते हैं, आमतौर पर कूड़ा बीनते हैं, घरेलू नौकर का काम करते हैं या दिहाड़ी मज़दूरी का काम करते हैं और अमानवीय स्थिति में झुग्गियों में रहते हैं. 1.3 अरब आबादी वाले देश में किस आधार पर 22,500 दीन-हीन रोहिंग्या लोगों को भारत के संसाधनों पर एक असहनीय बोझ माना जा सकता है? मुसलमान होने के कारण उनपर आतंकवादी होने का आरोप लगाया जाता है. 

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘राज्य की नीति के रूप में दबंगों की अराजक क्रूरता को बढ़ावा दिया जा रहा है’

भारत द्वारा अपने संविधान और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अपने दायित्वों को पूरा करने से इनकार करना ही पर्याप्त रूप से दोषपूर्ण है. इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि राज्य की नीति के रूप में दबंगों की अराजक क्रूरता को बढ़ावा दिया जा रहा है. 

अंगशुमान चौधरी लिखते हैं कि आज के भारत में ‘बाहरी मुस्लिम व्यक्ति, विशेष रूप से बंगाली बोलने वाले बाहरी मुस्लिम व्यक्ति को कीड़ा समझा जाता है.’ वह आगे लिखते हैं कि ‘यह शरीर से होमो सेसर है, एक ऐसा व्यक्ति जिसे मारा नहीं जा सकता, लेकिन उसे बचाया भी नहीं जा सकता. संप्रभु सत्ता के पास इस शरीर पर पूर्ण अधिकार है, यही कारण है कि वह इसे अपनी मर्ज़ी से अपने घर से बाहर निकाल सकता है, इसे हथकड़ियों में जकड़ सकता है, इसकी आंखों पर पट्टी बांध सकता है, इसे सैन्य परिवहन विमान में डाल सकता है, और इसे समुद्र या नरभक्षी बाघों वाले मैंग्रोव में छोड़ सकता है.’

वे नैतिक स्पष्टता के साथ अपनी बात कहते हैं,जबरन वापसी की राजनीति, कूटनीति और वैधता के बीच, हमें एक अधिक मौलिक निदान की दृष्टि से इस मामले को देखना चाहिए जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं- भारत के मानवीय लोकाचार और कमज़ोर तथा हाशिए पर पड़े लोगों के प्रति आतिथ्य की विरासत का एक दुखद निदान के रूप में.’ 

स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपने ऐतिहासिक संबोधन में इस विरासत का सटीक उल्लेख किया जब उन्होंने घोषणा की, ‘मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से आता हूं जिसने सभी धर्मों और पृथ्वी के सभी देशों के पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है.’

मुझे आश्चर्य है कि वे आज अपने देश के बारे में क्या सोचते, जो निर्दयतापूर्वक सताए गए और अन्य धर्मों तथा देशों के शरणार्थियों को जेलों से भी अधिक दमनकारी डिटेंशन सेंटर्स में डाल देता है, उन्हें दोनों तरफ़ से चल रही गोलियों के बीच सीमाओं के पार धकेल देता है, या उन्हें नरसंहार का शिकार बनने के लिए समुद्र के किनारे पर तैरने के लिए फेंक देता है. 

(रूपाली सैमुअल द्वारा किए गए शोध के लिए आभार)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की कोलिकानामक संस्था से जुड़े हैं.)