विश्वविद्यालयों का उद्देश्य समाज में सोचने-समझने वाले भागीदार बनाना है, जो समाज को बेहतरी की दिशा में ले जा सकें, आलोचना कर सकें, रच सकें. लेकिन इस उद्देश्य को लगातार कम करके देखा जाता रहा है. रोज़गारपरक शिक्षा के हल्ले में बड़े उद्देश्य हाशिए पर फेंक दिए जा रहे हैं, मानो रोज़गार में चिंतन, विश्लेषण और रचना की जरूरत ही न हो.
रोज़गार-परीक्षाओं से विश्लेषण की अपेक्षा वाले लिखित प्रश्नों की बेदख़ली 90 के दशक के बाद लगातार बढ़ी है. अभी हाल यह है कि रोज़गार तक पहुंचने के रास्ते और उच्च आकादमिक शिक्षा पाने के रास्ते भी आमतौर पर बहुविकल्पी प्रश्नों के राजपथ से गुज़रते हैं. लिखित सवाल जहां समझ, विश्लेषण की योग्यता, ढांचे बनाने व उन्हें व्यक्त कर पाने की क्षमता की जांच करते हैं, वहीं बहुविकल्पी सवाल आमतौर पर याददाश्त की परीक्षा भर होते हैं. हालांकि इनमें शामिल सभी सवाल याददाश्त आधारित नहीं होते फिर भी इनके जवाब के लिए अक्सर विश्लेषण, चिंतन, समझ आदि की कम ज़रूरत होती है. इनके लिए सिर्फ़ सवालों के जवाब रटना या फिर उन्हें हल करने के गुर सीखना काफ़ी होता है. प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार बढ़ता गाइडों, कोचिंगों और अनवरत अभ्यासों पर जोर इसे पुष्ट करता है.
रटंत विद्या पर यह ज़ोर परीक्षार्थियों को समझाता है कि जो नौकरी वे आगे करने जा रहे हैं, उससे उनकी पढ़ाई का कोई रिश्ता नहीं. उनकी आगामी नौकरी या काम के सामाजिक पहलू इस पूरी प्रक्रिया में ग़ायब हो जाते हैं. इस तरह नौकरी पाने के बाद वे विराट ढांचे के सोचविहीन पुर्ज़े की तरह काम करने की दिशा में धकेल दिए जाते हैं.
यह मुश्किल तब और गाढ़ी हो जाती है जब रोज़गार उच्च शिक्षा में शिक्षक का हो. इस लेख में हम अध्यापन के लिए अनिवार्य राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के कुछ सवालों का विश्लेषण करते हुए देखेंगे कि ये सवाल किन आधारों पर बनाए गए हैं, ये परीक्षार्थी से क्या उम्मीद करते हैं और शिक्षण से इनका कोई रिश्ता बनता है या नहीं?
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) विश्वविद्यालयों में अध्यापन के लिए पात्रता परीक्षा साल में दो बार आयोजित करवाता है. यह समझा जाता है कि इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले तालिब विश्वविद्यालयों में पढ़ाने की योग्यता रखते हैं. इसके प्रश्नपत्रों की एक झांकी ऊपर कही गई बात को साफ़ करने में काफ़ी मदद करेगी. चूंकि मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी हूं, इसलिए ख़ास उसी की बात आपके सामने रखूंगा.
यह परीक्षा दो पालियों में होती हैं, सुबह और शाम. सुबह की पाली में कुल 150 सवाल और शाम की पाली में भी 150 सवाल. सभी सवाल बहुविकल्पी होते हैं. पहली पाली के सवाल शिक्षण, तर्क क्षमता और अन्य सामान्य ज्ञान संबंधी होते हैं और दूसरी पारी में विषय पर आधारित सवाल. हम यहां पहली पारी की चर्चा नहीं करेंगे हालांकि किसी एक विषय में दीक्षित विद्यार्थी से, जिसने आज तक शिक्षा संबंधी कखग भी नहीं पढ़ा-जाना हो, उससे अचानक शैक्षित वृत्ति के बारे में सवाल पूछ कर मुमतहिन क्या हासिल करना चाहते हैं, यह समझ से परे है.
हम यहां हिंदी विषय के कुछ उदाहरणों के ज़रिए अपनी बात रखने की कोशिश करेंगे. नीचे 2022 में इस परीक्षा में पूछे गए कुछ सवाल नमूने के लिए दिए जा रहे हैं:
1: निम्न में से कौन आर्यभाषाओं में शामिल नहीं है:
अ: संस्कृत
ब: अंग्रेज़ी
स: अरबी
द: फ़ारसी
2: मुक्तिबोध की रचना है –
अ: अजय की डायरी
ब: एक साहित्यिक की डायरी
स: प्रवास की डायरी
द: सैलानी की डायरी
3: ‘विभ्रम और यथार्थ’ के लेखक हैं:
अ: फ़ायरबाख
ब: अर्न्स्ट फ़िशर
स: लुकाच
द: कॉडवेल
4: ‘तद्दोषो शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि’ किस आचार्य की उक्ति है:
अ: भामह
ब: धनंजय
स: मम्मट
द: भोजराज
5: तीसरी क़सम कहानी के पात्र हैं:
अ: रमपतिया
ब: चुरमनियाँ
स: धुन्नीराम
द: पलटदास
सोचिए कि इन सवालों से मुमतहिन क्या हासिल करना चाहते हैं? भाषा संबंधी पहला सवाल सिर्फ़ और सिर्फ़ याददाश्त की परीक्षा भर है. दी गई भाषाओं में समानता और अंतर क्या है, आर्यभाषा का विचार कितना मौजूं है, आर्यभाषा के विचार पर क्या बहसें हुई हैं, आदि की कोई समझ इस सवाल से नहीं जानी जा सकती और न ही परीक्षार्थी को यह सब जानने-समझने की ज़रूरत है.
यह सिर्फ़ इसी साल के सवाल का मामला नहीं है, अक्सर भाषा के संबंध में ऐसे ही सवाल पूछे जाते रहे हैं, जिसमें भाषा के विषय में चल रही बहसों का कोई आभास तक नहीं मिलता. मसलन अवधी किस अपभ्रंश से निकली या बिहार के आरा में बोली जाने वाली बोली क्या है? इन सवालों में भाषा संबंधी बहसों से दूर, बने-बनाए जड़ पूर्वाग्रह बार-बार दोहराए-तिहराए जाते हैं.
दूसरा सवाल साहित्य से संबंधित है. मुक्तिबोध की रचना और विचार प्रक्रिया को समझने और विश्लेषित करने के आकलन की ओर बढ़ने की बजाय सवाल उनकी रचना के नाम की याद को मूल्यांकन का आधार बनाता है. ‘एक साहित्यिक की डायरी’ मुक्तिबोध की वह कृति है जिसमें उन्होंने रचना प्रक्रिया के बारे में विस्तृत और गहन बातें की हैं. अगर परीक्षार्थी से यह उम्मीद है कि वह मुक्तिबोध के साहित्यिक योगदान की समझ रखता है तो उससे इस तरह के सवाल पूछे जाने चाहिए जो स्मृति से आगे बढ़कर उसकी विश्लेषण क्षमता की परख कर सके.
मसलन इसी किताब में शामिल मुक्तिबोध के ‘कला के तीन क्षण’ वाले निबंध को आधार बनाकर पूछा जा सकता था कि इन रचना क्षणों का आपसी रिश्ता कैसा है?

हिंदी के विद्यार्थी पाश्चात्य और भारतीय काव्यशास्त्र का अध्ययन स्नातकोत्तर स्तर पर करते हैं. इन विषयों में विद्यार्थी साहित्य को विश्लेषित करने की भारतीय और पश्चिमी, दोनों परंपराओं का अध्ययन करता है. कई आलोचकों ने इन ज्ञान-सारणियों के बीच आपसी रिश्तों और उनके अंतर को भी विश्लेषित किया है. विद्यार्थी इस प्रक्रिया से भी गुज़रते हैं. लेकिन जब पात्रता परीक्षा के सवाल पूछे जाते हैं तो वे उद्धरणों या पुस्तकों के नाम तक सिमट कर रह जाते हैं.
तीसरे और चौथे सवाल को देखें. एक सवाल में क्रिस्टोफ़र कॉडवेल की किताब का नाम देकर उसके लेखक के बारे में पूछा गया है और दूसरे सवाल में 11वीं शताब्दी के भारतीय काव्यशास्त्री मम्मट का एक कथन देकर पूछा गया है कि यह किसका कथन है. प्रसिद्ध मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्री कॉडवेल की किताब इंग्लैंड में रचे गए साहित्य, ख़ासकर उपन्यास को बुर्जुवा आर्थिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखती है और साहित्य व समाज के रिश्तों की गहरी मार्क्सवादी पड़ताल करती है. लेकिन प्रश्नपत्र बनाने वालों के लिए इस किताब में कही गई बातों से ज़्यादा ज़रूरी इस का नाम और लेखक का नाम याद रखना हुआ.
चौथा सवाल तो और दिलचस्प है. यह संस्कृत की उक्ति है, जिसका सटीक अर्थ भी सम्भवतः परीक्षार्थी को न पता हो. मम्मट कविता की परिभाषा करते हुए बताते हैं कि दोषरहित, गुणयुक्त, कभी-कभार अलंकरण से हीन शब्दार्थ कविता हो सकते हैं. कविता की परिभाषा एक लम्बे समय तक विकसित होते हुए मम्मट में इस तरह दिखी थी. मम्मट की कविता संबंधी समझ और उसकी परंपरा से एकदम अलग-थलग कटा हुआ यह प्रश्न परीक्षार्थी की बेसमझ स्मृति के अलावा और किसी बात की परीक्षा नहीं करता.
पांचवा सवाल इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है कि यह रटने के खाके से थोड़ा बाहर सरकने की कोशिश करता है पर इसके भी पीछे वैचारिकी वही पुरानी वाली ही है. यह सच है कि अगर विद्यार्थी ने फणीश्वर नाथ रेणु की संदर्भित कहानी ‘तीसरी क़सम’ नहीं पढ़ी होगी, तो उसके लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा क्योंकि सवाल, कहानी के पात्रों के बारे में है. पर कहानी पढ़ने का उद्देश्य रटना ही रहा. कहानी किन प्रक्रियाओं से बनी है, किन मानवीय संवेदनाओं से कैसे जूझती है, लोक, प्रेम, शहर, मेला, मनोविज्ञान, सामाजिक सच्चाइयों आदि के कितने महीन धागे इस कहानी को बनाने में लगे हैं, इनके बारे में कोई विश्लेषणात्मक सवाल पूछने की बजाय प्रश्नपत्र कहानी के पात्रों के नाम पर टिक जाता है और विद्यार्थी से उम्मीद करता है कि वह कहानी पढ़ते हुए कहानी का रस लेने, उस पर सोचने की बजाय उसके पात्रों के नाम कंठस्थ कर ले.
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प्रश्नपत्र में आमतौर पर ऐसे ही सवालों की बहुलता है, जिनमें तथ्य याद करने की क्षमता की परीक्षा है पर कुछ सवाल ऐसे भी हैं जो ऐसा आभास दिलाते हैं कि वे विश्लेषण और चिंतन पर आधारित हैं. ऐसे और चार सवालों के नमूने के सहारे आगे हम देखने की कोशिश करेंगे कि क्या सच में ये सवाल याददाश्त के मूल्यांकन से आगे बढ़कर विश्लेषण की ओर जाते हैं या वे सारे ताम-झाम के बाद घूमकर असल में तथ्य के उसी पुराने ठीहे पर लौट आते हैं.
प्रश्नों के कुछ और नमूने ये रहे:
6: ‘ईदगाह’ कहानी में व्यक्त हुए हैं –
(क) सांप्रदायिक सौमनस्य
(ख) बाल मनोविज्ञान
(ग) मातृ वात्सल्य
(घ) राजनीतिक चेतना
7: ‘सतपुड़ा के घने जंगल/ नींद में डूबे हुए से, ऊंघते अनमने जंगल./ झाड़ ऊँचे और नीचे/ चुप खड़े हैं आंख मीचे,/ घास चुप है, कास चुप है./ मूक शाल, पलाश चुप है,/ बन सके तो धँसो इनमें/ धँस न पाती हवा जिनमें…’
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों का आशय है–
(अ) जंगल घना और भयावह है.
(ब) जंगल में जीवन का कोई निशान नहीं है.
(स) यहां जंगल केवल जंगल नहीं, जीवन की चुनौती है.
(द) यह जंगल केवल योगी-यतियों के लिए उपयुक्त है.
8: मेरी भव-बाधा हरौ…’ दोहे में प्रयुक्त ‘झाँई’ शब्द के सही अर्थ हैं –
(क) परछाई (ख) झलक
(ग) मुस्कान (घ) दृष्टि
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए–
(अ) केवल क और ख
(ब) केवल क और ग
(स) केवल ख और ग
(द) केवल ग और घ
9: ‘राग दरबारी’ उपन्यास में व्यक्त हुए हैं –
(क) मुफ्त शिक्षा
(ख) ग्रामीण–करुणाई जिंदगी की आलोचना
(ग) बैंकों का राष्ट्रीयकरण
(घ) कस्बाई जीवन की व्यंग्यपूर्ण अभिव्यक्ति
इस क्रम में पहला सवाल प्रेमचंद की ख्यातिलब्ध कहानी ‘ईदगाह’ से है. ईदगाह कहानी से क्या सीख मिलती है, उसे परिणाम के आधार पर किस कोटि में डाला जा सकता है, यह सवाल दरअसल यही पूछना चाहता है. कहानी पढ़ने का यह तरीक़ा, जो कहानी को घटाकर सीखों, निर्णयों, कोटियों में ढाल देता है, कहानी की प्रक्रिया और उसकी समझ, विश्लेषण से बहुत दूर की चीज़ है.
विद्यार्थी को यह सवाल हल करने के लिए विश्लेषण और रचना की समझ आदि की कोई ज़रूरत नहीं पड़ने वाली. कहानी पर एक सरसरी निगाह या कहानी के बारे किसी गाइड में पढ़े गए सार-संक्षेप से उसका काम बन सकता है.
इसका सवाल का सही उत्तर ‘बाल मनोविज्ञान’ बताया गया है, पर कोई चिन्तनशील विद्यार्थी अगर जिरह करना चाहे कि इस दौर में यह कहानी साम्प्रदायिक सौमनस्य को बढ़ावा देने की राजनीतिक चेतना को पुष्ट करती है, तो क्या यह ग़लत जवाब होगा? क्या इसे वह उपन्यासकार शानी के इस सवाल से जोड़ कर नहीं देख सकता कि ‘हिंदी साहित्य में मुस्लिम पात्र इतने कम क्यों हैं?’ तो आख़िरकार यह सवाल कुल मिलाकर रटंत की उसी ज़मीन पर पहुंच जाता है, जिसके विरोध के आभास के साथ इसकी रचना हुई थी.
अगले सवाल पर चलें. भवानीप्रसाद मिश्र की कविता पंक्तियों को उद्धृत करते हुए यह सवाल काव्य पंक्तियों का आशय पूछ रहा है. पहली बात तो यह कि कविता एक समग्र आवयविक ढांचा होती है, उसके यहां-वहां से टुकड़े उठाने और उनके आशय पूछने से उसका समग्र बोध खंडित होता है. ग़ज़ल जैसी कुछ विधाओं में अलबत्ता अलहदा शेरों के अलहदा अर्थ एक साथ चला करते हैं पर आमतौर पर कविताओं की संरचना में अर्थ फैला होता है. किसी कविता के टुकड़े को अलग से काटना इसीलिए मुश्किल है. ख़ैर, इस काव्यांश पर आइए. दिए गए चौथे एकदम नामुमकिन संदर्भरहित विकल्प को छोड़कर बाक़ी तीन पर सोचिए. तीनों विकल्प शब्द की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्दशक्तियों की ओर इशारा करते हैं लेकिन जंगल और इंसान के आपसी जिन रिश्तों के बारे में सवाल पूछा गया है, वह इस उद्धरण से बहुत साफ़ होता ही नहीं.
भवानी भाई की यह कविता हिंदी की ऐसी चंद कविताओं में से एक है जिनमें कुदरत की मनुष्य केंद्रीयता को चुनौती देते हुए उसकी आज़ादी को चिह्नित किया गया है. बेहतर होता कि सवाल इस तरह पूछा जाता कि इस कविता को कैसे पढ़ें या यंत्र आधारित नई दुनिया में कुदरत के साथ इंसान के रिश्तों को समझने में यह कविता क्या जोड़ती-घटाती है. लेकिन नहीं, शब्दार्थ बूझकर विकल्प चुनना ही अधिकतम लक्ष्य हो, तो ऐसे सवाल क्योंकर किए जाएंगे!

अगले प्रश्न को लीजिए. यह प्रश्न कविता की समझ के बारे में मूल्यांकन के दावे का आधार लिए हुए है पर कुल मिलाकर यहां बिहारी के दोहे में छुपी बहुअर्थीयता को छुए बग़ैर विद्यार्थी से यह उम्मीद की जा रही है कि वह एक शब्द के कई अर्थ जानता हो, और उनमें से एक अर्थ का चुनाव प्रसंगानुकूल कर सके. यहां भी विश्लेषण या सोचने या रचने का कोई अवकाश नहीं.
हिंदी के क्लासिक उपन्यास ‘राग दरबारी’ पर पूछा गया सवाल भी इसी धारणा की पुष्टि करता है कि चीजों को निचोड़ देने पर उनका जो मुख्य कथ्य निकलता है, वही सवाल है. सो, चिंतन और प्रक्रिया की बजाय हासिल पर, नतीजे पर, निचोड़ पर ज़ोर विद्यार्थी को तथ्य के उसी गड्ढे में गिरा देता है जिस पर हम बात कर रहे थे.
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सवाल यह भी है कि ये सवाल जांचे कैसे जाएंगे, कौन इसे जांचेगा और कैसे? इन सवालों को जांचने वाले परीक्षक, परीक्षार्थियों से क्या चाहते हैं? सवाल समझ की परख के लिए होंगे या अंक हासिल करने की गलाकाट दौड़ के लिए. जिन सवालों में लम्बा लिखना होता है, जिन सवालों में विश्लेषण, विवेचन और रचना की ज़रूरत होती है, उन्हें जांचने के लिए परीक्षक को समय चाहिए, मेहनत चाहिए. क्या परीक्षकों को यह समय मिल सकता है?
हाल तो यह है कि शिक्षकों की पूरी ऊर्जा काग़ज़ों का पेट भरने में खर्च की जा रही है. हर संस्था, हर शिक्षक राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) जैसे मूल्यांकनों के लिए आंकड़े बनाने में व्यस्त है. दूसरे क्या शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक पर भरोसा करती है?
हमेशा शिक्षक को इस निगाह से देखा जाता है कि वह गड़बड़ी करने के लिए ही है, वह ग़लत तरीक़े से ही कॉपी जांचेगा. शिक्षक पर भरोसे के बग़ैर ये प्रक्रियाएं ऊपर से आने वाले ऊबाऊ आदेशों में बदल जाती हैं, फिर तो शिक्षक भी भूमिका बौद्ध मठ के उस भिक्षु-सी हो जाती है जिसे घंटा बजाने का आदेश है. वह घंटा बजा देता, बजाता ही जाता है.
तीसरे हमारी शिक्षा व्यवस्था और आकलन व्यवस्था रैंकिंग पर बहुत ज़ोर देती है. यह रैंकिंग सामाजिक स्तरीकरण की सगी है. स्तरीकरण में सरकारों का इतना गहरा विश्वास समाज में व्याप्त स्तरीकरण को पुष्ट करता है, और बदले में सामाजिक स्तरीकरण, शिक्षा व्यवस्था व आकलन के स्तरीकरण को वैधता देता है. स्तरीकरण को कम करने के लिए परीक्षाओं को रैंकिंग के जाल से निकालने की ज़रूरत है. इसके लिए ऐसे सवाल बनाने होंगे जो परीक्षार्थी को आंकड़ों का ठस और ठोस भंडार समझने की बजाय सीखने की कोशिश में लगा हुआ स्वतंत्र व्यक्ति समझें.
ऐसा समझने के बाद ही विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों से आए विद्यार्थियों के साथ न्याय हो सकता है. आकलन की ‘मेरिटोक्रेसी’ को तोड़कर उसे और लोकतान्त्रिक बनाने की जरूरत है. विद्यार्थियों से आज़ादी से लिया गया फ़ीडबैक और उनका विश्लेषण इस प्रक्रिया में मदद कर सकता है.
निष्कर्षत: ये बहुविकल्पी परीक्षाएं न तो विद्यार्थी की समझ को जांच पाती है और न ही ये उसकी आगामी भूमिका के लिए कोई तैयारी करा पाती हैं. ये परीक्षाएं तथ्यों और आंकड़ों के रटने पर टिकी हुई हैं. इनका अध्यापन की पात्रता से शायद ही कोई रिश्ता हो. कॉपी कम्प्यूटर से जंच जाए, इस सुभीते और खर्च में कटौती के तर्क से इस तरह के सवालों को जायज़ ठहराना कठिन है. बहुविकल्पी सवाल भी मानीखेज तरीक़े से पूछे जा सकते हैं लेकिन उसके लिए जिम्मेदार संस्थाओं व मुमतहिनों को तदर्थ रवैया छोड़ना होगा और शिक्षा के बड़े उद्देश्यों को ध्यान में रखना होगा.
(मृत्युंजय आलोचक हैं और सीएसडीएस से जुड़े हैं.)
