पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से विवाद, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा- असंवेदनशील सोच

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड लीव को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कानून बनने पर महिलाओं को नौकरी मिलने में मुश्किल हो सकती है. इस टिप्पणी की महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने आलोचना की है और इसे महिलाओं के स्वास्थ्य व अधिकारों के प्रति असंवेदनशील बताया है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए पीरियड्स के दौरान छुट्टी की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अगर ऐसा कानून बनाया गया तो ‘कोई भी महिलाओं को नौकरी नहीं देगा.’

इस संबंध में द वायर से बात करते हुए जन स्वास्थ्य मिशन से जुड़ी छाया पचौली कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कहना कि पीरियड लीव महिलाओं को काम से दूर कर देगा या कंपनियां उन्हें काम नहीं देंगी, एक दकियानूसी और असंवेदनशील टिप्पणी है. यह पीरियड्स और महिला अधिकारों से जुड़े उस टैबू को फिर से दोहराती है, जिसे हम दूर करने की लगातार कोशिश में लगे हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार (13 मार्च) को इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा कि पीरियड लीव (छुट्टी) अनिवार्य करने वाला कानून महिलाओं के हित में नहीं हो सकता है.

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि अनिवार्य अवकाश से युवा महिलाओं को लगेगा कि वे अपने पुरुष सहकर्मियों के ‘बराबर’ नहीं हैं और यह ‘उनके प्रगति के लिए नुकसानदेह’ साबित हो सकता है.

लाइव लॉ के अनुसार, अदालत ने याचिकाकर्ता शैलेंंद्र मणी त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मुद्दे पर स्वयं कोई महिला अदालत के सामने नहीं आई है.

पीरियड लीव का महिलाओं के करियर पर नकारात्मक असर?

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट एम.आर. शमशाद ने दलील दी कि फिलहाल कुछ राज्यों और कंपनियों द्वारा पीरियड लीव से संबंधित नीति बनाई गई है. इस पर कोर्ट ने कहा कि स्वेच्छा से ऐसी सुविधा देना अच्छी बात है, लेकिन यदि इसे कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इससे महिलाओं के करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने कहा कि यदि हर महीने छुट्टी का कानूनी अधिकार बना दिया गया तो निजी क्षेत्र में नियोक्ता महिलाओं को जिम्मेदार पद देने से भी हिचक सकते हैं. उन्होंने कहा कि इससे कार्यस्थलों पर महिलाओं को लेकर एक गलत धारणा भी बन सकती है.

द वायर से बातचीत में छाया इसके विपरित तर्क देती हैं, उनके अनुसार, देश-विदेश में जिन भी जगहों पर पीरियड लीव की व्यवस्था है, वहां से ऐसी कोई जानकारी कभी सामने नहीं आई कि वहां महिलाओं को काम नहीं मिल रहा. या उन्हें पुरुषों से कम समझा जा रहा है. ऐसे में यह कहना बिल्कुल आधारहीन है और उस मानसिकता को मजबूत करने की कोशिश है, जिसमें महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रजजन के अधिकारों को कोई महत्व नहीं दिया जाता.

छाया बताती हैं कि हमारे देश में ऐसे कानून मौजूद हैं, जो महिलाओं को एक बेहतर और सुरक्षित माहौल प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं. इसमें मातृत्व अवकाश की सुविधा, कार्यस्थल पर यौन शोषण से निपटने का कानून आदि शामिल हैं. ऐसे में पीरियड लीव का कानून यदि बन जाए, तो महिलाओं की जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी. वे अपने स्वास्थ्य और काम पर बेहतर ढंग से ध्यान दे पाएंगी. लेकिन इससे इनकार करना महिलाओं को असहज, गरिमाहीन और असुरक्षित वातावरण में काम करने के लिए मजबूर करता है.

छाया, स्वास्थ्य अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वह मुख्य रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों, पोषण और स्वास्थ्य जीवनशैली को बढ़ावा देने के क्षेत्र में काम करती हैं.

‘पीरियड के दौरान छुट्टियों से महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा मिलता है’

वे आगे कहती हैं, ‘इसमें कोई दो राय नहीं कि पीरियड्स के शुरुआती दिनों में होनेवाली शारीरिक तकलीफ़ महिलाओं को बहुत कष्ट देती है. इसके साथ ही जब उन्हें दफ्तर और घर के काम का बोझ भी दे दिया जाए, तो वे शारीरिक के साथ ही मानसिक पीड़ा की भी शिकार हो जाती हैं. कई महिलाओं को तो असहनीय पेट दर्द, बदन दर्द, उल्टी, तेज़ बुखार जैसी कई परेशानियाें से गुज़रना पड़ता है.  ऐसे में अगर उन्हें पीसीओडी, एंडोमेट्रायसिस, या पेल्विक इंफ़्लैमेटरी डिज़ीज़ जैसी कोई बीमारी हो तो अक्सर ये तकलीफ़ और बढ़ जाती है. ऐसे में आप उनसे पूरी क्षमता के साथ काम की उम्मीद कैसे रख सकते हैं.’

छाया के मुताबिक, पीरियड्स के दौरान छुट्टी देने से न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यह कार्यस्थल पर उत्पादकता और दक्षता को भी बढ़ावा देगा. क्योंकि महिलाओं की परेशानियों को सिर्फ दफ्तर की चार दीवारी के भीतर ही नहीं, उससे बाहर देखने की भी जरूरत है. घर से ऑफिस तक का सफर तय करना, घंटों कुर्सी पर बैठना और फिर साफ शौचालयों और पैड की जरूरत, जिससे कोई संक्रमण की समस्या न हो. इस दौरान बहुत ही आवश्यक हैं. ऐसे में यह एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है कि महिला कर्मचारियों की स्वास्थ्य-संबंधित ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाए. पीरियड लीव महिलाओं की जरूरत ही नहीं, अधिकार भी है.

देश-विदेश में कई जगह पीरियड लीव की व्यवस्था

गौरतलब है कि स्पेन, जापान, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया जैसे कई देशों में पहले से ही पीरियड लीव दी जाती है और कई अध्ययनों से पता चला है कि यह अवकाश महिलाओं के लिए फायदेमंद हो सकता है.

भारत के कुछ राज्य भी सीमित पीरियड लीव प्रदान करते हैं: बिहार और ओडिशा सरकारी कर्मचारियों को प्रति माह दो दिन का अवकाश देते हैं, जबकि केरल विश्वविद्यालय और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के कर्मचारियों को यह अवकाश प्रदान करता है.

इसके अलावा पिछले साल दक्षिणी राज्य कर्नाटक ने एक कानून पारित किया, जिसके तहत सभी माहवारी वाली महिलाओं को महीने में एक दिन की छुट्टी दी जाएगी.

पिछले कुछ वर्षों में, कई कंपनियों ने महिला कर्मचारियों के लिए इसी तरह की नीतियां लागू की हैं.

ज्ञात हो कि 2025 में औद्योगिक और सेवा समूह आरपीजी ग्रुप ने अपनी सहायक कंपनी सीईएटी के कर्मचारियों के लिए महीने में दो दिन की माहवारी छुट्टी की नीति की घोषणा की थी.

इंजीनियरिंग क्षेत्र की दिग्गज कंपनी एल एंड टी ने भी इसी तरह की नीति लागू की, जिसके तहत महीने में एक दिन की छुट्टी दी जाती है, जबकि फूड डिलीवरी कंपनी ज़ोमैटो साल में 10 दिन तक की माहवारी छुट्टी देती है.

घरेलू सहायकों के न्यूनतम वेतन मामले में भी अदालत ने कुछ ऐसा ही हवाला दिया था

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने घरेलू सहायकों को न्यूनतम वेतन देने की याचिका को भी कुछ इसी तरह की टिप्पणी के साथ खारिज किया था. तब अदालत ने कहा थि कि यदि इस विषय पर कानून बनाया गया, तो घरेलू श्रम की मांग घट सकती है. मध्यम वर्ग के घरों के लिए घरेलू कामगार रखना महंगा और मुश्किल हो जाएगा.

साथ ही अदालत का कहना था कि कल्याण संबंधी उपाय लाने की जल्दबाजी कभी-कभी अनचाहे नतीजे ला सकती है, जिससे दूसरे तरह का शोषण हो सकता है.  ट्रेड यूनियनों की वजह से कई बार उद्योगों का विकास रुक जाता है और और उन्हें बंद करना पड़ता है.

मार्था फैरल फाउंडेशन से पूर्व में जुड़ी महिला अधिकार कार्यकर्ता आस्था बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट से महिला अधिकारों के संबंध में ऐसी टिप्पणियां सुनकर निराशा होती है. अदालतें संविधान की रक्षा के लिए हैं और इसलिए महिलाओं, मजदूरों या हाशिए पर खड़े समाज के मुद्दों पर लोग उनसे प्रगतिशील टिप्पणियों और फैसलों की उम्मीद रखते हैं. लेकिन घरेलू कामगारों और पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कहीं से राहत वाली नहीं लगती.

‘यह मान लेना कि ऐसा करने से ऐसा हो जाएगा, तर्कसंगत नहीं लगता’

आस्था कहती हैं, ‘अदालत हर बात में यह तर्क नहीं दे सकती कि आपको काम मिलना बंद हो जाएगा, इसलिए हम इसमें कुछ नहीं कर सकते. वैसे भी महिलाओं के साथ भेदभाव होता ही है, फिर वो काम के स्तर पर हो या वेतन और सम्मान के, लेकिन इसके खिलाफ लगातार आवाज़ बुलंद होती रही है. ऐसे ही यदि घरेलू सहायकों को न्यूनतम आय और महिलाओं के लिए पीरियड लीव का प्रावधान हो जाता और उसमें कोई समस्या सामने आती, तो उसका भी समाधान निकाला जाता, आवाज़ उठाई जाती. लेकिन बिना किसी आधार के पहले ही यह मान लेना कि ऐसा करने से ऐसा हो जाएगा, तर्कसंगत नहीं लगता.’

वे बताती हैं कि घरेलू कामगार असंगठित क्षेत्र के सबसे आखिर में खड़े हैं. इसमें ज्यादातर करीब 95 प्रतिशत महिलाएं ही हैं. इनके पास फिक्स छुट्टी से लेकर वेतन का कोई अधिकार नहीं हैं. मालिक का घर ही उनका दफ्तर है. उनके काम के घंटे तय नहीं होते. कानूनी सुरक्षा की कमी के कारण महिलाओं और बच्चों का गंभीर शोषण किया जाता है. घरों में उन्हें टॉयलेट, भोजन और आराम करने की जगह तक नहीं दी जाती. इस क्षेत्र में यूनियनों का काम भी बहुत सीमित है और यह कुछ ही राज्यों जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक में सक्रिय हैं. ऐसे में अदालत का कहना कि कल्याण संबंधी उपाय लाने की जल्दबाजी अनचाहे नतीजे ला सकती है, समझ के परे है.