वाम दलों की प्रधानमंत्री से अपील- माओवादी विरोधी अभियानों के तहत हो रही ‘न्यायेतर हत्याएं’ रोकें

वाम दलों ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर अपील की है कि वह ‘ऑपरेशन कगार’ के नाम पर छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में हो रही 'न्यायेतर हत्याओं' पर तुरंत रोक लगाएं. पत्र में कहा गया है कि कई माओवादी सुरक्षा बलों की हिरासत में हैं, उन्हें कोर्ट में पेश किया जाए और क़ानून के मुताबिक कार्रवाई हो.

वामपंथी दलों के सदस्य 22 मई, 2025 को हैदराबाद में ऑपरेशन कगार को रोकने की मांग को लेकर प्रदर्शन करते हुए. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: देश की पांच वामपंथी पार्टियों ने सोमवार (9 जून) को प्रधानमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में अपील की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छत्तीसगढ़ और आसपास के इलाकों में माओवाद विरोधी अभियानों के नाम पर हो रही ‘न्यायेतर हत्याओं’ पर रोक लगानी चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को माओवादियों की वार्ता की पेशकश का जवाब देना चाहिए, साथ ही जिन माओवादी कार्यकर्ताओं को सुरक्षा बलों ने हिरासत में लिया है, उनके साथ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए. 

इस पत्र पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भाकपा (माले)-लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने हस्ताक्षर किए हैं. उन्होंने मांग की कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के खिलाफ जारी ‘सैन्यवादी रवैये’ पर रोक लगाई जाए, जहां उन्हें ‘अघोषित दुश्मन’ मानते हुए प्रशासनिक और सैन्य हिंसा का सामना करना पड़ रहा है. 

वाम दलों ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की है कि वह ‘ऑपरेशन कगार’ के नाम पर छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में हो रही न्यायेतर हत्याओं पर तुरंत रोक लगाएं.

पत्र में मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी कहा गया है कि कई माओवादी सुरक्षा बलों की हिरासत में हैं, ऐसे में उन्हें अदालत में पेश किया जाए और कानून के मुताबिक प्रक्रिया अपनाई जाए.

मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया है कि बीते एक सप्ताह में छत्तीसगढ़ से गिरफ्तार किए गए 10 में से कथित 7 माओवादियों को हिरासत में यातना देने के बाद मार दिया गया. हालांकि, राज्य प्रशासन के एक अधिकारी ने इन आरोपों से इनकार किया है.

पत्र में आगे कहा गया है कि आदिवासी समुदायों के अधिकारों का ‘व्यवस्थित तरीके से उल्लंघन’ हो रहा है और छत्तीसगढ़ के जंगलों और खनिज संपदा को ‘बिना किसी रोक टोक के कॉरपोरेट लूट’ का शिकार बनाया जा रहा है. वामपंथी दलों का आरोप है कि क्षेत्र का सैन्यीकरण दरअसल खनिज संसाधनों की लूट को छिपाने की एक चाल है, जिसकी कीमत आदिवासी समुदाय चुका रहा है.

पत्र में यह भी कहा गया है कि केंद्र और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने माओवादियों की बातचीत की पेशकश को खारिज कर दिया है. पत्र में आगे जोड़ा गया कि  ‘राज्य को मानव जीवन के हनन का जश्न नहीं मनाना चाहिए, क्योंकि यह देश के कानून और लोकतांत्रिक शासन के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है.’

वामपंथी दलों ने कहा, ‘हम एक बार फिर विभिन्न नागरिकों और राजनीतिक दलों की उस अपील को दोहराते हैं, जिसमें माओवादियों की बातचीत की पेशकश पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने की मांग की गई है. साथ ही हम आपसे अपील करते हैं कि न्यायेतर हत्याओं और हिंसा पर तुरंत रोक लगाई जाए और एक निष्पक्ष न्यायिक जांच के आदेश दिए जाएं.’

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले महीने बताया था कि इस साल अब तक माओवाद विरोधी अभियानों में 197 ‘कट्टर माओवादी’ मारे गए हैं.

उनका पत्र नीचे पढ़ा जा सकता है:

§

सेवा में,
श्री नरेंद्र मोदी जी
माननीय प्रधानमंत्री
भारत सरकार

माननीय प्रधानमंत्री जी,

हम, देश की पांच वामपंथी पार्टियां- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई(एम)], भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एआईएफबी)- की ओर से आपको यह पत्र लिख रहे हैं ताकि छत्तीसगढ़ और आस-पास के क्षेत्रों में ‘ऑपरेशन कगार’ के नाम पर हो रही फर्जी मुठभेड़ों पर तुरंत रोक लगाई जा सके.

मीडिया और अधिकार संगठनों की रिपोर्ट् के अनुसार, कई वरिष्ठ माओवादी नेता फिलहाल सुरक्षा बलों की हिरासत में हैं. हम मांग करते हैं कि उन्हें अदालत में पेश किया जाए और उनके साथ कानून के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाए.

इस क्षेत्र के आदिवासी लंबे समय से शिकायत करते आए हैं कि भारी सैन्यीकरण के चलते उनका सामान्य जीवन बुरे तरीके से प्रभावित हुआ है. संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत उन्हें प्राप्त अधिकारों का निरंतर उल्लंघन हो रहा है. साथ ही छत्तीसगढ़ के जंगलों और खनिजों का अंधाधुंध कॉरपोरेट दोहन हो रहा है, जिसका पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय लोगों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ रहा है. हम आपसे अपील करते हैं कि आदिवासियों के प्रति इस सैन्यवादी और शत्रुतापूर्ण रवैये पर रोक लगाई जाए.

यह दुश्मनी उनकी मौत के बाद भी देखी जा रही है, जब मृतकों के शव उनके परिजनों को नहीं सौंपे जा रहे, जिससे वे अपने प्रियजनों को सम्मानजनक अंतिम विदाई भी नहीं दे पा रहे हैं.

माओवादियों ने कई बार सरकार से वार्ता की अपील की है. लेकिन, केंद्र सरकार और भाजपा शासित छत्तीसगढ़ सरकार ने बातचीत के ज़रिए समाधान की दिशा में कोई पहल नहीं की है. इसके बजाय, वे हत्या और संहार की अमानवीय नीति अपना रहे हैं.

गृह मंत्री के बयानों में ‘समाप्ति की समयसीमा’ दोहराई गई है और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का यह कहना कि बातचीत की कोई ज़रूरत नहीं है, यह दर्शाता है कि सरकार संवाद से समाधान निकालने के लिए तैयार नहीं है. यह रवैया न केवल असंवेदनशील है, बल्कि देश के कानून और लोकतांत्रिक शासन की भावना के भी खिलाफ है.

देश के कई जिम्मेदार नागरिकों और राजनीतिक दलों ने, भिन्न विचारधाराओं के बावजूद, माओवादियों की एकतरफा संघर्षविराम की घोषणा पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने और संवाद की प्रक्रिया शुरू करने की अपील पहले ही की है. हम भी इस अपील को दोहराते हैं और आपसे आग्रह करते हैं कि फर्जी मुठभेड़ों और हिंसा पर तुरंत रोक लगाई जाए और एक निष्पक्ष न्यायिक जांच के आदेश दिए जाएं.

धन्यवाद सहित,

भवदीय,

एमए बेबी, महासचिव, सीपीआई(एम)
डी. राजा, महासचिव, सीपीआई
दीपांकर भट्टाचार्य, महासचिव, सीपीआई (माले) लिबरेशन
मनोज भट्टाचार्य, महासचिव, आरएसपी
जी. देवराजन, महासचिव, एआईएफबी