नई दिल्ली: कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा (सीएसआईएस) ने अपनी हालिया वार्षिक रिपोर्ट में कनाडा में पैदा हो रहे खालिस्तानी उग्रवाद के खतरे और भारतीय विदेशी हस्तक्षेप पर चिंताओं को उजागर किया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, जासूसी (spy) एजेंसी की ये नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट पिछले सप्ताह कनाडा की संसद को सौंपी गई थी, जिसे बुधवार (18 जून) को सार्वजनिक किया गया.
मालूम हो कि इस सप्ताह की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कनाडा गए थे. इस शिखर सम्मेलन के इतर मोदी ने कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से भी मुलाकात की थी.
उल्लेखनीय है कि 2023 में नई दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के साथ पीएम मोदी की तनावपूर्ण बैठक के बाद से यह भारतीय और कनाडाई नेताओं के बीच पहली ठोस द्विपक्षीय बातचीत थी.
ज्ञात हो कि कनाडा के साथ भारत के कूटनीतिक रिश्तों में खटास सितंबर 2023 में उस वक्त आ गई थी जब तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत सरकार पर भारत द्वारा आतंकवादी घोषित हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा में हत्या से जुड़े होने का आरोप लगाया था.
भारत ने इस आरोप का जोरदार खंडन करते हुए इसे ‘बेतुका’ और राजनीति से प्रेरित बताया था.
राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक उग्रवाद
कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा की इस रिपोर्ट के ‘हिंसक उग्रवाद’ पर एक अध्याय में कहा गया है कि ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक उग्रवाद’ ( politically motivated violent extremism-पीएमवीई) नए राजनीतिक तंत्र या मौजूदा व्यवस्थाओं के भीतर नए ढांचे या मानदंड स्थापित करने के लिए हिंसा के इस्तेमाल को बढ़ावा देता है.
पीएमवीई से जुड़े लोग दुनियाभर में नए राजनीतिक तंत्र या संस्थाएं स्थापित करने के लिए हमलों की योजना बनाने, फंडिंग और उन्हें अंजाम देने का काम करते हैं.
यह हाल के दशकों में इस तरह के खतरों के प्राथमिक स्रोत के रूप में ‘कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथियों’ (सीबीकेई) को चिह्नित करता है, उन पर भारत के पंजाब क्षेत्र में खालिस्तान के एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना के उद्देश्य से हिंसक गतिविधियों का समर्थन या योजना बनाने का आरोप लगाता है.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कनाडा में मुख्य रूप से राजनीतिक मकसद से प्रेरित हिंसक उग्रवाद का खतरा 1980 के दशक के मध्य से कनाडा-आधारित सिख अलगाववादियों के जरिए सामने आया है. ये सिख अलगाववादी ‘भारत के पंजाब में एक स्वतंत्र राष्ट्र ‘खालिस्तान’ बनाने के लिए हिंसक तरीकों का इस्तेमाल करने और उसका समर्थन करने की कोशिश कर रहे हैं.’
हालांकि, रिपोर्ट में अहिंसक खालिस्तान वकालत का भी जिक्र है, जिसे चरमपंथ नहीं माना गया है और जो हिंसक गतिविधि के इससे अलग करता है.
सीएसआईएस रिपोर्ट कहती है कि ‘व्यक्तियों के एक छोटे समूह को खालिस्तानी चरमपंथी माना जाता है क्योंकि वे मुख्य रूप से भारत में हिंसा को बढ़ावा देने, धन जुटाने या योजना बनाने के लिए कनाडा को आधार के रूप में उपयोग करना जारी रखते हैं. हालांकि, 2024 में कनाडा में कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथी (सीबीकेई) से संबंधित कोई हमला नहीं हुआ, लेकिन सीबीकेई द्वारा हिंसक गतिविधियों में शामिल होना कनाडा और कनाडाई हितों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है.’
एजेंसी ने चेतावनी दी है कि कनाडा से उभरने वाला वास्तविक और कथित खालिस्तानी चरमपंथ कनाडा में भारतीय विदेशी हस्तक्षेप गतिविधियों को बढ़ावा देता रहता है.
2023 की रिपोर्ट में खालिस्तान या खालिस्तानी उग्रवाद का कोई उल्लेख नहीं था
गौरतलब है कि 2023 सीएसआईएस वार्षिक रिपोर्ट में विशेष रूप से खालिस्तान या खालिस्तानी उग्रवाद का कोई उल्लेख नहीं किया गया था और भारत का संदर्भ जून 2023 में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और अमेरिका में भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता की गिरफ्तारी तक सीमित था, जिस पर न्यूयॉर्क में एक दोहरे अमेरिकी-कनाडाई नागरिक को निशाना बनाने की एक अलग कथित साजिश में आरोप लगाया गया था.
इसके उलट 2024 की रिपोर्ट का दायरा काफी विस्तृत है. इसमें भारत सरकार पर ‘गुप्त, भ्रामक या धमकी भरे’ तरीकों से विदेशी हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया गया है.
सीएसआईएस के अनुसार, इन प्रयासों का उद्देश्य कनाडा की नीतियों को भारत के हितों के साथ जोड़ना है, खासकर खालिस्तान से संबंधित मुद्दों के संदर्भ में.
कनाडाई जासूसी एजेंसी ने भारत को चीन, रूस, ईरान और पाकिस्तान के साथ ‘कनाडा के खिलाफ विदेशी हस्तक्षेप और जासूसी के मुख्य अपराधियों’ में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है.
इसका दावा है कि भारत के हस्तक्षेप के प्रयासों में ‘जातीय, धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों’ का लाभ उठाना और कनाडा के राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करना शामिल है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत सरकार ने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने और विदेशों में ‘भारत विरोधी’ गतिविधियों को दबाने की कोशिश की है.
इसके साथ ही सीएसआईएस ने कहा है कि भारत का कनाडा को भारत विरोधी तत्वों के लिए एक आश्रय के रूप में देखने का ‘एक लंबा इतिहास’ रहा है – विशेष रूप से 1985 के एयर इंडिया बम विस्फोट और उसके बाद खालिस्तान से संबंधित घटनाओं के संदर्भ में.
रिपोर्ट में अलगाववादी निज्जर की हत्या की जांच का भी संदर्भ दिया गया है, जिसकी जून 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया गुरुद्वारे के बाहर हत्या के कारण राजनयिक गतिरोध पैदा हो गया था. इस संबंध में मई 2024 में चार संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था.
इस जांच के सिलसिले में रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस ने बीते साल अक्टूबर में घोषणा की थी कि उसने कनाडा में सिख समुदायों के खिलाफ हिंसा में शामिल भारतीय सरकारी एजेंट्स और आपराधिक नेटवर्क के बीच संबंधों के सबूतों का खुलासा किया है.
इसके परिणामस्वरूप दोनों देश द्वारा उच्चायुक्तों और पांच अन्य राजनयिकों को निष्कासित कर दिया गया था.
भारतीय विदेशी हस्तक्षेप की सीमा ‘स्पष्ट’
सीएसआईएस ने यह भी कहा कि मार्च 2024 में विदेशी हस्तक्षेप पर सार्वजनिक जांच (पीआईएफआई) की सुनवाई शुरू होने के साथ ही भारतीय विदेशी हस्तक्षेप की सीमा ‘स्पष्ट’ हो गई.
इसमें चेतावनी दी गई है कि ‘अंतरराष्ट्रीय दमन’, जिसे वह विदेशी सरकारों द्वारा असहमति को दबाने के लिए प्रवासी समुदायों को निशाना बनाने के रूप में परिभाषित करता है, कनाडा में भारत की खुफिया गतिविधियों की एक बढ़ती हुई विशेषता बन गई है, जिसे वह पीआईएफआई सुनवाई की पृष्ठभूमि में बताता है.
सीएसआईएस का निष्कर्ष है कि वह भारत के कथित विदेशी हस्तक्षेप के दायरे की निगरानी और आकलन करना जारी रखेगा.
इसमें जोर देकर कहा गया है कि इस तरह का हस्तक्षेप प्रवासी समुदायों से आगे बढ़कर कनाडा की राजनीतिक संस्थाओं और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की क्षमता तक फैला हुआ है.
एजेंसी ने रेखांकित किया कि आने वाले वर्षों में भारतीय गतिविधियों – वास्तविक और कथित दोनों – पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी.
इसमें ऐसा भी कहा गया है कि कनाडा को भारत सरकार द्वारा न केवल जातीय, धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के भीतर बल्कि कनाडा की राजनीतिक प्रणाली में भी निरंतर विदेशी हस्तक्षेप के बारे में सतर्क रहना चाहिए.
