पिछले दस-ग्यारह साल से परंपरा-सी बन गई है कि जून का दूसरा पखवारा शुरू हुआ नहीं कि हमारे सत्ताधीश और उनके समर्थक पचास साल पहले 25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आंतरिक सुरक्षा को खतरे के नाम पर देशवासियों के प्रायः सारे मौलिक अधिकार छीनकर उन पर थोप दिए गए आपातकाल की कुछ ज्यादा ही याद दिलाने लग जाते हैं. एक विद्वान का यह कथन दोहराते हुए कि जिन लोगों में इतिहास के सबक भूलने की प्रवृत्ति होती है, वे उन्हें दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं.
लेकिन ये याद दिलाने वाले इस सवाल का सामना करने को कतई तैयार नहीं होते कि क्या इतिहास के सबकों को चलताऊ ढंग से याद करना भी उन्हें याद न करने यानी भुलाने जैसा ही नहीं होता, जिसके खतरे, मौका पाते ही, कहीं ज्यादा बड़े होकर सामने आते हैं?
ऐसे में, उनसे इस सवाल के जवाब की उम्मीद तो बेमानी ही है कि उस आपातकाल के सबक इस सवाल की अनसुनी करके ठीक से कैसे याद किए जा सकते हैं कि इस वक्त हमारा देश किसी घोषणा के बगैर ही पूर्ण-विकसित अधिनायकवाद की छाया में जिस आपातकाल का अनुभव कर रहा है (और जिसको लेकर वर्तमान सत्ताधीश खुद को किंचित भी जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं हैं), उसकी तुलना में क्या वह आपातकाल लगभग अनुभवहीन अभ्यास नहीं था?
प्रायः सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुस्सह दुरुपयोग और लोकतांत्रिक अधिकारों के निर्मम हरण के बावजूद क्या वह इन संस्थाओं को उस स्तर तक क्षरित, पस्त या बेबस कर पाया था, जिस स्तर तक वे आज ‘अपने आप’ हो गई लगती हैं?
सच्चाई तो यह है कि तमाम बदगुमानियों के बावजूद वह आपातकाल अपनी उम्र को लेकर भी बहुत आश्वस्त नहीं था. इसलिए कि उसे पहले ही दिन से ऐसे काले अध्याय के रूप में पहचान लिया गया था, जो इंदिरा गांधी द्वारा अपनी विफलताओं से बढ़ते असंतोष को काबू करने के समुचित उपाय न करने और अपने विरोध में उठ रहे स्वरों के बेतरह दमन पर उतर आने से आरंभ हुआ था. किसी को भी संदेह नहीं था कि वह उनकी व्यक्तिगत असुरक्षा व कानूनी झटके (विशेष रूप से लोकसभा की सदस्यता खोने के खतरे) से उत्पन्न ऐसी विकराल ग़लती था, किसी भी लोकतांत्रिक कसौटी से जिसका औचित्य प्रतिपादित नहीं किया जा सकता था.
इससे नाराज मतदाताओं ने 1977 के लोकसभा चुनाव में उनकी बेदखली का फैसला सुना दिया तो सत्ता में वापसी के प्रयत्नों में उन्होंने उस आपातकाल के दौरान हुई गलतियों के लिए माफ़ी भी मांगी थी. उन गलतियों का ज़िक्र छिड़ जाने पर उनकी पार्टी कांग्रेस आज भी थोड़ी लजाती और रक्षात्मक हो जाती है.
‘पूर्ण अधिनायकवाद’ और अघोषित आपातकाल के वर्तमान अभ्यासियों की तरह सर्वथा निनाठती और बेशर्मी नहीं बरतती.
बेबसी का जश्न
ये अभ्यासी तो निर्लज्ज होकर बिना किसी अपराधबोध के हमारी इस बेबसी का जश्न मनाने में भी संकोच नहीं कर रहे कि जहां हमने उस आपातकाल को अगले ही चुनाव में धूल चटाकर अपने छीने गए सारे मौलिक अधिकारों सहित ‘दूसरी आजादी’ प्राप्त कर ली थी, वर्तमान अघोषित आपातकाल के शिकंजे से लगातार तीसरे चुनाव में भी बाहर नहीं निकल पाए हैं, न ही अपने सपनों के लोकतंत्र की पुनर्प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर पाए हैं. उल्टे कई मायनों में उसके अंधेरों को बढ़ते देखने को ही अभिशप्त हैं.
यहां यह भी गौरतलब है कि तमाम सत्तालोभ के बावजूद उस आपातकाल के पीछे सत्तादल यानी कांग्रेस की अलोकतांत्रिकता व प्रतिगामिता की वैसी ‘विरासत’ नहीं थी, जैसी इस आपातकाल के पीछे उसके अलम्बरदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की है. कांग्रेस का जहां आजादी की लड़ाई और संविधान निर्माण दोनों से जुड़ाव रहा है, संघ परिवार इन दोनों से बहुत दूर रहा है और उसने अपने इतिहास में कभी भी कोई लोकतांत्रिक संघर्ष चलाकर उसे मंजिल तक नहीं पहुंचाया है.
इसके विपरीत, बताते हैं कि वह उस आपातकाल के बाद देश को मिली ‘दूसरी आजादी’ के सुहाने सपने को तोड़ने में सबसे आगे रहा था.
जाहिर है कि उस आपातकाल को इस आपातकाल की तरह इसकी घोषणा किए बिना ही हालात को आपातकाल से भी बुरे बना डालने की सहूलियत उपलब्ध नहीं थी, क्योंकि फासीवाद की बेलें तब आज जितनी पुष्पित व पल्लवित नहीं हुई थीं. उस आपातकाल से पहले की सत्ता ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाती थी और बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजाओं-महाराजाओं के प्रिवीपर्स के उन्मूलन और बांग्लादेश की मुक्ति जैसे प्रगतिशील कदम उसके एजेंडे पर रहा करते थे.
लेकिन विडंबना देखिए: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सत्ता की शुरुआत से ही उस आपातकाल को तो कांग्रेस द्वारा ‘संविधान पर लगाया गया सबसे बड़ा काला धब्बा’ बताते आ रहे हैं, लेकिन अपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के उस संविधान विरोध की ओर से लगातार आंखें मूंदे रखते हैं, जो संविधान बनने से पहले से ही जारी है.
धत्कर्मों की ढाल
उनको और उनके इस परिवार को अपने गिरेबान में झांकने की जरा-सी भी आदत होती तो वे साफ-साफ महसूस कर पाते कि अब देशवासी समझने लगे हैं कि इस दौरान उनके द्वारा उस आपातकाल को कोसते हुए किस तरह उससे कई गुना ज्यादा संविधानविरोधी धत्कर्मों को अपनी सत्ता की ढाल बना लिया गया है.
इसकी सबसे बड़ी मिसाल उनका बहुसंख्यकवादी एजेंडे की आड़ में देशवासियों पर इमोशनल अत्याचार करते हुए अपने पक्ष में यह सहूलियत हासिल कर लेना है कि संविधान के मूल्यों से खेलते रहने के बावजूद उनकी झोली वोटों से भरती रहे और वे संविधान दिवस मनाकर उसके रक्षक होने की डींग भी हांक सकें. भले ही देश में जीवंत लोकतंत्र सुनिश्चित करने और संविधान में उल्लिखित आम आदमी के सपने पूरे करने की जिम्मेदारी को लगातार धोखे में रखना पड़ जाए.
ऐसे धोखे में कि एक विचारक को उनके पिछले ग्यारह सालों को ‘अघोषित आपातकाल’ कहना भी कई मामलों में गलत लगने लगे. उसके अनुसार:
देश में वर्तमान परिदृश्य साम्राज्यवाद के पक्ष में राजनीतिक ताकतों के बदलते सह-संबंध के बीच, अति-दक्षिणपंथी वैश्विक पुनरुत्थान की पृष्ठभूमि में उभरा है. इसने वित्तीय पूंजी द्वारा संचालित वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के युग की शुरुआत की है, जो तीव्र असमानता, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और भारी कॉरपोरेट प्रभुत्व से चिह्नित है. इसके साथ ही पहचान-आधारित ध्रुवीकरण और निरंतर घृणा अभियान के अभूतपूर्व स्तर आर्थिक व सामाजिक दोनों क्षेत्रों में साथी नागरिकों को ‘अन्य’ बना रहे हैं. …इस प्रकार, लोकतंत्र और संवैधानिक सिद्धांतों पर वर्तमान हमला कहीं अधिक घातक है. इसने संस्थागत अधिनायकवाद को जन्म दिया है, जिसे कुछ पर्यवेक्षक ‘चुनावी निरंकुशता’ कहते हैं….
भारतीय संदर्भ में, इस अधिनायकवादी बदलाव का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किया है, जो सांप्रदायिक हिंदुत्व की जहरीली विचारधारा को बढ़ावा देकर भारत के मूल विचार को मौलिक रूप से बदलने का प्रयास करता है.
भारत का यह विचार उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से पैदा हुआ, जो एक लोकतांत्रिक,धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और संघीय गणराज्य में निहित था. उस पर वर्तमान हमले (जो अधिक व्यापक और दमघोंटू है) का उद्देश्य भारतीय नागरिकता के मूलभूत सिद्धांतों को नष्ट करना है.
संविधान पर लांछन
निस्संदेह, इस हमले के बीज संघ परिवार के उस संविधान विरोध में हैं, जिसे उसके परिवारी आपातकाल की आलोचना की आड़ में छिपाते रहते हैं. वे चाहते हैं कि देश 1975 के आपातकाल के संविधान विरोध को तो याद रखे, लेकिन यह भूल जाए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संविधान को उसके बनने से पहले ही लांछित करना शुरू कर दिया था.
उनके गुरु जी (माधव सदाशिव गोलवलकर) का तभी मानना था कि हमारा संविधान पश्चिमी देशों के संविधानों से लिए गए विभिन्न अनुच्छेदों का एक भारी-भरकम तथा बेमेल अंशों का संग्रह मात्र है. उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम अपना कह सकें.
अपने ‘बंच आफ थॉट्स’ (विचार नवनीत) में वे पूछते थे कि उसके निदेशक सिद्धांतों में क्या एक भी शब्द इस संदर्भ में दिया गया है कि हमारा राष्ट्रीय जीवनोद्देश्य तथा हमारे जीवन का मूलभूत स्वर क्या है? राष्ट्रसंघ के घोषणापत्र से अथवा पुराने लीग ऑफ नेशन्स के घोषणा पत्र से कुछ अपूर्ण सिद्धांतों और अमेरिका एवं ब्रिटिश संविधान के विशेष तत्वों के कुछ अंशों को एक साथ मिलाकर एक खिचड़ी मात्र बना दी गई है, दूसरे शब्दों में भारतीय संविधान में भारतीय आदर्शों अथवा राजनीतिक दर्शन की कोई झलक नहीं है.
ज्ञातव्य है कि गोलवलकर 1940 से 1973 तक संघ के सर संघचालक रहे और महाराष्ट्र के बाहर पूरे देश में संघ का विस्तार उनकी विलक्षण प्रतिभा तथा अद्भुत संगठन क्षमता का उदाहरण बताया जाता है. जिस समय भारतीय संविधान बन रहा था, वे ही सर संघचालक व मार्गदर्शक थे और इसको लेकर नाराज थे कि जब हमारे यहां ‘मनुस्मृति’ जैसा हिंदू न्यायशास्त्र एवं विधि व्यवस्था का संपूर्ण रूप मौजूद है तो हमें संविधान के लिए अन्य जगह जाने की क्या जरूरत है?
30 नवंबर, 1948 को उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में लिखा था,
‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में हुए अनोखे संवैधानिक विकास का कोई जिक्र नहीं है….मनुस्मृति में दर्ज कानूनों की आज भी दुनिया भर में प्रशंसा होती है और वे लोगों के बीच स्वतःस्फूर्त आज्ञाकारिता व अनुशासन जगाते हैं. लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इन तथ्यों का कोई मतलब नहीं है.’
मनु का गुणगान
मनु की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उन्हें विश्व का पहला व महानतम कानून निर्माता भी बताया था.
गौरतलब है कि भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर इससे पहले 1927 में यह कहते हुए ‘मनुस्मृति’ को आग के हवाले कर चुके थे कि उसमें समानता, न्याय और मानवता के सिद्धांतों की घोर अवहेलना की गई है. उनके विपरीत गोलवलकर संविधान के संघात्मक स्वरूप को पूरी तरह समाप्त कर एकात्मक शासन की स्थापना चाहते थे. वे भाषा के आधार पर राज्यों के निर्माण के घोर विरोधी थे.
1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग का प्रतिवेदन प्रकाशित होने पर गुरु गोलवलकर ने एक लेख लिखा था, ‘एकात्मक शासन की अनिवार्यता’.
इसमें उन्होंने लिखा था-‘हम अपने देश के संविधान से सांघिक ढांचे की संपूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर दें. एक राज्य के अर्थात भारत के अंतर्गत अनेक स्वायत्त अथवा अर्द्धस्वायत्त राज्यों के अस्तित्व को मिटा दें तथा एक देश एक राज्य एक विधानमंडल, एक कार्यपालिका, घोषित करें. इसमें खंडात्मक, क्षेत्रीय सांप्रदायिक भाषाई अथवा अन्य प्रकार के गर्व का चिह्न नहीं होना चाहिए.’
उनका मत था कि हमारा वर्तमान संसदीय ढांचा पृथकतावाद को उत्पन्न व पोषित करने वाला है. एक प्रकार से यह राष्ट्रवाद के सत्य को नकारता है अतः विभाजक प्रवृत्ति का है. इसका उपचार परम आवश्यक है. एकात्मक शासन की स्थापना के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए और मार्ग के समस्त अवरोधों को समाप्त कर डालना चाहिए.
संविधान निर्माताओं के राष्ट्रवाद और संविधान के संघात्मक ढांचे को लेकर भी शंकालु थे. साथ ही इस बात के आलोचक थे कि संविधान में देश को राज्यों के संघ के रूप में वर्णित किया गया है. जो पूर्व व्यवस्था के अंतर्गत केवल प्रांत माने जाते थे, उनको अब अनन्य अधिकारों के साथ राज्य का दर्जा दे दिया गया है.
वे इस बात को भी नहीं मानते थे कि लोकतंत्र की भावना की संतुष्टि के लिए ज्यादा प्रांतीय विधानसभाओं का होना आवश्यक है. उनका मानना था कि लोकतंत्र व बहुविधायिका (राज्यों में विधानमंडल व केंद्र में संसद) में कोई सम्बन्ध नहीं है. एक केंद्रीय व्यवस्थापिका (संसद) संपूर्ण देश की लोकतंत्रीय भावना को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त है. राष्ट्र एक है, जन एक हैं, अतः सरकार एवं विधायिका भी एक होनी चाहिए.
तिरंगा बनाम भगवा
भारत की संविधान सभा द्वारा तिरंगे झंडे की राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकृति को वे उसकी प्रवाहपतिता तथा परानुकरणता मानते थे. उनके अनुसार तिरंगा किसी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अथवा राष्ट्रीय इतिहास व परंपरा पर आधारित या उनसे प्रेरित नहीं. ‘ऑर्गनाइजर’ के 7 जुलाई, 1947 के अंक में प्रकाशित ‘नेशनल फ्लैग’ शीर्षक संपादकीय में मांग की गई थी कि तिरंगे की जगह भगवाध्वज को राष्ट्रीय झंडा बनाया जाए क्योंकि वही हिंदुस्तान का सच्चा राष्ट्रीय झंडा हो सकता है. राष्ट्र को सिर्फ वही मान्य होगा.
सोचिए जरा कि ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस आपातकाल पर प्रायः बरसते रहने की कला को क्या कहा जाए और किस रूप में लिया जाए!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
