नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव को आदेश दिया है कि वह पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तानी नागरिकों पर कार्रवाई के मद्देनजर पाकिस्तान भेजी गई 63 वर्षीय महिला को भारत वापस लाएं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस राहुल भारती ने 6 जून को एक आदेश में कहा, ‘मानवाधिकार मानव जीवन का सबसे पवित्र अंग है और इसलिए, ऐसे मौके आते हैं जब संवैधानिक न्यायालय को किसी मामले के गुण-दोषों के बावजूद एसओएस जैसी रियायत देनी पड़ती है, जिस पर समय रहते ही निर्णय लिया जा सकता है. इसलिए, यह अदालत गृह मंत्रालय (एमएचए), भारत सरकार (जीओआई) को याचिकाकर्ता को उसके निर्वासन से वापस लाने का निर्देश दे रहा है.’
याचिकाकर्ता, रक्षंदा राशिद मूल रूप से पाकिस्तान से हैं, और अपने पति और दो बच्चों के साथ पिछले 38 वर्षों से जम्मू में रह रही थीं. उनकी बेटी फलक शेख के अनुसार, अपने निर्वासन के बाद से ही राशिद लाहौर के एक होटल में अकेली रह रही हैं और जल्द ही उनके पास भारत से लेकर गए पैसे भी खत्म हो जाएंगे.
उसकी बेटी ने अख़बार को बताया, ‘वह यहां लॉन्ग-टर्म वीज़ा (एलटीवी) पर थी, फिर भी उन्हें पाकिस्तान भेज दिया गया. उन्होंने 1996 में नागरिकता के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक आवेदन पर कार्रवाई नहीं हुई है. उसकी सभी बहनें दूसरे देशों में बस गई हैं; उनका वहां कोई करीबी रिश्तेदार नहीं है. सीमा पार ले जाने वाली मुद्रा की सीमा के कारण वह अपने साथ केवल 50,000 रुपये ले जा सकी थीं, और जल्द ही उनके पास पैसे खत्म हो जाएंगे.’
उन्होंने कहा, ‘पहले वह पेइंग गेस्ट आवास में रहीं और फिर लाहौर के एक होटल में चली गईं. उनका फोन काम करना बंद कर देगा; वह स्थानीय सिम कार्ड नहीं खरीद सकतीं क्योंकि विदेशी हैंडसेट पाकिस्तान में काम नहीं करते. अंतरराष्ट्रीय रोमिंग जारी रखने के लिए उन्हें 30-40,0000 रुपये का भुगतान करना होगा, जो उनके पास नहीं है.’
अदालत के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति शेख जहूर अहमद ने कहा कि उनकी पत्नी के पास ‘देखभाल और संरक्षण के लिए पाकिस्तान में कोई नहीं है, खासकर जब वह कई बीमारियों से पीड़ित है और हर गुजरते दिन के साथ उनका स्वास्थ्य और जीवन खतरे में है और उन्हें परित्यक्त के रूप में खुद की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया गया है.’
उनके पति एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी हैं.
मामले को सुनते हुए जस्टिस भाटी ने कहा, ‘यह अदालत इस बात को ध्यान में रख रही है कि याचिकाकर्ता के पास प्रासंगिक समय पर एलटीवी का दर्जा था, जिसके कारण उन्हें निर्वासित नहीं किया जा सकता था, लेकिन उनके मामले की बेहतर परिप्रेक्ष्य में जांच किए बिना और संबंधित अधिकारियों से उनके निर्वासन के संबंध में उचित आदेश लिए बिना, उन्हें जबरन बाहर निकाल दिया गया.’
हालांकि अदालत ने अपने आदेश में राशिद को वापस लाने के लिए 10 दिन की समयसीमा तय की है, लेकिन उनके वकील अंकुर शर्मा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों ने अदालत के आदेश पर अभी तक कार्रवाई नहीं की है.
