बिहार के दरभंगा जिले का लोकविख्यात मधुबनी अंचल. इसी अंचल का तरउनी गांव. गोकुल मिसिर के घर पैदा हुए ठक्कन मिसिर. कई-कई संतानों को गंवा देने वाले मां-बाप ने दैवी-दान समझ बेटे का नाम रखा वैद्यनाथ….(ठक्कन मिसिर की) पढ़ाई शुरू हुई संस्कृत में…(और) मेधा ऐसी तीव्र कि आगे ही आगे निकलती गई….कलकत्ता, हैदराबाद (सिंध प्रदेश), फिर गुजरात आदि अनेक विद्या-अंचलों को पीछे छोड़ती, श्रीलंका के मठवासी बौद्ध भिक्षुओं के बीच जा पहुंची.
वहीं भिक्षुओं के आचार्य वैद्यनाथ, एक दिन गेरुआ चीवर पहन स्वयं बन बैठे भिक्षु नागार्जुन. पर कितने दिन?
बिहार में किसान आंदोलन चला 1934 में तो…चीवर सहित उसमें कूद पड़े और गिरफ्तार होकर चले गए जेल. छूटे तो पिता ठीक दरवाजे पर खड़े मिले और शादीशुदा भगोड़े बेटे को धर दबोचा… तो नागार्जुन बने गृहस्थ. मानसिकता फिर भी परिव्राजक की सी बनी रही. गृहस्थी भी अपराजिता जी (पत्नी) की मेहरबानी से चलती रही और परिव्रजन का स्वभाव भी बना रहा नागार्जुन यानी ‘यात्री जी’ का.
दुर्वासा जैसे
बीती शताब्दी के आखिरी दशक में, अब से कोई 40-42 साल पहले विदिशा के एक नामचीन कॉलेज में हिंदी पढ़ाते हुए उसकी आलोचना की दुनिया में अपनी पैठ गहरी कर रहे विजय बहादुर सिंह ने ‘नागार्जुन संवाद’ नामक अपनी कृति में अपने समय के हिंदी व मैथिली के अष्टावक्री तेवर वाले सबसे प्रश्नाकुल प्रगतिशील कवि/ कथाकार बाबा नागार्जुन(30 जून, 1911- 05 नवंबर, 1998) के जन्म से लेकर व्यक्तित्व विकास तक की दूरी को कुछ ऐसे ही भावप्रवण शब्दों में नापा था.
अब, जब बाबा के इस संसार को अलविदा कहने के बाद भी देश की नदियों में बहुत पानी बह चुका है और विजय बहादुर भी तेजी से वार्धक्य की ओर बढ़कर ‘मूर्धन्य’ व ‘वरिष्ठ’ कहलाने लगे हैं, ‘नागार्जुन संवाद’ को इस लिहाज से बाबा के बारे में सबसे अंतरंग और सबसे प्रामाणिक कृति माना जाता है कि विदिशा स्थित विजय बहादुर का घर 1967 के बाद कई दशकों तक बाबा का सबसे प्रिय ठौर हुआ करता था और दोनों के संवादों में ऐसी बेतकल्लुफी थी, कहना चाहिए, ऐसी अंतरंगता कि बाबा उनमें जिस तरह खुले हैं, उस तरह अन्यत्र कहीं नहीं.
इस संवाद में विजय बहादुर ने लिखा है : नागार्जुन माने क्या? हिंदी और मैथिली के कवि, कथाकार? बस! नहीं! नहीं!! नहीं!!!
फिर? जवाब है:
भारत की मुक्तिकामी जनबिरादरी का पहरेदार… तुच्छ जनों का अन्तुच्छ हिंदी कवि, जितना मैदानी, उतना पठारी, जितना ग्रामांचलीय, उतना ही उपनगरीय. महानगरीय कुम्भीपाकों का रजिस्टर्ड बाशिंदा, गंवई पगडंडियों की चंदनवर्णी धूल का गायक, ‘एडवांस’ ग्रामीणता भी जिसे देखे तो हंसे बिन न रह सके, किंतु सुपरक्लास शहरी इंटेलेक्चुअल भी सामने पड़ते ही रह जाए भौचक्का.
आगे, वे बाबा को ‘समय के दिगंतग्रासी चौराहे पर चौबीसों घंटे खांसते, खुनकते, बमकते, सनकते, अकड़ते-तनते…हमारे समय के ‘साहित्य का दुर्वासा’ भी करार देते हैं. इस आधार पर कि बाबा ने स्वयं एक बातचीत में उनसे कहा था कि पुराने महर्षियों में उनका मूड सबसे ज्यादा दुर्वासा से ही मिलता है.
फक्कड़ और यायावर
अब यह तो सुविदित ही है कि बाबा की हरफनमौला शख्सियत का जलवा कुछ ऐसा था कि उनके अनुयायी व प्रशंसक उन्हें प्यार से ‘बाबा’ कहा करते थे. संत कबीर जैसे फक्कड़ और यायावर राहुल सांकृत्यायन जैसे घुमक्कड़ होने के गौरव भी उनके नाम थे. दलित-वंचित तबकों को लेकर उनकी चिंताएं और समतामूलक समाज की स्थापना के उनके स्वप्न भी जगजाहिर ही थे.
इन्हीं चिंताओं व स्वप्नों के तहत वे आजीवन अपनी माटी से जुड़े रहकर जनान्दोलनों में भाग लेते, कुशासन के खिलाफ तनकर खड़े होते और सत्ताओं से सवाल पर सवाल करते रहे. न कभी झुके, न ही डरे.
वे प्रायः कहा करते थे कि उन्होंने कवि या कथाकार के रूप में अपनी जनता से जो कुछ भी पाया है, अपने सृजन की मार्फत उसे कुछ बढ़ाकर लौटाना उनकी सबसे जरूरी प्रतिबद्धता है, जिसे वे जनकवि के रूप में जनसाधारण की आवाज बनकर ही निभा सकते हैं.
इसे निभाने में बाधक तत्वों से उन्होंने यह पूछने में भी कभी गुरेज नहीं किया कि ‘जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं? जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं?’ यह पूछते हुए न उन्होंने किसी नफे-नुकसान की फ़िक्र की और न उन तत्वों की अमर्यादित सत्ता, शक्ति या समृद्धि से आतंकित हुए.
यहां समझा जा सकता है कि इस ‘क्यों हकलाऊं’ वाले सवाल का जवाब देते हुए ही उन्होंने अपने लिए सायास दुर्वासा की भूमिका चुनी. कविता की बनी बनाई लीकों पर चलना जानते हुए भी उन्होंने कभी उन पर चलना मंजूर नहीं किया. काव्य-सिद्धों के बीच अपनी ‘सिद्धता’ साबित कर लेने पर भी हमेशा ‘सिद्ध’ और ‘प्रतिष्ठित’ कविताई को मुंह ही चिढ़ाया.
इसके बगैर वे अपने समय की कालिमा को इस रूप में लक्षित भी भला क्योंकर कर सकते थे कि बौद्धिक क्षेत्रों में जबर्दस्त गुलामी फैली हुई है और साथ ही प्रतिद्वंद्विता चल रही है कि कौन अपने को कितना कठमुल्ला साबित कर और पराये साहित्य का जूठन लेकर कितना कूड़ा परोस सकता है?
निस्संदेह, दुर्वासा बनकर ही वे अपने समय के ‘प्रगतिशील’ कवियों को आईना दिखाते हुए कह सकते थे कि वे इस सीमा तक सिकुड़ते जा रहे हैं कि अपने प्रतीकों तक से नफ़रत करने लगे हैं. उनका कहना था : इन ‘प्रगतिशील’ कवियों के विपरीत मैंने हमेशा काली, दुर्गा, त्रिमूर्ति जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया और सिंदूरतिलकित भाल तक पर कविता लिखी है.
किसी को नहीं बख्शा
गौरतलब है कि बाबा ने अपने जनकवि को अपनी सक्रियता वाले कालखंड की विश्व राजनीति, राष्ट्रीय जीवन की उथल-पुथल, विचारधाराओं के संघर्ष, उत्थान-पतन और धर्म-संस्कृति व कला के क्षेत्र के तीव्र बदलावों किसी से भी कतई विमुख नहीं होने दिया. तमाम तल्ख जमीनी सच्चाइयों का सामना करते हुए उन्होंने उस काल में देश के चेहरे बदलते चतुर सामंत वर्ग, काइयां व घाघ पूंजीपति घरानों, उपभोक्ता समाज में वर्गांतरित होते मजदूर वर्ग, राजनीति के निरंतर भ्रष्ट व लोकविमुख होते चरित्र और सत्ता की होड़ में इस्तेमाल किए जाते घटिया दांव-पेंचों सब की खूब खबर ली. सुविधाजीवी, समझौतापरस्त व अवसरवादी मध्य वर्ग, दिन-प्रतिदिन विश्वसनीयता खोते बुद्धिजीवी समुदाय की बौद्धिक अय्याशी व मानसिक गुलामी और संस्कृति के नाम पर नव अभिजात वर्गों की हृदयहीन उपयोगवादिता और परजीविता को भी आईना दिखाए बिना उन्होंने नहीं ही छोड़ा.
नए सिरे से सुसंगठित होकर सिर उठा रहे सामंतवाद, मुनाफाखोर पूंजीवाद, गैरजिम्मेदार राजनेता, बिके हुए रीढ़हीन नौकरशाह, लोकतंत्र के नाम पर समर्थ राजनीतिक दलों की तानाशाही और सर्वसत्तावाद, मजदूर व किसान वर्गों की रोज-रोज बढ़ती जीवनयापन संबंधी मुश्किलों और असंगठित लोकशक्तियों की विडंबनाओं की ओर से भी चुप्पी नहीं साधी. न ही कतराकर सवालों से परे निकल जाने के फायदे देखे. इसके बजाय उनके विरुद्ध मुंह खोलना कहीं ज्यादा जरूरी समझा. इस क्रम में अपने मुंह से निकली बातों के खुद अपने ही खिलाफ चली जाने के खतरे भी उठाए.
अलबत्ता, न कभी अपने सामाजिक सरोकारों को छोड़ा, न ही मोहभंग को छिपाया. भले ही मोह को सत्ता के नशे में ‘बेटे को तार और बाप को बोर’ देने वाले खेमे की ओर से भंग किया गया हो या इस खेमे की बेदखली के बाद देश का ‘खिचड़ी विप्लव’ से साक्षात्कार कराने वालों की ओर से.
बाल ठाकरे, बाल ठाकरे
काबिल-ए-गौर यह भी कि कभी ‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी, यही हुई है राय जवाहरलाल की’ कहकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को चिकोटी काटने और ‘इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको, तार दिया बेटे को बोर दिया बाप को?’ पूछकर, साथ ही ‘खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूक’ कहकर पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की खबर लेने वाले बाबा ने बाद के दौर में बाल ठाकरे और मायावती जैसे नेताओं को भी उनके जनविरोधी आचरणों व कदमों के लिए नहीं ही बख्शा.
मायावती पर उनकी ‘मायावती मायावती, दलितेन्द्र की छायावती’ कविता तो खैर बहुत चर्चित नहीं हुई, लेकिन बाल ठाकरे पर उनकी यह कविता अपने वक्त में ‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी’ जितनी ही लोकप्रिय हुई :
बर्बरता की ढाल ठाकरे
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की –
गला रहा है दाल ठाकरे!
अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे!
सबने हां की, कौन ना करे!
छिप जा, मत तू उधर ताक रे!
शिव-सेना की वर्दी डांटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!
सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे!
गूंज रही सह्याद्रि घाटियां,
मचा रहा भूचाल ठाकरे!
मन ही मन कहते राजा जी;
जिये भला सौ साल ठाकरे!
चुप है कवि, डरता है शायद,
खींच नहीं ले खाल ठाकरे!
कौन नहीं फंसता है, देखें,
बिछा चुका है जाल ठाकरे!
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!
बर्बरता की ढाल ठाकरे!
प्रजातंत्र का काल ठाकरे!
धन-पिशाच का इंगित पाकर
ऊंचा करता भाल ठाकरे!
चला पूछने मुसोलिनी से
अपने दिल का हाल ठाकरे!
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!
दरभंगा में अपने आख़िरी दिनों में जब बाबा पहले जितनी द्रुत गति से सृजनरत नहीं रह पाए तो भी साहित्य के साथ-साथ राजनीति की दुनिया में तेजी से हो रहे बदलावों व आम आदमी की मुश्किलों को बेहद संवेदनशील और विद्रोही तरीके से, हर तरह की खेमेबंदी से दूर रहकर देूखते रहे.
लेकिन उनकी बाबत यह सबसे बड़ी बात कहे बगैर बात अधूरी रह जाएगी कि वे स्वभावत: किसी भी दल या संगठन से तभी तक ‘हार्दिक जुड़ाव’ महसूस करते थे, जब तक उन्हें उसमें अपने सपनों के साकार होने की उम्मीदें पुष्पित पल्लवित होती दिखाई देती थीं.
विजय बहादुर से एक अंतरंग भेंटवार्ता में उन्होंने कहा था कि लेखक/साहित्यकार को अपनी बौद्धिकता को जनाभिमुख रखना चाहिए क्योंकि पार्टी के इनर यानी अंदरूनी सर्किल में आ जाने पर वह मूलतः साहित्यकार रह ही नहीं सकता.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
