केदारनाथ सिंह: कठिन समय में अक्षरों को ही नहीं, स्वरों को भी बचाया जाना चाहिए…

केदारनाथ सिंह अपने अंतिम दिनों में इस बात को लेकर निराश थे कि अकादमिक संस्थानों के तौर पर विश्वविद्यालयों व कॉलेजों की जो प्रतिष्ठा व भूमिका थी, जिसके चलते परिवर्तनकामी लोग उनकी ओर बड़ी उम्मीद की निगाह से देखते थे, वह अब ख़त्म होती जा रही है. उनके जन्मदिन पर उन्हें याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह.

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केदारनाथ सिंह. (जन्म: 7 जुलाई 1934, अवसान: 19 मार्च 2018) (फोटो साभार: लोकसभा टीवी/यू ट्यूब)

आपने कभी सोचा है
महान ताज में क्यों नहीं रही
वह पहली-सी चमक?
वह पहली-सी गूंज
रोम के घंटे में?
वह आश्चर्य पहला सा दीवार में
चीन की?
पर क्यों-क्यों
आपकी गली से गुजरती हुई
एक जर्जर साइकिल की छोटी-सी घंटी में
वही जादू है
जो उस दिन था
जब ताल्स्ताय ने पहले पहल
देखी थी साइकिल?

1934 में 7 जुलाई को यानी आज के ही दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के चकिया गांव में जन्मे तीसरे सप्तक के जाने-माने कवि स्मृतिशेष केदारनाथ सिंह की यह प्रतिनिधि कविता अपने पाठकों को इन प्रश्नाकुल पंक्तियों से आगे लंबी यात्रा पर ले जाती है.

लेकिन अभी यहां, उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हुए, उस यात्रा पर निकल पड़ने का अवकाश नहीं है. इसलिए यह याद दिलाकर अभीष्ट दिशा में बढ़ लेते हैं कि 1952-53 में गीतकार के रूप में अपनी सृजन-यात्रा आरंभ करने के कुछ ही वर्षों बाद वे भारतीय नागर व पुरबिया संवेदना वाले ऐसे कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे, जिसे सरल भाषा में सरस संप्रेषण की शक्ति से संपन्न कविताएं रचने में महारत हासिल थी.

यह महारत ऐसी थी कि सात साल पहले, 19 मार्च, 2018 को लंबी बीमारी के बाद राजधानी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा तो कई आलोचकों ने लिखा था कि इंटरनेट के इस्तेमाल और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ने के साथ उनकी कविताओं की लोकप्रियता भी बढ़ती गई है.

यह बढ़त इस मायने में बहुत उल्लेखनीय थी कि तब तक हम ऐसे दौर में आ पहुंचे थे, जब शिकायतें आम थीं कि साहित्य, खासकर कविताओं, के पाठक निरंतर घटते जा रहे हैं. इस स्थिति में भी वे हिंदी की साहित्यिक कविताओं के सबसे लोकप्रिय कवियों में से एक थे और उनकी कुछ कविताएं या उनकी पंक्तियां हिंदी की सर्वाधिक उद्धृत कविता पंक्तियों में शामिल थीं तो निस्संदेह, इससे उनकी श्रेष्ठता के साथ उनके प्रवाह से परे होने का भी पता चलता था.

यही कारण है कि जहां आलोचक उनके बाद की पीढ़ियों पर उनकी कविताओं के रूमानी अपनेपन के प्रभाव की गहराई तो रेखांकित कर रहे थे, उनकी कविताएं प्राय: सारी प्रमुख भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी, जर्मन, रूसी व स्पेनिश आदि में अनूदित होकर उनके पाठकों तक भी पहुंच रही थीं. ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी के पुरस्कार तो इस बीच उनको हासिल ही हुए थे, काव्य-पाठ के लिए अमेरिका, रूस तथा कजाकिस्तान की कई यात्राएं भी उनके हिस्से आई थीं.

मानवता की भाषा और मातृभाषा

काबिल-ए-गौर यह कि इसके बावजूद वे इतने निर्लोभ या कि निरभिमान थे कि कवि कर्म में अपना ‘कहीं कोई हलंत हटा देने या बिंदी लगा देने’ जितना योगदान ही स्वीकार करते थे. अपनी एक कविता में भी वे कुछ ऐसा ही कहते हैं:

पूरी कर रहा हूं वह कविता
जिसे लिखना शुरू किया था किसी
पुरखे कवि ने
शायद सदियों पहले
और देखता हूं कि नीमअंधेरे में
मैंने यही तो किया है
कि हटा दिया है कोई हलन्त्
लगा दी है कहीं बिन्दी
उलट दिया है कोई विशेषण
उड़ा दी है कोई तिथि
और तुर्रा यह-
कि मैंने कविता की है!

वे अपनी इस मान्यता पर बराबर जोर देते रहते थे कि कविता मानवता की मातृभाषा है और किसी भी कवि का सर्वश्रेष्ठ उसकी मातृभाषा की मार्फत ही निकलकर आता है. अपनी मातृभाषा शीर्षक कविता में वे स्वयं अपने बारे में कहते हैं:

जैसे चींटियां लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई-अड्डे की ओर

ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूं तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा.

उनके अनुसार नागार्जुन अपनी मातृभाषा में सर्वश्रेष्ठ सृजन के सबसे बड़े उदाहरण हैं, जिन्होंने कई भाषाओं में रचा और अच्छा रचा पर सर्वश्रेष्ठ तो अंततः उनकी मैथिली कविताएं ही सिद्ध हुईं. इसलिए कि मैथिली उनकी मातृभाषा थी. ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ पढ़कर इसकी पुष्टि की जा सकती है.

बहरहाल, उन्होंने 1952-53 से जारी अपनी सृजन यात्रा में समय के साथ अपने पाठकों को ‘अभी बिल्कुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘यहाँ से देखो’, ‘अकाल में सारस’, ‘उत्तर कबीर एवं अन्य कविताएं’ ‘प्रतिनिधि कविताएं’ और ‘टालस्टाय और साइकिल’ जैसे कविता संग्रह दिए. इन संग्रहों की कविताओं के बारे में कहा जाता है कि उनमें हर कविता एक नया प्रस्थान है और उनकी पहले की पहचान को नया विस्तार देती है.
यों, वे अपने अनेक काव्यसमयों, लोकोन्मुख सांस्कृतिक बहुलताओं और ऐन्द्रिक बिंबविधानों के लिए भी जाने जाते रहे हैं.

उनका पहला कविता संग्रह 1960 में छपा था. इसके साल भर पहले, 1959 में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ उनको अपने द्वारा संपादित तीसरे सप्तक में महत्वपूर्ण सहयोगी कवि के रूप में शामिल कर चुके थे. लेकिन उनका कवि रूप इस अर्थ में कोरा नहीं है कि उनकी पांच गद्यकृतियां भी हैं-कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान, मेरे समय के शब्द, कब्रिस्तान में पंचायत और मेरे साक्षात्कार.

इनके अतिरिक्त वे अनियतकालीन ‘हमारी पीढ़ी’ व ‘शब्द’ के संपादन से भी जुड़े रहे और ‘तानाबाना’ (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), ‘समकालीन रूसी कविताएं’, ‘कविता दाक’ तथा ‘साखी’ (अनियतकालीन पत्रिका) का भी संपादन किया था.

अपनी जीविका के लिए उन्होंने अध्यापन का पेशा चुना था और कई कॉलेजों में अध्यापन करने व छोड़ने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में प्रोफेसर एमेरिटस और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के महत्तर सदस्य बने थे.

2014 में शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, अज्ञेय और केदारनाथ अग्रवाल की जन्म शताब्दियों के अवसर पर एक कार्यक्रम में भाग लेने वे फैजाबाद पहुंचे, तो उन्होंने अपने जीवन, संघर्ष, सोच व सरोकारों और सृजन वगैरह की बाबत इन पंक्तियों के लेखक से लंबी बातचीत की थी.

अब कर्तव्यनिर्वहन कठिन

यह पूछने पर कि उनके कविकर्म में प्रवृत्त होेते वक्त देश व समाज की जो स्थिति थी और जो अब उनकी लंबी यात्रा के बाद है, दोनों के अंतर को वे कैसे देखते हैं, उन्होंने जो जवाब दिया था, वह यह भी बताता था कि उन्हें अपने और अपने बाद आने वाले समय की गहराती कालिमा का भरपूर अहसास था.

उन्होंने कहा था: आज की स्थितियों में ठीक से कर्तव्यनिर्वहन हर किसी के लिए कठिन होता जा रहा है, जबकि पहले ऐसा नहीं था. पहले जो स्थितियां थीं, उनमें मनुष्य का नैतिक बल हर जगह नहीं तो ज्यादातर जगहों पर उसके काम आता था. अब कहीं नहीं आता. कई बार तो वह जरूरत के वक्त उपस्थित भी नहीं होता. खुद निर्बल हो जाता है.

उन्होंने अपनी बात को एक उदाहरण के सहारे समझाया था:

मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था तो एक दिन जिस जिले में वह कॉलेज था, उसके पुलिस प्रमुख ने सूचना दी कि मेरे कॉलेज का एक छात्र रात को डकैतों के एक नामी गिरोह के साथ डकैतियों में शामिल होता है. मैंने कहा कि मुझे इस बाबत कोई जानकारी नहीं है, लेकिन आप छात्र का नाम बताइये, मैं उसके विरुद्ध जो भी कार्रवाई या आपकी जो भी मदद कर सकता हूं, करूंगा. इसके बाद मैं अपने कक्ष में बैठा ही था कि देखा-एक छात्र निहायत शर्माया और ग्लानिग्रस्त-सा चला आ रहा है. उसने मेरे पास आकर कहा-’सर, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिन्दा हूं. इस कारण नहीं कि मेरे किए की पोल खुल गई है. इस कारण कि मेरे कारण आप जैसे कर्तव्यनिष्ठ प्राचार्य को शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी और कॉलेज की प्रतिष्ठा का भी हनन हुआ. मैं समझता था कि न मैं पकड़ा जाऊंगा और न आप को यह बात पता चलेगी.’

उसने मुझे वचन दिया कि अपना शर्म से नीचा सिर ऊंचा करने के लिए वह पश्चाताप करेगा. आगे क्या हुआ, नहीं बताऊंगा. लेकिन आज ऐसी शर्म-व-हया की बातें दुर्लभ हो गई हैं.

अकादमिक संस्थानों में ओछापन

जैसा कि पहले बता आए हैं, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से उनका खासा लंबा व गहरा जुड़ाव रहा था और अपने अंतिम दिनों में वे निराश थे कि अकादमिक संस्थानों के तौर पर विश्वविद्यालयों व कॉलेजों की जो प्रतिष्ठा व भूमिका थी और जिसके चलते परिवर्तनकामी लोग उनकी ओर बड़ी उम्मीद की निगाह से देखते थे, वह खत्म होती जा रही है. अब प्रायः सारे अकादमिक संस्थानों में गैरअकादमिक माहौल है, जिसके चलते वहां कुछ भी नया और महत्वपूर्ण करना मुश्किल है.

उन्होंने कहा था: मुझे लगता है कि इन संस्थानों के भीतर सतत चलती रहने वाली ओछी व स्वार्थी राजनीति ने, जो पोच-सोच द्वारा संचालित होती है, बहुत बड़ा नुकसान किया है. राजनीतिक सरकारें इन संस्थानों को अपना औजार बनाने के लिए जिस स्तर तक हस्तक्षेप करती हैं, नियुक्तियों और यहां तक कि दाखिलों वगैरह में भी, उससे कोढ़ में खाज की स्थिति पैदा होती जा रही है. अकादमिक पदों पर गैरअकादमिक लोग आ जाते हैं तो पीढ़ियों का नुकसान करते हैं. दुर्भाग्य से अभी जनता की चेतना का स्तर भी वह नहीं है कि इसके विरोध में भरपूर जनदबाव बन सके. ये संस्थान अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, इसके लिए जरूरी है कि उनको बदनीयत राजनीतिक दखल से निजात मिले और वे खुद अपनी रीति-नीति, दशा व दिशा तय कर सकें.

लेकिन यह निजात कैसे मिले? जिस हिंदी समाज पर इसकी चिंता का दायित्व है, उसका हाल भी उसके अकादमिक संस्थानों से जुदा नहीं है. साहित्य और संस्कृतिविरोधी माहौल वहां भी छाया हुआ है. दूसरी ओर आम लोगों की अच्छे साहित्य से दूरी या कि उदासीनता है कि खत्म होने को ही नहीं आ रही.

इस लेखक ने उनसे सहमति जताते हुए कहा कि हां, अब प्रायः हर शहर में कवियश: प्रार्थियों की एक बड़ी जमात पाई जाती है , जिसे ‘निज कवित्त’ छोड़कर कुछ भी नहीं रुचता. देशकाल से परे यह जमात अपनी आत्ममुग्धता और जड़ताओं को पालती-पोसती रहती है.

लेकिन उन्होंने इन कवियश: प्रार्थियों के प्रति निर्मम होने से मना कर दिया और उनका योगदान रेखांकित करते हुए कहा कि अपने आसपास अपने तौर पर कवि कर्म या साहित्य को जिंदा रखने का काम तो वे करते ही हैं. किसी और दृष्टि से नहीं तो मनोरंजन की दृष्टि से ही सही. उनके योगदान को इस रूप में देखा जाना चाहिए कि अब अच्छा मनोरंजन भी दुर्लभ हो चला है. तिस पर जहां वे काम करते हैं, वहां कोई आलोचना काम नहीं करती. बस, जनता की पसंद का ही न्याय चलता है. इसलिए उनके हिस्से का श्रेय उन्हें दिया ही जाना चाहिए.

फिर वे बोले थे: वास्तव में इन कवियश: प्रार्थियों की चेतना के पिछड़ेपन की जड़ें साहित्य के ऊपरी संस्तर से उनके असंवाद या कि विसंवाद में है और इसके लिए मैं ऊपरी संस्तर को ज्यादा जिम्मेदार मानता हूं. यह ऊपरी संस्तर निचले संस्तर के संस्कार को अपनी जिम्मेदारी ही नहीं मानता. उसे उसके हाल पर छोड़े रखता है.

इन दोनों संस्तरों में संवाद हो तो दोनों का भला हो. निचले का उन्नयन हो और ऊपर वाले को सुरुचिसंपन्न पाठक मिलें. पर अभी तो यह संवाद होता ही नहीं या वैसे होता है जैसे एक बार मेरे पिता और बाबा नागार्जुन के बीच हुआ था.

हुआ यह कि एक बार मुझे किसी काम से बाहर जाना था कि तभी अचानक बाबा आ धमके. मैंने उनसे कहा कि वे मेरे लौटने तक पिताजी से बातचीत करें. मजे की बात यह थी कि बाबा भी ऊंचा सुनते थे और पिता जी भी. पर ढाई-तीन घंटे बाद लौटकर देखा तो दोनों प्रेम से बतियाते मिले. मैं आश्चर्य जताया तो बाबा बोले कि हम दोनों ढाई घंटे से बात कर रहे हैं और दोनों में से कोई किसी को सुन नहीं रहा.

अक्षर भी बचायें, आवाजें भी

इस लेखक ने आगे कुछ कहना चाहा तो वे बोले थे: इस कठिन समय में अक्षरों को ही नहीं, स्वरों यानी आवाजों को भी बचाया जाना चाहिए. जितना भी बचाया जा सके. इसलिए कि किसी कवि की कविताओं को उसकी आवाज में सुनकर बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. कविता पाठ का टेप सुनने के बाद कविता की व्याख्या की आधी जरूरत स्वयमेव खत्म हो जाती है. पर इस दिशा में कुछ खास प्रयत्न नहीं हो रहे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)