‘स्त्री मुग़ल’: औरत की नज़र से मुग़लिया सल्तनत की कहानी

पुस्तक समीक्षा: पवन करण की किताब मुग़ल साम्राज्य की उन तुर्क, तैमूरी, अफ़गानी, इस्फहानी और राजपूतानी महिलाओं की आपबीती बयान करती है, जिन्होंने साम्राज्य को बनाने, बढ़ाने और उसके विस्तार में अहम भूमिका निभाई है.

पवन करण उन मुग़ल महिलाओं की आपबीती भी बयान करते हैं, जो इतिहासकारों की नज़र में कम महत्वपूर्ण होने के कारण उनके दस्तावेज़ों में अपना नाम दर्ज नहीं करा सकीं. (पुस्तक आवरण/राधा-कृष्ण प्रकाशन)

मुग़ल सल्तनत. इस साम्राज्य को बनाए और विस्तार दिए जाने के लिए हर रोज़ होती जंग. इन जंगों में हार-जीत के सेहरे बांधते राजा और बादशाह. इन राजाओं और बादशाहओं की मलिकाएं. जंगों में जीती गई महिलाओं की रुदाद और इन रुदादों को बर्दाश्त करती हरम की चार-दीवारी.

ये कुछ ऐसी बातें हैं, जो पवन करण की हालिया किताब ‘स्त्री मुग़ल’ को पढ़ते हुए दिमाग़ में दौड़ने लगती हैं. उन्होंने इस किताब में मुग़ल साम्राज्य की उन तुर्क, तैमूरी, अफ़गानी, इस्फहानी और राजपूतानी महिलाओं की आपबीती बयान की है, जिन्होंने किसी न किसी रूप में मुग़ल साम्राज्य को बनाने, बढ़ाने और उसे विस्तार दिए जाने में अहम भूमिका निभाई है. ये भूमिका न केवल बादशाह की ख़लवतों, महल के बाग़ानों और राजदरबार की महफ़िलों में निभाई गईं, बल्कि जंग के उन मैदानों में भी इन महिलाओं ने अपने जौहर दिखाएं, जिनमें हारने पर लुटने वाली चीज़ों और जीतने पर मिलने वाले माल-ए-ग़नीमत में वे ख़ुद भी शामिल रही हैं.

‘स्त्री मुग़ल’ काव्यात्मक शैली में लिखी गई एक ऐतिहासिक किताब है. इतिहास भी वो, जिसमें वर्तमान का हिंदुस्तान जीता-मरता है. उसकी कसमें खाता और उस पर नई जंगों, दंगों, विभाजनों और कुरीतियों को हवा देने से गुरेज़ नहीं करता है.

पवन करण उन मुग़ल महिलाओं की आपबीती भी बयान करते हैं, जो इतिहासकारों की नज़र में कम महत्वपूर्ण होने के कारण उनके दस्तावेज़ों में अपना नाम दर्ज नहीं करा सकीं. साहित्य की यही खूबी है. वह उन छोड़ दी गई, भुला दी गई या नज़रअंदाज़ कर दी गई चीज़ों की भी अहमियत का बखान करता है, जिन्हें इतिहास काठ-कबाड़ समझकर छोड़ देता है.

मुग़ल साम्राज्य के इतिहास को पढ़ते हुए हमें कुछ चुनिंदा महिला किरदारों, जिनमें बादशाह बाबर की बेटी गुलबदन बेगम, बादशाह अकबर की धाय माहम अंगा, उनकी बीवी जोधाबाई और कुछ इसी प्रकार चार-छह और महिलाओं का किरदार नज़र आता है. ‘स्त्री मुग़ल’ इस कमी को पूरा करती है. इस किताब से गुज़रते हुए अहसास होता है कि साम्राज्य जितना भौतिक रूप में विस्तार पाता जाता है, उसके किरदारों की संख्या भी उतनी ही बढ़ती जाती है.

शासन और साम्राज्य में महिला किरदारों की बात करते हुए लेखक पाठक का ध्यान हरम की ओर ले जाता है. हरम के बारे में लेखक ने अपनी इस किताब में भी लगभग उन्हीं विचारों का दोहराव किया है, जो वर्तमान समय में हरम को लेकर आम-ओ-फहम के नज़रिये को बयान करते हैं, जो किवदंतियों का निर्णाण करते हैं.

लेकिन क्या हरम वैसा ही था, जैसा हम आज सोचते और उसे समझते हैं?

आम-तौर पर माना जाता है कि हरम मुस्लिम साम्राज्य में राजमहल की वह जगह हुआ करती थी, जहां बादशाह की रानियां, उनकी बेटियां, बहन और माँ अपनी दासियों और कनीज़ों के साथ रहा करती थीं. जहां बादशाह के अलावा किसी भी अन्य पुरुष का जाना मना था. इन हरमों की सुरक्षा की जिम्मेदारी ख्वासासराओं (हिजड़ों) की हुआ करती थी.

यह हरम-संस्कृति का एक पक्ष है. हरम की ज़िंदगी वैसा नहीं हुआ करती थी जैसा कि अंग्रेज़ इतिहासकारों ने हमें बताया और हम उसको दोहराते रहते हैं. असल में हरम किसी भी राजमहल का एक निजी हिस्सा हुआ करता था, जो निजी और सार्वजनिक स्थानों के बीच अंतर करने के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा हुआ करता था.

यह अरबी भाषा के शब्द हरम (حرم) से आया है, जिसका अर्थ होता है ‘वर्जित क्षेत्र’ या ‘पाक, पाकीज़ा’. यह शब्द अरबी के हरीम (حريم) और हराम (حرام) से सम्बंधित है, जिनका अर्थ होता है ‘पाक़ीजा या अलंघनीय स्थान; परिवार की औरतों की जगह’.

‘स्त्री मुग़ल’ में लेखक ने महिला किरदारों की दास्तान बयान करते हुए हरम का इसी संदर्भ में उल्लेख किया है. जहां रानियां, मलिकाओं और कनीज़ों के साथ रहते हुए अपने शौहर यानी उस बादशाह का इंतज़ार करते हुए अपना वक्त गुज़ारती हैं, जो एक ही समय में उन सभी का शौहर है.

लेकिन हरम में क्या हर रानी केवल बादशाह का इंतज़ार करते हुए ही अपनी ज़िंदगी गुज़ारती थी? शायद नहीं. मुस्लिम सम्राज्यों में हरम वह जगह हुआ करती थी, जहां औरतों को रहने, खाने और घूमने-फिरने की पूरी आज़ादी थी. वे शायरी करती थीं, अदबी महफ़िलों का आयोजन करती थी, दरबार के कामों में हिस्सा लेती थी, बादशाह को सलाहें देती थी और कई बार तो उनकी सलाहों को बदलने में कामयाब भी रहती थीं. राजपाट चलाने में इन महिलाओं की कितनी भूमिका हुआ करती थी और बादशाहों पर उनका कितना प्रभाव रहा करता था.

इसे आप इस किताब में शामिल एक महिला किरदार के बारे में पढ़ते हुए जान सकते हैं. बाबर की नानी ईशान दौलत बेगम ने बाबर को हिंदुस्तान फ़तह करने की न केवल सलाह दी, बल्कि उसे इस अभियान पर जाने के लिए अपनी तलवार भी दी. यह उस वक्त की बात है, जब बाबर हिंदुस्तान आया नहीं भी था और मध्य एशिया में ही एक छोटे से भू-भाग पर अपनी सल्तनत चला रहा था. उस वक्त एक औरत के पास तलवार का होना न केवल उसकी बहादुरी और चतुराई को दर्शाता है, साथ ही यह भी बताता है कि शाही स्त्रियां केवल बादशाहों, शहजादों और वजीरों की वासना को तृप्त करने का खिलौना-मात्र ही नहीं हुआ करती थीं.

पवन करण ने मुग़ल साम्राज्य को चलाने में उल्लेखनीय योगदान देने वाली सौ से ज्यादा महिलाओं का ज़िक्र किया है. वह इन महिलाओं की ज़बानी उनकी इच्छाओं, कामनाओं, ख़ाहिशों, राजमहल में होती साजिशों, बादशाहत हासिल करने के लिए रचे जाते षडयंत्रों, शहज़ादों की मौहब्बतों, मलिकाओं की चाहतों और बादशाह की ज़िंदगी में उनकी भूमिका का वर्णन करते हैं. इनमें वे महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्होंने मुग़ल बादशाहों से जंग के मैदान में लोहा लिया और कई मोर्चों पर उन्हें शिकस्त भी दी. इन नामों में अहमदनगर की शहज़ादी चांद बीबी का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है.

यह पक्ष इस किताब को दिलचस्प बनाता है. इसमें उन स्त्रियों का मुग़लिया सल्तनत के प्रति नज़रिया पेश करने की कोशिश की गई है, जो किसी-न-किसी रूप से और कभी-न-कभी उससे संबंधित रही हैं, चाहे वे उस साम्राज्य को चलाने वाले बादशाहों की माँ, बहनें, बीवियां और कनीज़ों रही हों या फिर उनसे शिकस्त पाने वाले राजा-महाराजाओं की माँ, बहनें, बीवियां और दासियां.

यह मध्य-कालीन भारत के इतिहास को नए नज़रिये से पेश करने वाली दिलचस्प किताब है, जिसकी सभी किरदार महिलाएं हैं. इन महिलाओं ने स्वयं अपनी आप-बीती कही है, वह भी काव्यात्मक शैली में. मानो उन्होंने ख़ुद अपने बारे में, अपनी ज़िंदगी के बारे में और उस सल्तनत के बारे में, जिसमें वे जीवित रहीं, कविता लिखी हो. यह इस किताब को उल्लेखनीय और संग्रहणीय बनाता है.

किताब- स्त्री मुग़ल

लेखक- पवन करण

प्रकाशक- राधा-कृष्ण प्रकाशन

मूल्य- 290

(शहादत युवा कथाकार और अनुवादक हैं.)