एससीओ सम्मेलन: भारत-पाकिस्तान के बीच पहलगाम व ऑपरेशन सिंदूर को लेकर तीखी बयानबाज़ी

भारत और पाकिस्तान के हालिया सैन्य टकराव के बाद पहली बार दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने तियानजिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन में एक मंच साझा किया. इस दौरान दोनोंं विदेश मंत्रियों ने सावधानीपूर्वक एक-दूसरे का नाम लेने से परहेज़ किया, लेकिन पहलगाम आतंकी हमला और भारत-पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक चले सैन्य टकराव की झलक उनके बयानों में ज़रूर नज़र आई.

विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके पाकिस्तानी समकक्ष एम. इशाक डार. (फोटो: एक्स)

नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के हालिया सैन्य टकराव के बाद पहली बार दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में एक मंच साझा किया.

रिपोर्ट के मुताबिक, इस शिखर सम्मेलन के दौरान हालांकि दोनों देशों ने सावधानीपूर्वक एक-दूसरे का नाम लेने से परहेज किया, लेकिन पहलगाम आतंकी हमला और भारत-पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक चले सैन्य टकराव की झलक उनके बयानों में जरूर नज़र आई.

भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पहलगाम आतंकवादी हमले के जवाब में भारत की कार्रवाई को उचित ठहराते हुए एससीओ से आतंकवाद के प्रति कोई समझौता नहीं करने वाला रुख अपनाने का आग्रह किया.

मंगलवार (15 जुलाई) को पाकिस्तान, चीन और अन्य एससीओ सदस्य देशों के अपने समकक्षों की उपस्थिति में जयशंकर ने कहा कि पहलगाम हमला जम्मू-कश्मीर की पर्यटन अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और धार्मिक विभाजन पैदा करने की साजिश के तहत किया गया था.

उन्होंने कहा कि भारत आतंकवाद का सामना करने के लिए अपनी प्रतिक्रिया में दृढ़ रहेगा. इस संबंध में जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा हमले की निंदा का हवाला दिया, जिसमें हमले के दोषियों, आयोजकों, वित्तपोषकों और प्रायोजकों को जवाबदेह ठहराने का आह्वान किया गया था.

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने ‘बिल्कुल यही’ किया और वह ऐसा करता रहेगा.

एससीओ अपनी स्थापना उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहे: एस जयशंकर

उल्लेखनीय है कि भारत अक्सर यूएनएससी के बयान को ऑपरेशन सिंदूर के औचित्य के रूप में उद्धृत करता रहा है, जो पहलगाम हमले के बाद भारत के प्रतिकार के रूप में पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे पर लक्षित हमले थे. इस ऑपरेशन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक सैन्य टकराव चला था, जो बाद में संघर्षविराम की घोषणा के साथ बंद हुआ.

जयशंकर ने कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, जिसके हममें से कुछ वर्तमान में सदस्य हैं, ने एक बयान जारी कर इसकी कड़े शब्दों में निंदा की और ‘आतंकवाद के इस निंदनीय कृत्य के अपराधियों, इसके पीछे जिम्मेदार लोगों, फंड देने वालों और प्रायोजकों को जवाबदेह ठहराने तथा उन्हें न्याय के कटघरे में लाने की आवश्यकता पर बल दिया है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हमने तब से ठीक यही किया है और आगे भी करते रहेंगे. यह ज़रूरी है कि एससीओ अपनी स्थापना उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहे और इस चुनौती पर अडिग रुख अपनाए.’

मालूम हो कि इस वर्ष परिषद में एससीओ के तीन सदस्य हैं, जिनमें रूस और चीन स्थायी सदस्य हैं, जबकि पाकिस्तान अस्थायी सदस्य है.

जयशंकर ने उपस्थित लोगों को याद दिलाया कि एससीओ की स्थापना ‘आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद’ का मुकाबला करने के लिए की गई थी और इस बात पर ज़ोर दिया कि समूह को अपने संस्थापक सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘यह ज़रूरी है कि एससीओ इस चुनौती पर एक अडिग रुख अपनाए.’

जयशंकर ने यह भी कहा कि एससीओ वैश्विक मंच पर तभी प्रभावी हो सकता है, जब इसके सदस्य एक ‘साझा एजेंडे’ के पीछे एकजुट हों. इसका मतलब है कि सभी को साथ लेकर चलना.

ज्ञात हो कि विदेश मंत्री जयशंकर की यह टिप्पणी बीजिंग में वरिष्ठ चीनी अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय वार्ता के एक दिन बाद आई है.

जयशंकर की यह यात्रा, जो पिछले पांच वर्षों में किसी भारतीय विदेश मंत्री की पहली चीन यात्रा है, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य गतिरोध के समाधान के बाद संबंधों में आई नरमी के बीच हुई है.

पाकिस्तान ने पहलगाम के लिए बिना ठोस आधार के भारत द्वारा ज़िम्मेदार ठहराने की जल्दबाज़ी की आलोचना की

इस सम्मेलन में पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भी अपनी टिप्पणी में भारत का नाम लिए बीना पहलगाम हमले के लिए ‘बिना किसी विश्वसनीय जांच या सत्यापन योग्य सबूत’ के अभाव में भारत द्वारा ज़िम्मेदार ठहराने की जल्दबाज़ी की आलोचना की.

उन्होंने कहा कि इस हमले ने इस क्षेत्र को गंभीर संघर्ष के कगार पर ला खड़ा किया है.

उन्होंने युद्धविराम के प्रति पाकिस्तान की प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन ‘मनमाने बल प्रयोग’ को सामान्य बनाने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी.

मालूम हो कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम का श्रेय भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिया हो, लेकिन भारत ने इसे लेकर किसी भी बाहरी मध्यस्थता के दावों को खारिज किया है और इसे दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य संवाद का परिणाम बताया है.

इस बैठक में डार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्षेत्रीय स्थिरता केवल बातचीत और कूटनीति के ज़रिए ही हासिल की जा सकती है.

उन्होंने कहा, ‘इस संबंध में द्विपक्षीय समझौतों का सख्ती से पालन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा.’

गौरतलब है कि पहलगाम हमले के बाद भारत ने घोषणा की थी कि वह सिंधु जल संधि को ‘स्थगित’ कर रहा है. 1960 का यह समझौता दोनों देशों के बीच जल बंटवारे को नियंत्रित करता है.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने आगे कहा, ’22 अप्रैल के बाद से घटित घटनाएं दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के एक केंद्रीय सत्य की पुष्टि करती हैं कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए दीर्घकालिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान अनिवार्य है.’

अफ़गानिस्तान का मुद्दा, विकास सहायता बढ़ाने का आग्रह

इस सम्मेलन में भारत-पाकिस्तान विवाद के अलावा जयशंकर ने अफ़गानिस्तान का भी मुद्दा उठाया और एससीओ सदस्यों से विकास सहायता बढ़ाने का आग्रह किया, जिसके लिए भारत ने भी प्रतिबद्धता जताई.

उन्होंने क्षेत्रीय व्यापार और आवाजाही में बाधा डालने वाली चुनौतियों के समाधान की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया.

उन्होंने कहा, ‘इनमें से एक एससीओ क्षेत्र में सुनिश्चित आवाजाही का अभाव है. इसका अभाव आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग की वकालत करने की गंभीरता को कमज़ोर करता है.’

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का भी समर्थन किया, जिसके बारे में भारत को उम्मीद है कि यह गति पकड़ेगा.

जयशंकर ने कहा कि यह बैठक ऐसे समय में हुई है, जब वैश्विक व्यवस्था में ‘काफी अव्यवस्था’ है, जो बढ़ते संघर्ष, ज़बरदस्ती और आर्थिक अस्थिरता से चिह्नित है.

उन्होंने कहा कि एससीओ के समक्ष सामूहिक कार्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थिर करना और साझा चुनौतियों का समाधान करते हुए ‘विभिन्न आयामों को जोखिम-मुक्त’ करना है.

एससीओ सचिवालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि विदेश मंत्रियों ने शरद ऋतु में होने वाले नेताओं के शिखर सम्मेलन के परिणाम दस्तावेज़ों की तैयारी पर ध्यान केंद्रित किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस शिखर सम्मेलन के लिए चीन की यात्रा करने की संभावना है. विदेश मंत्रियों की बैठक के अंत में कोई अलग संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं किया गया, जैसा कि पिछले कई वर्षों से होता आ रहा है.

मालूम हो कि भारत ने पिछले महीने रक्षा मंत्रियों की बैठक के बाद संयुक्त वक्तव्य जारी करने पर इस आधार पर रोक लगा दी थी कि उसमें पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद पर नई दिल्ली की चिंताओं का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया था.