मिर्ज़ापुर: उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के संतनगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत दीपनगर आंबेडकर पार्क से डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा को अज्ञात असामाजिक तत्वों ने रात के अंधेरे में चुरा लिया. शुक्रवार (18 जुलाई) की सुबह इस घटना के सामने आने के बाद से स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश है.
जानकारी मिलते ही स्थानीय निवासियों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के नेता और सोनभद्र लोकसभा प्रभारी निराला कोल, गप्पू यादव और सपा जिलाध्यक्ष देवी चौधरी भी मौके पर पहुंचे. उन्होंने प्रशासन से घटना की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की.
स्थानीय लोगों ने इस कृत्य को न सिर्फ कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बताया, बल्कि इसे समाज में जानबूझकर शांति भंग करने की एक सोची समझी साज़िश करार दिया.
लालगंज क्षेत्राधिकारी अशोक कुमार सिंह ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि 18 जुलाई की रात दीपनगर आंबेडकर पार्क में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है. थाना संतनगर पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है और वैधानिक कार्रवाई जारी है. साथ ही, प्रशासन की ओर से नई प्रतिमा लगवाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है. फिलहाल क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनी हुई है.

मिर्ज़ापुर में पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
यह कोई पहली घटना नहीं है. जिले में लगभग 110 आंबेडकर प्रतिमाएं स्थापित हैं, और बीते कुछ वर्षों में कई बार उन्हें नुकसान पहुंचाया गया है.
गौरतलब है कि जनवरी 2025 में भी इसी आंबेडकर पार्क में बाबा साहेब की प्रतिमा को असामाजिक तत्वों ने तोड़ दिया था. प्रतिमा को गिराकर उसका सिर और चेहरा पत्थरों से तोड़ दिया गया था. उस घटना के बाद दलित और आदिवासी समाज के लोगों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद प्रशासन ने नई प्रतिमा लगवाई और भारी पुलिस बल की तैनाती की गई थी.
10 जून 2025 को हलिया थाना क्षेत्र के चककोटार गांव के सार्वजनिक पार्क में स्थित आंबेडकर की प्रतिमा को अज्ञात लोगों ने रात में क्षतिग्रस्त कर दिया था. सिर को धड़ से अलग कर करीब 200 मीटर दूर फेंक दिया गया था. उस पार्क में बुद्ध और अशोक स्तंभ की प्रतिमाएं भी मौजूद थीं.
गौरतलब है कि चककोटार गांव में इस प्रतिमा का अनावरण केंद्रीय राज्य मंत्री और मिर्ज़ापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल द्वारा साल 2024 के नवंबर महीने में किया गया था. इस घटना के बाद प्रशासन ने 24 घंटे के भीतर नई प्रतिमा लगवाई थी, लेकिन दोषी अब तक पकड़ में नहीं आए.
इसी प्रकार जिले के बेदौली गांव में भी आंबेडकर प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था.
चोरी की घटना से फिर उभरा आक्रोश
इस बार की घटना में चोर प्रतिमा को बाकायदा खोदकर ले गए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई सामान्य शरारत नहीं, बल्कि सुनियोजित घटना है. जैसे ही शुक्रवार सुबह प्रतिमा की अनुपस्थिति का पता चला, स्थानीय निवासियों के साथ-साथ राजनीतिक कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे.
लोगों ने आशंका जताई कि यह काम समाज को बांटने, जातीय सौहार्द बिगाड़ने और बाबा साहेब के अनुयायियों को उकसाने की मंशा से किया गया है.
स्थानीय नेताओं का कहना है कि बाबा साहेब की मूर्ति को हटाना केवल शरारत नहीं, बल्कि यह राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित कार्रवाई हो सकती है. कुछ लोगों का मानना है कि यह एक जातीय साज़िश है, ताकि दलित और आदिवासी समाज को भड़काया जा सके.
खेत किसान मजदूर यूनियन की जिलाध्यक्ष कामरेड जीरा भारती ने इस घटना को भाजपा की साज़िश बताया. उन्होंने कहा, ‘यह भाजपा वालों की साज़िश है, बाबा साहेब की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर आदिवासी कोल समाज के लोगों को फंसाने, उत्पीड़न करने की मंशा है.’
वह जोर देकर कहती हैं कि आखिरकार ऐसे लोग पकड़े क्यों नहीं जाते हैं जो बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा को कभी तोड़कर तो कभी उठाकर चुरा ले जाते हैं और कानून व्यवस्था को चुनौती देते हैं?’
उनका कहना है कि जब तक ऐसी घटनाओं में दोषियों को सज़ा नहीं दी जाएगी, तब तक यह सिलसिला जारी रहेगा और समाज में तनाव बढ़ता रहेगा.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश का मिर्ज़ापुर जनपद पिछड़ा इलाका है जहां आदिवासी, दलित और पिछड़ा वर्ग के सदस्यों की तादाद अत्यधिक है.
प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया, लेकिन नतीजे नदारद
स्थानीय निवासी कहते हैं कि हर बार प्रशासन नई प्रतिमा लगाकर स्थिति को सामान्य करने की कोशिश करती है. लेकिन असली समस्या तब तक बनी रहेगी, जब तक ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों की पहचान कर उन्हें सज़ा नहीं दी जाती. वे पूछते हैं कि आखिर बाबा साहेब की प्रतिमाएं ही क्यों निशाने पर हैं? क्या यह सिर्फ असामाजिक तत्वों की हरकत है, या इसके पीछे कोई राजनीतिक या जातीय उद्देश्य है?
अधिकांश मामलों में पुलिस सिर्फ ‘अज्ञात लोगों’ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करती है, और कुछ दिनों बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है. न तो कोई सीसीटीवी फुटेज सामने आता है, न ही कोई प्रत्यक्षदर्शी. इससे यह अंदेशा और गहरा होता है कि कहीं न कहीं इन घटनाओं के पीछे कोई सोची-समझी साजिश हो सकती है.
