बिहार और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही, मल्लाह जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का मुद्दा फिर से उठ खड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगी निषाद पार्टी, जिसका नेतृत्व कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद कर रहे हैं, इस मांग पर ज़ोर दे रही है. बिहार में इंडिया गठबंधन का हिस्सा विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) भी इस मुद्दे को उठा रही है.
हालांकि, यह मांग नई नहीं है. इसकी शुरुआत लगभग एक सदी पहले राम चरण मल्लाह के प्रयासों से हुई थी, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में मल्लाह समुदाय को उस समय दलित वर्ग, जो बाद में अनुसूचित जाति में परिवर्तित हो गया, में शामिल कराने का प्रयास किया था.
यह लेख जातिगत राजनीति में राम चरण मल्लाह के योगदान, विशेष रूप से मल्लाह जातियों को अनुसूचित जातियों के अंतर्गत लाने के उनके प्रयास, उनके द्वारा सामना किए गए वैचारिक संघर्षों और उनकी विरासत किस प्रकार आधुनिक जातिगत विमर्श को आकार दे रही है, का अन्वेषण करता है.
रामचरण मल्लाह एक प्रशिक्षित वकील के रूप में 20वीं सदी के शुरुआती दौर में लखनऊ में निषाद और मल्लाह जातियों की एक प्रमुख आवाज़ बनकर उभरे. उनकी क़ानूनी विशेषज्ञता और वाकपटुता ने उन्हें निचली जातियों के बीच लोकप्रियता प्रदान की. 1925 में उन्होंने निषाद/मल्लाह समुदाय में राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से ‘अखिल भारतीय निषाद महासभा’ की स्थापना की.
शुरुआती उत्साह के बावजूद, महासभा को संगठनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ा और वह गति नहीं पकड़ पाया. अकेले काम करने की सीमाओं को समझते हुए, रामचरण ने बड़े दलित आंदोलनों के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की. उन्होंने जल्द ही स्वामी अछूतानंद के आदि हिंदू आंदोलन से नाता जोड़ लिया, जो दलितों को भारत का मूल निवासी मानता था और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को चुनौती देने का लक्ष्य रखता था.
रामचरण की अपने स्पृश्य शूद्र समुदाय को अस्पृश्य दलितों के साथ जोड़ने की रणनीति को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. दलित नेताओं, खासकर दलित वर्ग के कई प्रतिनिधि जो खुद को अछूत मानते थे, उन्होंने मल्लाह जातियों के इस समावेश को अस्वीकार कर दिया. वे मल्लाहों को घुसपैठिया मानते थे, न कि ‘सच्चे अछूत’.
इस बीच जाटवों ने अपनी अलग पहचान स्थापित करना शुरू कर दिया और खुद को क्षत्रिय कहने लगे और चमार की जातिगत पहचान से अलग कर लिया. 1941 तक उन्होंने एक अलग जाटव जाति के रूप में आधिकारिक मान्यता के लिए सफलतापूर्वक अभियान चलाया.
इस जाति-आधारित विशिष्टता ने रामचरण द्वारा परिकल्पित व्यापक दलित एकता को कमज़ोर कर दिया. 1927 में यह तनाव तब स्पष्ट हो गया जब आदि हिंदू आंदोलन के इलाहाबाद अधिवेशन में रामचरण ने अधिवेशन की अध्यक्षता करने से इनकार कर दिया. इस आंदोलन से वह बाहर हो गए और मल्लाहों को औपचारिक रूप से आदि हिंदू पहचान से बाहर कर दिया गया. यह दलित लामबंदी के प्रयासों के भीतर के अंतर्विरोधों को दर्शाता है, जिसमें जातिगत अभिमान और पदानुक्रम सामूहिक संघर्ष को कमज़ोर कर रहे थे.
आदि हिंदुओं से नाता तोड़ने के बाद रामचरण स्वामी बोधानंद और चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु से जुड़ गए जो पिछड़ी शूद्र जातियों को संगठित कर रहे थे. बोधानंद ने कलवार, तेली, बरई, तंबोली, कहार, मल्लाह, गड़रिया और कुम्हार जैसी जातियों पर ध्यान केंद्रित किया. उन्होंने मिलकर 1928 में लखनऊ में ‘नवरत्न समिति’ का गठन किया, जो बाद में ‘हिंदू पिछड़ा वर्ग लीग’ और ‘मूल निवासी संगठन’ के रूप में विकसित हुई.
बोधानंद की ‘मूलनिवासी’ की विचारधारा ने रामचरण को गहराई से प्रभावित किया. इस विचार का तर्क था कि आर्य-पूर्व मूलनिवासी जातियां (स्पृश्य और अस्पृश्य दोनों) ब्राह्मणवादी आधिपत्य के अधीन थीं. बोधानंद ने एक अधिक समावेशी जाति गठबंधन के लिए सैद्धांतिक आधार प्रदान किया, जिसने आगे चलकर बहुजन दृष्टि की नींव रखी.
रामचरण और बोधानंद ने शूद्रों और अतिशूद्रों का एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए काम किया और दलित बनाम पिछड़ी जाति के द्वंद्व से परे एक सामूहिक पहचान की वकालत की. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि दोनों समूह उत्पीड़ित हैं और उनका इतिहास एक जैसा है, इसलिए उन्हें राजनीतिक रूप से एकजुट होना चाहिए.
राम चरण मल्लाह ने लखनऊ के आदि हिंदुओं के नाम एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की, जिसमें साइमन कमीशन से उत्पीड़ित जातियों के प्रतिनिधियों से सीधे परामर्श करने का आग्रह किया गया. उन्होंने तर्क दिया कि मल्लाह और अन्य पिछड़ी जातियां दलित वर्गों में शामिल होने की हकदार हैं, जो औपनिवेशिक सुधारों के दौरान सकारात्मक कार्रवाई पाने वाला वर्ग था.
राम चरण मल्लाह मानते थे कि अकेले संयुक्त प्रांत में ही दलित वर्ग की आबादी 2.9 करोड़ से ज़्यादा थी, जो उनके द्वारा पेश किया गया अनुमान था. उनके आंकड़े इस विचार पर आधारित थे कि उत्पीड़न सिर्फ़ अछूतों तक ही सीमित नहीं था; कई शूद्र भी समान रूप से वंचित थे. रामचरण ने ज़ोर देकर कहा कि उत्तर प्रदेश में जातिगत वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए अस्पृश्यता की परिभाषा को व्यापक बनाया जाना चाहिए, जहां कई पिछड़ी जातियों को भी गहरे भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
यह दृष्टिकोण डी.आर. नागराज के उस तर्क से मेल खाता है कि मनुवाद और मशीनवाद दोनों से पीड़ित लोग राज्य संरक्षण के हकदार हैं. रामचरण और बोधानंद की समावेशी दृष्टि उस सामाजिक न्याय की कहानी से मिलती-जुलती थी जिसे बाद में कांशीराम और मायावती जैसे नेताओं ने ‘बहुजन’ के तहत अपनाया.
रामचरण ने उत्तर प्रदेश मताधिकार समिति में तर्क दिया कि ‘दलित’ और ‘पिछड़ी’ जातियों के बीच उभरते भेद को समाप्त किया जाना चाहिए. उन्होंने सभी उत्पीड़ित समुदायों को शामिल करते हुए एक ही श्रेणी बनाने की मांग की. उन्होंने औपनिवेशिक प्रशासन के अस्पृश्यता की संकीर्ण परिभाषा की आलोचना की, जिसके तहत बड़ी संख्या में शूद्रों को छोड़ दिया गया था, जो राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर थे.
साइमन कमीशन की सुनवाई समाप्त होने के बाद भी रामचरण ने हार नहीं मानी . उन्होंने वायसराय को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि मल्लाहों को पूना समझौते के विस्तारित आरक्षण प्रावधानों के अंतर्गत शामिल किया जाए, क्योंकि अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व बढ़ गया है.
राम चरण लगातार परिसीमन सलाहकार समिति को मल्लाहों को बाहर रखने के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए अनुरोध करते रहे. लेकिन तब तक उनकी राजनीतिक साख खत्म हो चुकी थी. समिति के एक अध्यक्ष ने उनकी मांग को खारिज कर दिया. इसके बाद बढ़ते जातीय विखंडन और नौकरशाही प्रतिरोध के सामने एक समावेशी, एकजुट दलित-शूद्र मोर्चे का उनका सपना दम तोड़ गया.
हालांकि, रामचरण का अभियान बिना किसी आधिकारिक मान्यता के समाप्त हो गया, लेकिन उनके प्रयासों ने मल्लाहों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने का पहला गंभीर प्रयास किया. आज़ादी के बाद यह आंदोलन फीका पड़ गया. बाद में मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए सकारात्मक कार्रवाई की सिफ़ारिश की और मल्लाहों को इस श्रेणी में शामिल किया गया. हालांकि, इससे अनुसूचित जाति के दर्जे की ऐतिहासिक मांग पूरी नहीं हुई.
निषाद पार्टी और वीआईपी जैसी मल्लाह-आधारित पार्टियों द्वारा अनुसूचित जाति का दर्जा पाने की वर्तमान कोशिश को उस दूसरी शर्त के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है, जिसे क्रिस्टोफर जैफ्रालो ने अपनी किताब ‘इंडियाज साइलेंट रेवोलुशन’ में कहा है यह मूक क्रांति तभी प्रभावी होगी, जब अति पिछड़ी जातियां एकजुट होकर प्रमुख ओबीसी जातियों के खिलाफ सत्ता में अपना प्रतिनिधित्व हासिल करती हैं.
रामचरण मल्लाह अपने समय से आगे थे. मल्लाहों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने के उनके 20वीं सदी के शुरुआती दौर के प्रयासों ने उस बहुजन राजनीतिक कल्पना की नींव रखी, जो आगे चलकर उभरी. शूद्रों और दलितों के बीच एकता का उनका दृष्टिकोण, जिसे बोधानंद जैसे विचारकों का समर्थन प्राप्त था, 20वीं सदी के उत्तरार्ध के राजनीतिक आंदोलनों का पूर्वाभास था. हालांकि, उनकी समावेशी विचारधारा को अक्सर जातिगत बहिष्कार और प्रशासनिक उदासीनता ने कमजोर किया.
मल्लाह को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने पर आज की बहस नई नहीं है—यह एक सदी पुराने आंदोलन का पुनरुत्थान है. जैसे-जैसे पार्टियां जातिगत राजनीति के इर्द-गिर्द एकजुट हो रही हैं, राम चरण मल्लाह का दृष्टिकोण हाशिए पर पड़ी जातियों की राजनीति में गूंज रहा है. उनकी कहानी जातीय एकता की जटिलताओं और एक अधिक समतामूलक समाज की लंबी यात्रा को उजागर करती है.
(लेखक इलाहाबाद स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र हैं.)
