नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (29 जुलाई) को दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा 2001 में दायर मानहानि के एक मामले में मानवाधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस शैलिंदर कौर ने कहा कि पाटकर को दोषी ठहराने वाले निचली अदालत के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और उन्होंने इसे चुनौती देने वाली कार्यकर्ता की याचिका खारिज कर दी.
जस्टिस कौर ने कहा, ‘रिकॉर्ड देखने के बाद इस अदालत को (निचली अदालत के) आदेश में कोई अवैधता नहीं मिली और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, इसलिए इसे खारिज कर दिया जाता है.’
जस्टिस कौर ने कहा, ‘चुनौती वाला आदेश रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों और लागू कानून पर समुचित विचार करने के बाद पारित किया गया प्रतीत होता है. याचिकाकर्ता प्रक्रिया का पालन करने में स्पष्ट दोष या कानून के बिंदु पर स्पष्ट त्रुटि प्रदर्शित करने में विफल रहा है, जिसके परिणामस्वरूप न्याय का घोर हनन हुआ है, जो पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय इस न्यायालय के हस्तक्षेप को उचित ठहराता है.’
मालूम हो कि मेधा पाटकर और वीके सक्सेना का ये मामला करीब 24 साल पुराना है. दोनों साल 2000 से ही एक-दूसरे के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. उस समय मेधा पाटकर ने उनके और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ (एनबीए) के खिलाफ विज्ञापन छपवाने के लिए वीके सक्सेना के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया था.
तब वीके सक्सेना अहमदाबाद के एक गैर सरकारी संगठन ‘नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज’ के प्रमुख थे. इसके बाद वीके सक्सेना ने भी एक टीवी चैनल पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने और मानहानि वाले प्रेस बयान जारी करने के लिए मेधा पाटकर के खिलाफ दो मामले दर्ज दर्ज करवाए थे.
25 नवंबर 2000 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में पाटकर ने आरोप लगाया था कि सक्सेना एनबीए का गुप्त रूप से समर्थन कर रहे थे. उस समय सक्सेना के एनजीओ ने गुजरात सरकार की सरदार सरोवर परियोजना का सक्रिय रूप से समर्थन किया था. एनबीए इसके विरोध में एक आंदोलन चला रहा था. पाटकर ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने एनबीए को एक चेक दिया था जो बाउंस हो गया.
पिछले साल मई में एक मजिस्ट्रेट अदालत ने पाटकर के बयानों को अपमानजनक माना था और 1 जुलाई को उन्हें पांच महीने की जेल की सजा सुनाई थी. बाद में अदालत ने सजा को निलंबित कर दिया था और 29 जुलाई 2024 को उन्हें जमानत दे दी थी.
बता दें कि 25 अप्रैल 2025 को दिल्ली पुलिस ने इस मामले में मेधा पाटकर को गिरफ्तार किया था. हालांकि दिल्ली की एक अदालत ने गिरफ्तारी के कुछ घंटों बाद उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया था.
