नई दिल्ली: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार (30 जुलाई) को एक अहम फैसला सुनाते हुए हरिद्वार में चल रहे 48 अवैध स्टोन क्रशर प्लांट्स को तुरंत प्रभाव से बंद करने के निर्देश दिए हैं.
कोर्ट ने दो टूक कहा है कि ये यूनिट्स पहले ही न्यायिक आदेश के तहत अवैध घोषित हो चुकी थीं, बावजूद इसके इनका संचालन जारी रहना सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है.
मामला क्या है?
यह पूरा मामला हरिद्वार के एक पर्यावरणीय संगठन ‘मातृ सदन’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका (संख्या 15/2022) से जुड़ा है. याचिका में कहा गया था कि गंगा नदी के आसपास बड़ी संख्या में क्रशर प्लांट्स नियमों को दरकिनार कर धड़ल्ले से चल रहे हैं, जबकि इन पर कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है.
द वायर हिंदी से बातचीत में मातृ सदन के संन्यासी और कोर्ट में सदन का पक्ष रखने वाले वकील सुधानंद ने इस जनहित याचिका के पीछे की कहानी बताई.
वह याद दिलाते हैं:
6 दिसंबर, 2016 को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का एक ऑर्डर आया था, जिसमें गंगा में रायवाला से भोगपुर के बीच खनन बंदी और स्टोन क्रशर प्लांट्स को पांच किलोमीटर दूर ले जाने की बात थी. इस ऑर्डर के अनुपालन के लिए हाईकोर्ट ने 3 मई, 2017 को ऑर्डर पास किया था. उस आदेश के तहत 48 स्टोन क्रशर बंद हुए थे. एक रिपोर्ट जमा कर कोर्ट को इसकी जानकारी भी दी गई थी. लेकिन बाद में उन स्टोन क्रशर प्लांट्स को गलत ढंग से (आदेश की गलत व्याख्या कर) खोल दिया गया था. इसके बाद 9 अक्टूबर 2018 को नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) ने एक आदेश जारी करते हुए कहा कि सीपीसीबी के ऑर्डर के तहत ही स्टोन क्रशर प्लांट्स को बंद कर दिया जाए. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था, जिसके बाद हमने याचिका दायर की थी.
ध्यान रहे 3 मई, 2017 को हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि गंगा के तटीय क्षेत्र में जो भी स्टोन क्रशर मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं, उन्हें बंद किया जाए. आदेश में राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे अवैध खनन और क्रशिंग पर तुरंत कार्रवाई करें. लेकिन इन आदेशों का जो हश्र हुआ, वह अब सबके सामने है.
कोर्ट का ताज़ा आदेश
2017 के आदेश के बाद भी जब 48 स्टोन क्रशर प्लांट बदस्तूर चलते रहे, तो मातृ सदन ने 2022 में एक नई याचिका दाखिल की और कोर्ट को पुराने आदेशों के उल्लंघन की जानकारी दी. चार साल की सुनवाई के बाद 30 जुलाई, 2025 को कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि स्टोन क्रशर प्लांट्स अवैध तरीके से चल रहे हैं, और उन्हें तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए.
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि पूर्व के आदेशों की अवहेलना कर इन स्टोन क्रशर का संचालन कानून का उल्लंघन है.
अब हाईकोर्ट ने हरिद्वार के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को यह आदेश दिया है कि वे इन सभी 48 स्टोन क्रशर को तत्काल बंद कराएं. उनकी बिजली और पानी की आपूर्ति भी तत्काल प्रभाव से रोकें और सात दिन के अंदर इसकी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में दाखिल करें.
सुधानंद बताते हैं कि मामले में फाइनल सुनवाई बाकी है. उन्होंने कहा, ‘हरिद्वार में 100 से अधिक स्टोन क्रशर हैं, इसलिए कोर्ट ने फ़ाइनल सुनवाई की तारीख 12 सितंबर तय की है.’

अवैध खनन का लंबा इतिहास
उत्तराखंड में अवैध खनन और स्टोन क्रशिंग की कहानी कोई नई नहीं है. खासकर हरिद्वार, रायवाला और भोगपुर जैसे क्षेत्रों में गंगा के किनारे होने वाले अनियंत्रित खनन ने न केवल नदी की स्वच्छता पर असर डाला है, बल्कि स्थानीय पर्यावरण को भी संकट में डाला है.
सुधानंद बताते हैं, ‘इन लोगों (स्टोन क्रशर संचालकों) ने गंगा की हालत बहुत बुरी कर दी है. गंगा किनारे की उर्वर कृषि भूमि को बर्बाद कर दिया है. पर्यावरण को ऐसा नुक़सान पहुंचाया है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती.’
मातृ सदन – हरिद्वार स्थित एक सामाजिक और धार्मिक संस्था – ने बीते दो दशकों में इस विषय को लगातार उठाया है. संस्था से जुड़े संत, विशेष रूप से स्वामी शिवानंद सरस्वती, लंबे समय से गंगा की अविरलता और शुद्धता को लेकर भूख हड़ताल, आंदोलन और अदालती हस्तक्षेप करते आए हैं. इन्हीं प्रयासों की बदौलत कोर्ट ने 2017 में पहली बार सख्त रुख अपनाया था.

लेकिन अब, सात साल बाद, जब फिर वही क्रशर प्लांट खुले पाए गए, तो अदालत ने दोबारा अपनी सख्ती दिखाई है.
क्या पिछली बार की तरह बंद होकर फिर चालू हो सकते हैं प्लांट्स?
इस सवाल के जवाब में सुधानंद कहते हैं, ‘पिछली बार के कोर्ट ऑर्डर में इन्हें (स्टोन क्रशर संचालकों) एक तरह का लूपहोल मिल गया था, जिससे उनके पास आदेश की गलत व्याख्या का मौका था. इस बार कोर्ट ने उस लूप होल को बंद कर दिया है और साफ-साफ कहा है कि स्टोन क्रशर को बंद करें.’
इस आदेश के बाद अब देखना होगा कि हरिद्वार प्रशासन कितनी तत्परता से इस पर अमल करता है.
