नई दिल्ली: हमास और इज़रायल के बीच युद्धविराम को लेकर अप्रत्यक्ष तौर पर चल रही बातचीत एक बार फिर गतिरोध पर रुक गई है. दोनों पक्ष मुख्य मांगों को लेकर अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं, जबकि ग़ाज़ा में मानवीय स्थिति तेजी से बिगड़ती जा रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक, बीते सप्ताह 60 दिनों के युद्धविराम और संभावित बंधकों की रिहाई के लिए इज़रायल और हमास के बीच मध्यस्थता के उद्देश्य से हुई बातचीत विफल रही.
मालूम हो कि इस वार्ता में मध्यस्थता कर रहे कतर और मिस्र ने हाल ही में फ्रांस और सऊदी अरब के एक संयुक्त घोषणापत्र का समर्थन किया, जिसमें दो-राष्ट्र समाधान की दिशा में कदमों की रूपरेखा दी गई थी.
इस प्रस्ताव में हमास से अपने हथियार फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को सौंपने की मांग भी शामिल थी, जिसे हमास ने दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया.
शनिवार (2 अगस्त) को जारी एक बयान में, हमास ने दोहराया कि वह तब तक अपने हथियार नहीं डालेगा, जब तक कि एक संप्रभु फ़िलिस्तीनी देश की स्थापना नहीं हो जाती.
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, हमास ने ज़ोर देकर कहा कि वह एक बुनियादी राजनीतिक समाधान के बिना ‘सशस्त्र प्रतिरोध’ के अपने अधिकार का त्याग नहीं कर सकता.
ज्ञात हो कि इस संघर्ष खत्म करने और किसी भी समझौते के लिए इज़रायल हमास के हथियार डालने की शर्त को प्रमुख शर्तों में से एक मानता है.
हाल ही में इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने फ़िलिस्तीनी राज्य के विचार को ‘इज़रायल की सुरक्षा के लिए ख़तरा’ बताया और इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों पर सैन्य नियंत्रण इज़रायल के हाथों में ही रहना चाहिए.
उन्होंने युद्ध की तबाही के जवाब में फ़िलिस्तीन राज्य को मान्यता देने के लिए ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों के प्रयासों की भी निंदा की और ऐसे कदमों को ‘हमास के लिए पुरस्कार’ बताया.
उल्लेखनीय है कि हालिया संघर्ष 7 अक्टूबर, 2023 को हमास के नेतृत्व वाले उग्रवादियों द्वारा दक्षिणी इज़रायल पर किए गए हमले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे और 251 बंधक बना लिए गए थे. तब से इज़रायल की सैन्य प्रतिक्रिया ने ग़ाज़ा के अधिकांश हिस्से को बंजर भूमि में बदल दिया है.
फ़िलिस्तीनी अधिकारियों के अनुसार, 60,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गए हैं.
‘अकाल की सबसे बदतर स्थिति’
इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र और सहायता एजेंसियों के एकीकृत खाद्य सुरक्षा चरण वर्गीकरण (आईपीसी) पैनल द्वारा आधिकारिक मान्यता के माध्यम से ग़ाज़ा में मानवीय क्षति की भयावहता को रेखांकित किया गया.
एक कड़ी चेतावनी मेंआईपीसी ने घोषणा की कि ‘ग़ाज़ा पट्टी में वर्तमान में अकाल की सबसे बदतर स्थिति उत्पन्न हो रही है’ और आगे ‘मानवीय पीड़ा’ को रोकने के लिए युद्धविराम का आह्वान किया.
द गार्जियन को मध्य गाज़ा के मघाज़ी निवासी 38 वर्षीय जमील मुग़ारी ने बताया कि उनके बच्चों का ‘लगभग आधा वज़न कम हो गया है.’
उन्होंंने कहा, ‘मेरी पांच साल की बेटी का वज़न अब सिर्फ़ 11 किलो रह गया है. मेरा बेटा मोहम्मद तो बस हड्डी-मांस का रह गया है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘मेरा वज़न पहले 85 किलो हुआ करता था, अब घटकर 55 किलो रह गया है.’
मुग़ारी ने बताया कि भोजन की तलाश में वे थकावट से बेहोश हो गए थे. युद्ध शुरू होने के बाद से सात बार विस्थापित हो चुका उनका परिवार दाल और पानी के छिटपुट भोजन पर गुज़ारा कर रहा है.
उन्होंने कहा, ‘हमें सूप किचन से कोई खाद्य सहायता नहीं मिलती. वे केवल कुछ शिविरों के लिए, कम मात्रा में उपलब्ध हैं.’
सहायता ट्रकों तक पहुंचने की कोशिश में कई लोग मारे गए जा रहे हैं
इलाके में खाद्य वितरण अव्यवस्थित और खतरनाक बना हुआ है. ग़ाज़ा ह्यूमैनिटेरियन फाउंडेशन, जो चार खाद्य वितरण केंद्रों का संचालन करता है, दिन में केवल कुछ मिनटों के लिए खुलता है, जिससे भारी भीड़ उमड़ती है.
ग़ाज़ा में प्रवेश करने वाले सहायता ट्रकों तक पहुंचने की कोशिश में कई लोग मारे गए जा रहे हैं.
द गार्जियन से बातचीत में 58 वर्षीय विधवा मंसूरा फदल अल-हेलू ने कहा कि वह इतनी कमज़ोर हैं कि खाने की लाइन तक नहीं पहुंच पातीं और अपने बेटे को भी जाने नहीं देंगी, क्योंकि उन्हें डर है कि वह ज़िंदा वापस नहीं आएगा. ‘
उन्मेहोंने कहा, ‘मेरा सिर्फ़ एक बेटा यहां है, लेकिन मैं उसे सेना के ख़तरे के कारण हमेशा सहायता ट्रकों के पास जाने से रोकती हूं.’
अबू अल-अबेद, जो सात बच्चों के पिता हैं, ने बताया कि उनकी सबसे छोटी बेटी इतनी कुपोषित है कि उसकी पसलियों की हड्डियां बाहर निकली हुई हैं.
उनका कहना है कि खाने की कमी के कारण उन्हें चक्कर आते हैं और थकान महसूस होती है. वे अपने बच्चों के लिए असहाय महसूस करते हैं.
उन्होंने बताया कि उनका वैश्विक प्रतिक्रिया पर से भरोसा उठ गया है.
उनके अनुसार, ‘अगर हमने उनसे गाज़ा में जानवरों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कहा होता, तो वे तुरंत प्रतिक्रिया देते. लेकिन जब फ़िलिस्तीनी लोगों के अधिकारों की बात आती है, तो कोई भी हमें याद नहीं करता और न ही हमारे लिए कुछ महसूस करता है.’
