9 अगस्त, 1945
सुबह का सूरज अभी पूरी तरह चढ़ा भी नहीं था कि मानव इतिहास के सबसे काले पन्नों में से एक लिख दिया गया. जापान के नागासाकी शहर पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराया. तीन दिन पहले, हिरोशिमा पर ऐसा ही बम बरसा था. पलक झपकते ही हज़ारों ज़िंदगियां राख हो गईं, और आने वाली पीढ़ियों तक दर्द, विकलांगता और विकिरण का ज़हर फैल गया.
ऐसे ही समय और त्रासदी पर, हिंदी के महान कवि अज्ञेय ने लिखी थी अपनी मशहूर कविता ‘हिरोशिमा’ – जो केवल एक शहर का शोकगीत नहीं, बल्कि युद्ध और हिंसा के ख़िलाफ़ पूरी मानवता की चीख है.
आज, नागासाकी की उस बरसी पर पढ़ें ‘हिरोशिमा’ – ताकि अतीत की राख से सबक लेकर वर्तमान को समझें और भविष्य को सुरक्षित रख सकें:
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एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं,
नगर के चौक:
धूप बरसी
पर अंतरिक्ष से नहीं,
फटी मिट्टी से.
छायाएं मानव-जन की
दिशाहिन
सब ओर पड़ीं-वह सूरज
नहीं उगा था वह पूरब में, वह
बरसा सहसा
बीचों-बीच नगर के:
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्यों अरे टूट कर
बिखर गए हों
दसों दिशा में.
कुछ क्षण का वह उदय-अस्त!
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोक लेने वाली एक दोपहरी.
फिर?
छायाएं मानव-जन की
नहीं मिटीं लंबी हो-हो कर:
मानव ही सब भाप हो गए.
छायाएं तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजरी सड़कों की गच पर.
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया.
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है.
दिल्ली-इलाहाबाद-कलकत्ता (रेल में), 10-12 जनवरी, 1959
(साभार: कविता कोश)
