पेड़ों के उजड़ने से हो जाते हैं बदनसीब प्यार करने वाले 

राही डूमरचीर की कविता इस भेद को मिटा देती है कि स्त्री से प्रेम करने और प्रकृति से प्रेम करने में कोई अंतर है. क्या स्त्री के प्रेम में जान देने और एक पेड़ की रक्षा के लिये अपना हासिल दांव पर लगा देने में कोई फ़र्क है?

राही डूमरचीर का कविता संग्रह 'गाडाटोला' पहले आया होता तो इसे पढ़कर अपनी प्रेमिका का नाम 'नदी' रखता.

बिछड़ने के बाद उजड़ी हुई प्रेमिका, सूखती-सिकुड़ती, मृत्यु की ओर धकेली जाती ‘नदी’ की तरह दिखाई देती है. यदि राही डूमरचीर का कविता संग्रह ‘गाडाटोला’ पहले आया होता तो इसे पढ़कर अपनी प्रेमिका का नाम ‘नदी’ रखता. उसे नदी कहकर पुकारता और उसे नदी की तरह देखता और उससे राही डूमरचीर के ‘बांसलोई’ नदी से प्यार करने की तरह प्यार करता. उसका मुड़ना देखता. किनारे से सटी पत्थर की उस छोटी सी चट्टान पर जाकर बैठता और उसे घंटों निहारता, जिसे उसका पानी छू और छेड़कर निकलता है. हां उससे भी कहता कि वह मेरा नाम पानी रख दे और मुझे पानी कहकर पुकारे.

पर दोनों के बीच पानी की तरह बहता प्यार भी, प्यार में मात्र नमी जितना भी बच नहीं पाया. पानी सूखता रहा, नमी नष्ट होती रही. नदी से पहले पानी ने विदा ली, फिर प्यार ने. दोनों दूर गये. दोनों के पास अब अपने सूखने, मुरझाने, बिछुड़ने और तड़पने की स्मृति है. जिसमें प्रेम, संताप और पीड़ा की स्थानीय प्रतिकों में बिंधीं, रह-रहकर नेह की याद दिलाती छवियां हैं. सुबह-शाम की उपमाएं, उनसे आखिर कैसे बचा जा सकता है. फिर पलायन के चलते बिछुड़कर मिटने वाले ऐसे कितने होंगे? मगर आश्वस्तिकारक कि कवि की आंखों में उसके लौट आने की प्रतीक्षा भी है. प्रेम, पेड़, पत्तियां और पानी बचा लेने की आस है. उसके साथ बने रहने की ठनक है. उस वृक्ष-श्रृंखला को बचा लेने की आस जो उसके संदेश को उस तक और उसके संदेश को उस तक लेकर जाती-आती है.

क्या स्त्री से प्रेम करने और प्रकृति से प्रेम करने में कोई अंतर नहीं. क्या स्त्री के प्रेम में जान देने और एक पेड़ की रक्षा में अपना हासिल दांव पर लगा देने में कोई असमानता है. गाडाटोला में रहते कवि राही डूमरचीर अपनी कविता में इस भेद को मिटा देते हैं. इस बेचैन गडमड में यह कुछ ठहरकर समझ आता है कि वे एक समय में एक साथ स्त्री और प्रकृति दोनों को प्रेम कर रहे होते हैं. उनका संबोधन स्त्री और प्रकृति दोनों के लिए है. वे अपनी कविता के पाठक को पहाड़, नदी, पानी, पेड़, पत्तों, चिड़ियों तथा गिलहरियों और मनुष्यों के भोलेपन की ऐसी दुनिया में ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जहां पहुंचकर उसे लगता है कि काश उसके हिस्से में भी पुरखों की ऐसी प्रांतर-प्राकृतिक विरासत होती.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

हर दिन आगे धकेलती झकरों और कांटों भरी पगडंडी

मगर ये रास्ता रूमानियत का नहीं ये जीवन के जटिल प्रश्नों से जूझने को हर दिन आगे धकेलती झकरों और कांटों भरी पगडंडी है. जहां अमानुष आर्थिक राजनैतिक शक्तियां उसका सब कुछ छीन लेने पर आमादा हैं. उनकी असीमित धनार्जन की हवस पीढ़ीगत रहवासियों का सब हड़पकर उन्हें मृत्यु की और धकेल देने पर उतारु है. जिनके लिए जंगल बस कोयले की खान और पत्थर की खदान है. जिनके लिए आदिवासी जीवन बस आसान भोग्य है. तब इन रहवासियों के पास मादल की थाप से निकलने वाली उस हाय के अलावा क्या है. क्या पुरखे कवि ने इन्हीं जैसों की मरी खाल की हाय से लोहा भस्म होने की बात कही थी.

लेकिन अफसोस कि अब आदिवासियों की हाय से लोहा भस्म नहीं होता उनकी मांदल की थाप से उठती हाय सुनाई देते हुए भी सुनी नहीं जाती. बल्कि इस हाय पर उनका नाचने को मन करता है. आलीशान दफ्तरों की मंहगी टेबिल को उंगलियों से बजाते उनके हाथ जंगल के इन रहवासियों की लोहे और उससे भी मूल्यवान धातुएं खोदकर उन्हें बाजार के हाथों में धर देते हैं. जो दिन-रात नोटों में बदलती जाती है. जमीन में दबीं वे धातुएं जिनके संपर्क में आदिवासियों की नालें हैं. धातुएं ले जाई जाती हैं. नालें कुचल दी जाती हैं. सदियों से सक्रिय सरल जीवन को इस तरह अपनी जड़ों से काट दिया जाता है. काटा जाता रहता है. अपनी जमीन को खुद से ज्यादा चाहते विद्रोहियों के लिए उनके मुंह में गाली और हाथों में बंदूक में भरी गोली है. जो जंगल के इन आदिवासिदों को पलायन को विवश करतीं शहरों की और धकेलती हैं. गलियों में भटकना सिखाती है.

सरकार की बात नहीं मानना अपराध है

सरकार से अपनी बात कहना अपराध है

सरकार से लड़ना अपराध है

सरकार की नहीं मानोगे तो सरकार तुम्हें 

आदिवासी नहीं अपराधी कहकर मार डालेगी

जब जंगल में आदिवासी नहीं थे क्या सरकार तब भी थी

जब जंगल में आदिवासी नहीं होंगे सरकार तब भी होगी

पेड़, पहाड़, पानी, बनस्पतियां, लताएं-फूल-फल, शहद

मांदल-नृत्य, हड़िया कुछ नहीं होगा सरकार तब भी होगी

मगर कविता से बड़ी, कोई दूसरी उम्मीद खोज पाना शायद सबसे मुश्किल है, गाडाटोला की धड़कती हुई कविता संवेदन-संकेत देती है. जो चला गया उसकी आंखों में जाने से बड़ा सपना लौटने का है. जो वह सोते-जागते देखता है. स्वप्न से संघर्ष की तरफ बढ़ने वाले जो नहीं जाते वे यहीं मारे जाते हैं, दफ्ऩ हो जाते हैं. उनके शव दाड़िम के फूल से दहकते हैं. मरते हुए वे अपनी जमीन पर एक पेड़ की तरह जन्म लेने का सपना देखते हुए चिता पर जलते हैं. हवा उनकी राख को उड़ाकर जंगल में दूर-दूर तक बिखेर देती है.

सरकारी कैलेंडर जंगल-जीवन के सबसे बड़े शत्रु रहे हैं

जंगल की जिंदगियों की जिंदगी हर बरस सरकारी केलेंडरों में छपने वाली जिंदगी जैसी कभी नहीं रही. वह उससे भी अच्छी थी. केलेंडरों पर बस उनका श्रंगार रहा. उसका अच्छा होना उनके बीच तक सीमित था. मगर शहर हर बरस उसे अपनी आंखों में अच्छा दिखने के लिए अपने अनुसार गढ़ता रहा. यह सेंधमारी रुक-रुककर देश भर में कहीं न कहीं चिकने कागज पर अब भी छपती और प्रकाशित होती है. और इस तरह उससे बाहर के बहशी जीवन को उसे लूट लेने के लिए तैयार किया जाता रहा.

कविता के पाठक को पहाड़, नदी, पानी, पेड़, पत्तों, चिड़ियों तथा गिलहरियों और मनुष्यों के भोलेपन की दुनिया मिलती है.

सरकारी कैलेंडर जंगल-जीवन के सबसे बड़े शत्रु रहे हैं, अब तक उन्होनें ही इन दस्युओं को जो उनके बीच कभी किताबें, कभी दवाएं लेकर पहुंच जाते हैं, तैयार किया है. जिन्होंने सेवाभाव के नाम पर भी जो किया है उसके बदले में षडयंत्र करके आदिवासी जीवन से बहुत सारा हासिल भी किया है. उसका मरना-जीना अपना था उसके रोग-शोक अपने थे. उसका खान-पान अपना था उसके नृत्य गीत अपने थे. उदारता, यहां पहुंचकर अनुदार होने में तुम्हें कितना कम समय लगा? अफसोस, ईमानदारी इनके बीच पहुंचकर तुम कितनी जल्दी बेईमान हुईं. गाडाटोला की कविताओं की आंखों में प्रश्न हैं.

क्या यह सच नहीं कि नहीं कि पुलिस थानों,स्कूलों और अस्पतालों में नियुक्त निगाहें, जंगल की फूल कुमारियों की छातियों और उनके द्वारा बीन-चुनकर लाईं बनस्पतियों पर टिकी रहती हैं. इन छोटीं सरकारों को कठघरे में खड़ा करते हुए, सीधे बड़ी सरकार को देखिए जिसकी मक्कार आंख उनके जंगल की जमीन और जमीन के भीतर पर है. जंगल के जीवन की इन विषैली परिस्थियों के बीच गाडाटोला की कविताएं आदिवासी जीवन के बिछुड़ते-बिखरते प्रेम और पलायन से पैदा, विस्थापन की व्यथा से उपजी पीड़ा के मार्मिक आख्यान की तरह हमारी संवेदना के द्वार पर दस्तक देती हैं. वह शोषणकारी ताकतों की पहचान को और भी स्पस्ट करती हैं.

राही डूमरचीर की कविताओं के इस संग्रह को मात्र जंगल के जीवन की शेष जीवित गतिविधियों और उनके बीच लगातार बढ़ती उनकी शोषणकारी और दलाल शक्तियों के रेखांकन की कविताएं कहने में पाठकों को सोचना पड़ेगा मगर इसे बस प्रेम कविताओं का संग्रह भी नहीं कहा जा सकता. इस संग्रह की प्रेम कविताओं में जंगल धड़कता है तो प्रेम गिलहरी की तरह फुदकता और पक्षियों की तरह उड़ान भी भरता है. यदि संग्रह की कविताओं में नदी और स्त्री दोनों का पलायन करते जाना है तो बंगाल से गाडाटोला लौटकर अपने खेत जोतने की इच्छाशक्ति भी है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

प्रेम के हाथों बुने जंगली घास के घोसले

राही डूमरचीर की कविता, किताबों से स्वाद तक, कहां-कहां विचरती है. मगर जहाज के पक्षी की तरह पुन: अपने जहाज यानि अपने प्रेम के हाथों बुने जंगली घास के घोसले में लौट आती है. कविताओं में आदिवासी जीवन, प्रकृति, पहाड़-पेड़-पत्तों के अनूठे बिंब है. उनकी कविता भी जगह-जगह प्रेमिका और पानी की तरह मुड़ती है. इस संग्रह में ‘मुड़ना’ अनोखी क्रिया है. भाषा की विशेषता यह है कि वह कविताओं के परिवेश से मेल खाती है. भाषा कविता के बाहर नहीं उसका हिस्सा है. प्रेम भी.-

§

सोने न दिया जाये तो बुरा मान जाती है रात भी

सो नहीं पाने वाली जगहें बहुत बदनसीब होती हैं

*

प्रपात असल में पहाड़ों में हमारे वापस न लौट पाने का आर्तनाद है

*

आज फिर से तुम पर नहीं लिख पाया कुछ…. लिखना शुरु करुं… तो जंगल में भागती पगडंडी हो जाती हो तुम

*

रास्ते हों तो दरख्त भी हों कविता में इतनी छांव जरूरी है

*

नदी किसी दिन सूख जायेगी सोच ही नहीं पाए कभी

लगा ही नहीं कि पहाड़ों से बार-बार कूदती-फांदती

आती नदी छोड़कर चली जाएगी हमें एक दिन

*

आंखों पर इतना प्यार बरसाने वाले तुम लोग

ऐसी आंखें कहां से लाए

जो पहाड़ देखती हैं तो पैसा देखती हैं

नदी देखती हैं तो पैसा देखती हैं

पेड़ देखती हैं तो पैसा देखती हैं

हमें देखती हैं तो फ़ायदा देखती हैं

*

खेल तो कहीं और रहे थे तुम, जब तक हम समझ पाते

हम शहरों की पराई गलियों में धकेल दिए गए 

*

पांच फ़ीट के इन्सान की मौत पर 

रोता है इन्सान बुक्का फाड़कर 

इतने बड़े पेड़ की मौत से

कुछ फ़र्क नहीं पड़ा सहृदयों की मौत पर

*

शहर मेरे पहाड़ों की तरफ़ 

अपनी जीभ का विस्तार कर रहा था

*

नदी में बालू था घुटने भर..साथ में पानी सालों भर

अब कुछ गड्ढे हैं याद-भर.. जो बांसलोई की 

अर्थी ढोने वालों की गाड़ियों से बने हैं

*

कितना खूबसूरत है इज्ज़त का मिट्टी में मिल जाना

जब भी मिट्टी में मिली इज्ज़त जिंदगी और बेहतर खिली

*

नाच की लय से जैसे भूले से भी नहीं भटकती 

मांदर की ताल.. ऐसा कोई साथ चाहती है लड़की

*

कविता के बाहर यह बात ज्य़ादा ख़ौफ़नाक है-

पेड़ों के उजड़ने से बदनसीब हो जाते हैं प्यार करने वाले

*

नदी जब याद करने लगती है अपना अतीत 

शुरु हो जाती है यात्रा सभ्यता के अंत की

*

देखना कोई न छूटे निश्चिंत होकर लिखना

तब नहीं होऊंगी मैं गुनाह तुम्हारे मिटाने को

*

हम गंगा के पानी को अंजुरी में भरते हैं

मनोकामनाएं पूरी करने की करते हैं फ़रियाद 

क्या हम अँजुरी में भरे हुए… पानी की कभी सुनते हैं

*

जाया नहीं जाता जिस तरह 

ठीक उस तरह तुम जा रही हो

*

कैसा नासमझ था तुम्हें तो होना था नदी 

और मैं बांधने चला था

*

क्या समय था वह जब पानी और प्यास 

साथ-साथ चलते थे..जब जहां प्यास लगती

पानी वहां पहले से मौजूद होता पिये जाने को लालायित

*

सबसे खूबसूरत दिनों के लिए 

संभालकर रखीं थी उसने अपनी आंखें हमारे लिए 

*

स्त्रियां हारकर इश्क में जिताती रहीं प्रेमियों को

अनगिनत तोड़े गये भरोसे के बावजूद

मौक़ा देती रहीं आदमियों को

*

किताबें ख़िलाफ़ होती हैं तुम्हारे किताबी होने के

किताबों को ही अंतिम सच मानने के

किताबें भरोसे की साथी हैं उन्हें भी अगर भरोसा हो जाए

वे अंतिम ठिकाना नहीं हैं

कि एक दिन वे नहीं रह जाएंगी ज़रूरी

*

पतझड़ को तुमने भी अपनी कविता में दुख लिख दिया

पतझड़ दुखों का मौसम नहीं है  

(लेखक कवि हैं, सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं.)