नई दिल्ली: गृह मंत्रालय तक बताने को तैयार नहीं है कि भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन से दस्तावेज़ वैध हैं, लेकिन चुनाव आयोग अभी भी कह रहा है कि वह कुछ चुनिंदा दस्तावेज़ों के जरिये ही व्यक्ति को मत देने की पात्रता देगा यानी, उसे नागरिक मानेगा.
इस तरह मत और नागरिकता के अधिकार को लेकर जो बहस बिहार से शुरू हुई है, उसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 13 अगस्त को भी जारी रही.
अदालत में बहस मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं को लेकर हो रही थी.
बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पश्चिम बंगाल को तीन दिन पहले ही एसआईआर का नोटिस मिला है और इस मामले में राज्य सरकार से कोई परामर्श नहीं किया गया.
चूंकि विशेष गहन पुनरीक्षण पूरे देश में होने वाला है, तब प्रत्येक मतदाता पर नागरिकता साबित करने का बोझ आएगा. लेकिन आख़िर वह कौन से दस्तावेज हैं, जिससे नागरिकता साबित की जा सकती है?
याचिकाकर्ताओं की तरफ पेश हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार को दलील दी कि एसआईआर के तहत मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने का बोझ डाल दिया, जो गलत है.
उन्होंने कहा कि यह तरीका सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (1995) के फैसले के विपरीत है, जिसमें नए और मौजूदा मतदाताओं के बीच अंतर किया गया था और निर्वाचन आयोग को मौजूदा मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने का बोझ डालने से रोका गया था.
लेकिन बुधवार की जिरह के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची एक टिप्पणी ने ध्यान आकर्षित किया. जस्टिस बागची ने सिंघवी को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार में चल रहे एसआईआर में नागरिकता साबित करने के लिए 11 दस्तावेज़ों में से किसी का भी उपयोग किया जा सकता है, जबकि बिहार से पहले झारखंड में हुए मतदाता सूची के संक्षिप्त पुनरीक्षण में पहचान प्रमाण के रूप में केवल सात दस्तावेज़ों की ही अनुमति थी.
उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेज़ उपलब्ध होना मतदाता-हितैषी माना जाएगा, न कि प्रतिबंधात्मक.
क्या चुनाव आयोग नागरिकता का प्रमाण मांग सकता है?
एसआईआर की शुरुआती आलोचनाओं में मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने के बोझ को रेखांकित किया गया था. सवाल उठा था कि क्या चुनाव आयोग को नागरिकता पूछने का अधिकार है? सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि ‘नागरिकता का मुद्दा निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय द्वारा तय किया जाना चाहिए.’
तब चुनाव आयोग ने कोर्ट में एक जवाबी हलफनामा दाखिल करते हुए कहा था कि उसके पास नागरिकता का प्रमाण मांगने का अधिकार है:
निर्वाचन आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जांच करे कि प्रस्तावित मतदाता, मतदाता सूची में पंजीकरण के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा करता है या नहीं, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत नागरिकता का आकलन भी शामिल है. इस तरह की जांच संवैधानिक रूप से अनिवार्य है और 1950 के जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) के तहत स्पष्ट रूप से निर्धारित है. यह शक्ति सीधे अनुच्छेद 324 को अनुच्छेद 326 और 1950 के आरपी एक्ट की धारा 16 और 19 के साथ पढ़ने पर प्राप्त होती है.
निर्वाचन आयोग ने यह भी संकेत दिया था कि यह तथ्य पूरी तरह सही नहीं है कि केवल केंद्र सरकार को ही नागरिकता से संबंधित मामलों को देखने का अधिकार है.
उसने कहा था:
1955 के नागरिकता अधिनियम की धारा 9 केवल उन मामलों में नागरिकता समाप्त करने की बात करती है, जब किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता प्राप्त कर ली हो, और इस संबंध में यह अधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है कि वह यह तय करे कि भारत के किसी नागरिक ने कब या कैसे किसी अन्य देश की नागरिकता हासिल की. यह केवल इसी सीमित उद्देश्य के लिए है कि विशेषाधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है, और अन्य सभी प्राधिकरण इससे बाहर रखे गए हैं.
नागरिकता से संबंधित अन्य पहलुओं की जांच अन्य प्रासंगिक प्राधिकरण अपने-अपने उद्देश्यों के लिए कर सकते हैं, जिनमें वे भी शामिल हैं जो संवैधानिक रूप से ऐसा करने के लिए बाध्य हैं, यानी निर्वाचन आयोग.
आयोग ने अदालत को यह भरोसा दिलाने की भी कोशिश की कि, ‘एसआईआर अभ्यास के तहत, किसी व्यक्ति की नागरिकता केवल इस आधार पर समाप्त नहीं होगी कि उसे मतदाता सूची में पंजीकरण के लिए अयोग्य पाया गया है.’
बदल रहा है अदालत का रुख़?
एसआईआर से पहले तक नए मतदाता के रूप में ख़ुद को पंजीकृत कराते वक्त सिर्फ नागरिकता के लिए सेल्फ डिक्लेरेशन काफी होता था. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि ‘चुनाव आयोग का फॉर्म 6, जो नए मतदाताओं का पंजीकरण करता है, उसमें अब तक केवल यह घोषणा भरनी होती थी कि आवेदक भारतीय नागरिक है — कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं देना होता था (केवल आयु और पते का प्रमाण आवश्यक होता था).’
लेकिन बिहार एसआईआर के लिए एक नया घोषणा-पत्र जोड़ा गया है, जिसमें नागरिकता का दस्तावेज़ी प्रमाण देना जरूरी किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी है, जिसकी सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ कर रही है. पीठ की अगुवाई जस्टिस सूर्यकांत कर रहे हैं.
हाल में जस्टिस सूर्यकांत ने सेल्फ डिक्लेरेशन वाली प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है:
नागरिकता देने या नागरिकता वापस लेने का कानून संसद को बनाना होगा. इस पर कोई बहस की ज़रूरत नहीं है. लेकिन एक बार वह कानून बन जाने के बाद और उसके प्रावधानों के तहत अगर किसी को नागरिक के रूप में मान्यता दी गई है, तो ऐसे व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करना और जिसे नागरिक के रूप में मान्यता नहीं मिली है और जो नागरिक नहीं है, उसे सूची से बाहर करना-यह काम केवल आयोग को ही करना होगा.
शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल स्वयं-घोषणा के आधार पर नागरिकता तय करना कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है और जोड़ा कि चुनाव आयोग उनकी प्रामाणिकता की जांच कर सकता है.
तो नागरिकता साबित कैसे होगी?
इस सवाल का स्पष्ट जवाब उस गृह मंत्रालय के पास भी नहीं है, जो नागरिकता देने और लेने का काम करता है.
जी हां, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंगलवार (12 अगस्त, 2025) को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया कि भारत में नागरिकता साबित करने के लिए किन-किन ‘वैध दस्तावेज़ों’ की आवश्यकता होती है. मंत्रालय ने कहा कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके तहत बने नियमों से होता है.
दरअसल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के सांसद सुदामा प्रसाद ने मंत्रालय से अन्य सवालों के अलावा यह भी पूछा था कि पूछा ‘भारत में नागरिकता साबित करने के लिए किन-किन वैध दस्तावेजों की श्रेणियों का विवरण सरकार के पास है.’
राज्य गृह मंत्री नित्यानंद राय ने लिखित उत्तर में कहा, ‘भारत की नागरिकता, नागरिकता अधिनियम 1955 और उसके तहत बनाए गए नियमों के प्रावधानों के अनुसार तय होती है.’
स्वीकार्य दस्तावेजों का उल्लेख किए बिना, जवाब में कहा गया कि नागरिकता ‘जन्म (धारा 3), वंश (धारा 4), पंजीकरण (धारा 5), प्राकृतिककरण (धारा 6) या क्षेत्र के विलय (धारा 7) के आधार पर हासिल की जा सकती है. नागरिकता प्राप्त करने और तय करने के लिए पात्रता मानदंड नागरिकता अधिनियम 1955 और उसके तहत बनाए गए नियमों के प्रावधानों के अनुसार है.’
इससे पहले, 5 अगस्त को मंत्रालय ने लोकसभा को बताया था कि नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह हर भारतीय नागरिक का पंजीकरण करे और उन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करे.
मंत्रालय ने यह जवाब तृणमूल कांग्रेस की सांसद माला रॉय के उस सवाल पर दिया था, जिसमें उन्होंने उन कार्डों का विवरण पूछा था, जिन्हें कानून के मुताबिक भारतीय नागरिक की पहचान के रूप में स्वीकार किया जाता है.
नियमों में कहा गया है कि राष्ट्रीय पहचान पत्र उन नागरिकों को जारी किए जाएंगे जिनका विवरण भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) में दर्ज है.
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी तो हुआ नहीं है, और जिस एक राज्य (असम) में यह प्रक्रिया पूरी करने कोशिश हुई, उसका अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है.
ध्यान रहे, सुप्रीम कोर्ट हाल में चुनाव आयोग की हां में हां मिलाते हुए कहा है कि आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता है. इसी तरह बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कहा है कि आधार कार्ड के साथ-साथ पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड को भी नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता है.
