प्रत्येक वर्ष अनगिनत किताबें प्रकाशित होती हैं. हर लेखक चाहता है कि उसके लेखन पर बात हो, किताब अधिक-से-अधिक पाठकों तक पहुंचे. इसके लिए वह अनेकानेक प्रयत्न करता है तो कभी बिना प्रयास के ही किताब पाठकों के मन को लुभा ले जाती है. कभी किसी किताब पर खुलकर बात होती है, कभी दबे-छिपे शब्दों में. किंतु मनुष्य की ही भांति सभी किताबों की नियति भी एक-सी नहीं होती. कुछ किताबें सूर्य के आलोक में दमकती हैं, कुछ तहख़ाने की गर्त में धूल फांकती हैं.
पत्रिकाएं सिमट गई हैं, पत्रिकाओं के पाठक भी. लंबी समीक्षाएं, आलोचनाएं पहले के मुक़ाबले कम हो चली हैं. अब सोशल मीडिया पर सब तुरत-फुरत हो जाता है…इधर किताब आई, उधर प्रतिक्रियाओं की बाढ़. हालांकि यह लेखक की प्रसिद्धि पर भी निर्भर करता है. सभी को यह सौभाग्य नहीं मिलता.
कभी-कभी किताब को चर्चित करवाने के लिए कुछ ऐसी बातें लिख दी जाती हैं कि कोई उनसे मुंह नहीं मोड़ पाता, भले ही किताब का स्तर कैसा भी हो. प्रायः अच्छी किताबें बंद कमरों की तरह मौन रहती हैं. यूं सामान्यीकरण किसी बात का नहीं किया जा सकता. सोशल मीडिया इन्वेस्टमेंट की तरह काम करता है, रिटर्न मिलने की अपनी शर्तें होती हैं.
सोशल मीडिया के ज़रिये पाठक लेखक के निकट आ गए हैं. एक लेखक का दूसरे लेखक से राब्ता करना भी आसान हो गया है. लेखकों के सामाजिक दायरे में विस्तार स्वाभाविक है. भांति-भांति के मनुष्य लेखक से संपर्क करते हैं. जब किताब प्रकाशित होती है अथवा किसी पत्रिका में कहानी छपती है, ख़ासकर किसी नए लेखक की तो फोन का, प्रतिक्रियाओं का दौर आरंभ होता है. ये प्रतिक्रियाएं वास्तविक भी होती हैं और जाली भी. इनके पीछे छिपे हुए प्रयोजन हो सकते हैं, नहीं भी हो सकते.
नए लेखक के अनुभव
जब कोई बाहरी व्यक्ति इस संसार के भीतर पहला कदम रखता है, तब वह अनेक नए अनुभवों से गुज़रता है. ‘बेबी स्टेप्स’ लेते हुए लेखक को ऐसे तजुर्बे होते हैं जिनके बारे में मालूम तक नहीं होता कि उनका अस्तित्व भी है. समय के साथ नए लेखकों को लोगों के इरादों का भान होने लगता है, वे इस दुनिया को सीखने-समझने लगते हैं, पर आरंभ में किसी न किसी लपेटे में वे आ ही जाते हैं.
मैंने भी कुछ किताबें लिखी हैं. जब पहली किताब आई थी तो आस-पास के लोगों के मन में उत्सुकता थी कि देखें तो इसने लिखा क्या है. रफ़ा-दफ़ा करने की उतावली अधिक थी लेकिन फिर भी बहुत लोग किताब मंगवाते, पढ़कर पोस्ट लगाते, फोन करते. एक लेखक महोदय हर कहानी पर, हर्फ़-हर्फ़ कहानी को खोलने वाली लंबी प्रतिक्रिया भेजते, किंतु इनबॉक्स में.
मेरे लिए यह सब नया था इसलिए समझ नहीं पाई कि वे इनबॉक्स क्यों कर रहे हैं, बाक़ी लोगों की तरह पोस्ट क्यों नहीं लगा रहे? मुझे लगा शायद वे भी मेरी तरह अंतर्मुखी होंगे, इसीलिए सार्वजनिक तौर पर अपनी राय प्रकट न कर, सीधे लेखक को अपनी राय से अवगत करवाना चाहते होंगे. कहानियां उन्हें पसंद आई थीं यह पढ़कर मैं ख़ुश थी और अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए उनकी प्रतिक्रिया पर धन्यवाद कह देती.
बाद में देखा दूसरे लेखकों की किताबों पर वे निरंतर पोस्ट करते हैं. उस समय मुझे मालूम नहीं था कि वरिष्ठ लेखक यूं ही अपनी वॉल पर किसी नवोदित लेखक को जगह नहीं देते, जब तक लेखक का उनसे प्रगाढ़ परिचय न हो. अगर वे अपनी प्रतिक्रिया इनबॉक्स में भेजते हैं तो उनसे इजाज़त लेकर और हृदय तल से आभार प्रकट करते हुए, उसे अपनी फेसबुक वॉल पर शाया किया जाता है. यह एक प्रकार का सिम्बियोटिक संबंध है जिसमें वरिष्ठ और नवोदित दोनों लेखकों को लाभ होता है.
नए लेखक का लाभ तो प्रकट है, वरिष्ठ लेखक को विज़िबिलिटी मिलती है, नए लेखक से गुरु-शिष्य का अदृश्य संबंध स्थापित होता है जिसके फ़ायदे दीर्घकालिक होते हैं. यह बाद में एक मित्र ने बताया था और देखते-सुनते मैं भी समझने लगी थी. ख़ैर, 3-4 प्रतिक्रियाओं के बाद जब मेरी ओर से अपेक्षित प्रतिक्रिया उन्हें नहीं मिली तब यह मामला थम गया. उस बात को इतने वर्ष बीते, दोबारा कभी किसी कहानी पर उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिली. क्या ‘गहरी’ कहानियां लिखने वाली ‘प्रिय’ लेखिका को पढ़ना उन्होंने छोड़ दिया होगा?
बेशर्मी का चोला!
मेरी दो-तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी थीं पर इतने भर से होशियारी आ जाए तो बात ही क्या है! मौसम-ए-बहार था. एक दिलकश दिन के तीसरे पहर किसी व्यक्ति ने फोन किया. उन्होंने मेरी किताब की इतनी प्रशंसा की कि स्वयं पर संशय करने वाली मैं भी क्षण भर के लिए मुतमइन हो गई कि मैंने सचमुच कुछ कालजयी रच दिया है. घंटा-आध-घंटा मैं उनके स्वर में अपनी किताब की पंक्तियां सुनती रही, वे पंक्तियां जिन्हें उन्होंने रेखांकित किया था और सुनती रही उन पंक्तियों की मीमांसा.
किताब की सुंदर तस्वीर के साथ मिला उनका संदेश मुझे और भी प्रिय लगा. मैं मन ही मन प्रसन्न कि किताब की आरंभिक प्रतिक्रियाएं सकारात्मक मिल रही हैं. इस बार प्रकाशक ने अनुरोध किया था कि कुछ रोज़ ‘एफर्ट’ लिया जाए. किताब लिखी है तो पाठकों तक पहुंचे भी. लेखक-प्रकाशक दोनों को यत्न करने पड़ते हैं. अभी तक अपने लिखे को लेकर मैं संकोच से भरी रहती थी, लेखक होने को पूरी तरह ‘क्लेम’ करना भी नहीं सीख सकी थी. प्रकाशक के कहने पर सोचा कि क्यों न ‘कम्फर्ट ज़ोन’ से बाहर निकला जाए. और लोगों को ऐसा करते देखा था, हानि कुछ लगी नहीं. सो, उन महोदय से पूछा कि क्या उनका संदेश फेसबुक पर उनके नाम सहित साझा कर सकती हूं?
इस तरह का प्रश्न पहली ही बार किसी से पूछा था तो हिचकिचाहट भी थी किंतु उन्होंने तुरंत हां’ कह दिया. उनकी भेजी हुई तस्वीर और संदेश फेसबुक पर लगाकर उन्हें टैग किया और उन्हें शुक्रिया कह दिया. कुछ देर बाद देखा तो वे फेसबुक से डीएक्टिवेट हो चुके थे.
कारण मैं समझ गई थी कि वे न तो मुझसे टैग हटाने को कह पा रहे थे थे न टैग रहने देना चाहते थे. वजहें कई हो सकती थीं. अमूमन ऐसे मामलों में किसी करीबी को आपत्ति होती है. पर मैंने इसकी छानबीन में वक़्त ज़ाया करना उचित नहीं समझा.
बेशर्मी का चोला जो पहली बार ओढ़ा सो अब उतारा नहीं जा सकता था. मनुष्योचित प्रवृत्तियों से लेखक बेचारे परे नहीं होते. बाज़ार का दबाव, पीयर प्रेशर कभी उन पर भी हावी हो जाता है. इसी चक्कर में वे कुछ ऐसा कर गुज़रते हैं जो आम तौर पर नहीं करते. भूल सुधारने का अर्थ भूल न दोहराना होता है. मैंने आंखें बंद कर लीं और तय किया इसके बाद कभी किसी से ऐसा प्रश्न नहीं करूंगी. मन में एक विचार ज़रूर कौंधा था कि अगर आपत्ति थी तो पहले ही ‘न’ कह दिया होता. मैं क्या जबरन पोस्ट डालती? दो-एक दिन बाद जब वे फेसबुक पर लौटे, तो देखा टैग हटा चुके थे.
भरा महीना था. छींटे पड़ रहे थे. मैं बालकनी में बैठी एक किताब पढ़ रही थी कि फोन बजना शुरू हुआ. ‘मगरिबी अंधेरे’ ‘नया ज्ञानोदय’ में प्रकाशित हुई ही थी और रोज़ दो-चार कॉल आ रहे थे. कुछ लेखक संभवतः ऐसे कॉल्स से ऊब जाते होंगे पर मुझे उन दिनों अच्छा लगता था. प्रतिक्रिया पाने का एकमात्र और सबसे आर्गेनिक ज़रिया मेरे लिए यही होता था. कोई चाहे लोभ कहे या कुछ और समझे, पर लेखक के लिए प्रतिक्रिया आवश्यक है. अपरिचित नंबर देखकर मैं समझ जाती कि कहानी को लेकर ही कोई फोन होगा.
मैंने वह फोन उठाया तो देश के सुदूर कोने से वृद्ध व्यक्ति बोल रहे थे. जैसी कि रवायत है उन्होंने अपना परिचय दिया, अपना लेखन परिचय भी. वे मलयालम में लिखते थे और उनके बताए अनुसार प्रसिद्ध थे. कहानी को लेकर उन्होंने दो-एक बातें कीं, मेरी प्रकाशित किताबों की बाबत पूछा और फोन रख दिया. कुछ दिनों बाद उनका फोन दोबारा आया. कहा कि वे मेरी कहानी का अनुवाद करना चाहते हैं, अनुमति मांग रहे थे. इस तरह कुल जमा दो-चार बार उनके फोन आए.
पहले अप्रत्यक्ष रूप से, फिर प्रत्यक्ष रूप से, फिर विवशता ज़ाहिर करते हुए वे चाहते रहे कि मैं अपनी किताब उन्हें भेज दूं. मेरे क्षेत्र में उन्होंने कोई पहचान भी निकाल ली थी. बार-बार एक महिला का नाम लेकर कहते कि मैं उससे उनके बारे में बात कर सकती हूं. थककर एक दिन मैंने उन्हें किताब भेज दी. कई वर्ष बीते, तब से आज तक वे लापता हैं.
मुफ्त किताब पाने के बाद की चुप्पी
ऐसा ही एक अनुभव और भी है. कोविड के शुरुआती दिन थे. ‘सगबग मन’ हाल ही में प्रकाशित हुई थी. एक व्यक्ति ने धड़ाधड़ फोन किए और हर बार कहा वे उस किताब पर लिखना चाहते हैं. हर कॉल पर किताब भेजने का आग्रह भी करते. पहला संस्करण ख़त्म हो चुका था. ऑनलाइन डिलीवरी के लिए किताब उपलब्ध नहीं थी. मेरे पास भी किताब की प्रतियां नहीं थीं. अतः मैंने कहा कि जब किताब उपलब्ध होगी तब भेज दूंगी किंतु वे निरंतर आग्रह करते रहे. आग्रह भी ऐसा वज़नदार कि प्रतीत होता अगर वे इस किताब पर न लिख पाए तो उनका संसार उलट जाएगा.
कई दिन बीते, उनका फोन आना बंद नहीं हुआ. मैं उन दिनों अलवर वाले घर में थी. मां के पास किताब की पहली प्रति रखी थी. दिन-रात के कॉल और मेरी उलझन देखकर उन्होंने उदार मन से वह प्रति, पापा से कहकर, उस व्यक्ति के पते पर कुरियर करवा दी थी. यह दीगर बात है कि किताब पर न कोई लेख आना था, न आया. हां, फोन ज़रूर बंद हो गए और मैंने सुख की सांस ली. इस बात का दुख मुझे अवश्य हुआ कि मां की प्रति, उस प्रति के लिए अनुपयुक्त किसी व्यक्ति के पास चली गई थी.
कार्यक्रम की चाह, ज़िम्मेदारी से न
एक वाक़या और याद आता है. पहली किताब के प्रकाशित होने के बाद एक लेखक ने फोन करके कहा उन्हें मेरी किताब बहुत अच्छी लगी और बाद इसके हर कहानी की प्रशंसा में पुल बांध दिए. कुछ देर बाद बोले कि वे किताब पर कोई कार्यक्रम करना चाहते हैं. मैं कार्यक्रम को लेकर उत्साहित नहीं थी. मुझे इसमें राई बराबर दिलचस्पी भी नहीं थी. किंतु उन्होंने इतना ज़ोर दिया कि कोई तीसरा व्यक्ति सुनता तो लगता कि अगर किताब पर कार्यक्रम नहीं हुआ तो संसार एक ऊंचे दर्जे के कलाकार को जानने से वंचित रह जाएगा. एक बार नहीं, कई बार कहा. मैंने आजिज़ आकर कह दिया कि कर लीजिए.
यह कार्यक्रम उन्हीं की संस्था के अंतर्गत होना था. अगले ही क्षण वे दिल्ली से जयपुर आने वालों की गिनती करने लगे. मैं चुपचाप सुनती रही. जब उन्हें लगा कि मैं बात को पकड़ नहीं पा रही हूं तब उन्होंने सीधे कहा कि जितने लोग आएंगे उनके ठहरने का, खाने-पीने का, घुमाने-फिराने का इंतज़ाम करना होगा. हॉल अलग से बुक करवाना होगा. फिर मुख्य अतिथि तथा बाक़ी अतिथियों को सम्मानित भी करना होगा. अब मैं चौंकी.
यह सब भला मैं क्यों करूं? न मैं किसी को जानती थी न मुझे कार्यक्रम करवाना था. ‘बाद में बात करती हूं’, कहकर मैंने फोन रख दिया था. उनका फोन मैंने दोबारा कभी नहीं उठाया.
मेहमान बुलाकर मेज़बान नदारद
एक वाक़या जैसलमेर का हुआ ठहरा. किसी साहित्यिक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था. कई साहित्यकारों को न्योता गया. उन्हीं के साथ अदना-सा नाम मेरा भी था. मेरे जन्मदिन का महीना था. जैसलमेर जाना बहुत समय से मेरी विशलिस्ट में था. मैंने हां कह दिया कि इसी बहाने रेत के टीलों के पार खिले चांद को देखूंगी. मैं परिवार सहित जैसलमेर जा पहुंची.
एक दिन कार्यक्रम में हाज़िर रहकर आगे की यात्रा पर निकलना था. आयोजकों द्वारा दिए गए पते पर पहुंचे तो मालूम हुआ कि हमारे मेज़बान न केवल अनुपस्थित थे बल्कि फोन भी नहीं उठा रहे थे. होटल वाले भी परेशान थे. इतने लोगों के लिए उन्होंने व्यवस्था की हुई थी- खाने की, ठहरने की. पूरा होटल बुक किया गया था और एडवांस के नाम पर एक धेला नहीं मिला था. जो भी अतिथि आता, वे उस से पूछताछ करते कि कहीं से कोई जानकारी हाथ आ लगे. हम घंटों तक बैठे रहे. होटल वाले आगे की सूचना बाबत बार-बार मेरे पास आते रहे पर मुझे मालूम क्या था जो बताती.
मैंने भी आयोजकों को फोन करने की कोशिश की पर फोन नहीं लगा. शाम तक हम सब प्रतीक्षा करते रहे. अंत में यह मालूम पड़ा कि वे कुछ घपला करके भाग गए हैं और कार्यक्रम नहीं होगा. अगले रोज़ हमने अपने ठहरने का बिल अदा किया और आगे की यात्रा पर निकल गए.
क्रोध आया कि नहीं, अब कह नहीं सकती क्योंकि मैं जैसलमेर घूमने में व्यस्त थी और प्रसन्न थी. ये वही दिन थे जब मेरी पहली किताब फ्रेंच में अनूदित हो सकने वाली किताबों में नामांकित हुई थी.
बाद में आयोजकों में से एक का फोन आया था. बेहद रूखे स्वर में, बग़ैर कोई स्पष्टीकरण दिए उन्होंने कहा था कि एक व्यक्ति के आने-जाने और एक रोज़ रहने-ठहरने का बिल उन्हें बता दूं, वे चुकता कर देंगे. उतने ही रूखे स्वर में मैंने कहा मेरा एक दिन व्यर्थ हुआ, उसका हिसाब वे चुकता नहीं कर पाएंगे.
कहानी को लेकर बनी कहानी
लेखक होने के आरंभिक दिन थे. उन दिनों पत्रिकाओं में प्रकाशित होना क़तई आसान नहीं था. हम मित्रों ने पत्रिकाओं की एक सूची बनाई थी. कुछ पच्चीस-पचास पत्रिकाएं होंगी. हम कहानियां लिखते और उन पत्रिकाओं को भेजते. अधिकांश जगहों से कोई उत्तर नहीं आता. कहीं से महीनों बाद उत्तर मिलता…अधिकतर अस्वीकृति का, कभी-कभार स्वीकृति का. स्वीकृति मिलने के बाद भी कहानी छपने में साल-छह महीने लग जाते. कभी ऐसा चमत्कार होता कि एक ही कहानी एक से ज़्यादा पत्रिकाओं में स्वीकृत हो जाती तो जहां से पहले सूचना मिलती वहां हामी भरकर बाक़ी जगह एक मेल डाल दिया जाता कि कहानी प्रकाशित न करें, कहीं और स्वीकृत हो चुकी है.
एक बार हुआ यूं कि मेरी एक कहानी दो पत्रिकाओं में एक साथ, एक ही माह में प्रकाशित हो गई. यह क्यों और कैसे हुआ, इसकी पड़ताल किए बग़ैर, सीधे परिणाम की ओर चलते हैं. फिर भी जिन्हें उत्सुकता है उनके लिए बताए देती हूं कि समय पर सही सूचना न मिलने तथा संवाद में चूक के कारण कहानी दोनों पत्रिकाओं में प्रकाशित हो गई. हालांकि यह कोई अपराध नहीं था, पर पाठकों को यह अपराध लगा.
मेरे पास कई फोन आए. उनमें से कुछ फोन क्रोधित स्वर में, कुछ विस्मित औत्सुक्य से भरे कि कैसे मेरी कहानियां दो स्थानों पर प्रकाशित हो सकती है. कुछ जानना चाहते थे कि आख़िर यह मैंने किया कैसे, मानो मेरे पास अलादीन का चिराग़ हो जिससे मैं मनचाहा करवा सकती हूं. एक पाठक ने फोन करके कहानी को भला-बुरा कहते हुए सीधे पूछा कि औसत से नीचे की कहानी दो जगह प्रकाशित करवाने में मैं कामयाब कैसे हुई? प्रश्न पर प्रश्न, अपरिचित व्यक्तियों के. ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर देते-देते मैं थक चली थी, चित्त अस्थिर हो गया था, किंतु बात यहीं समाप्त नहीं हुई.
पत्रिकाओं के आगामी अंक में कहानी संबंधित पत्र प्रकाशित हुए. कहानी को पसंद-नापसंद करने के बीच वहां भी यही बात डोलती रही कि कहानी दो पत्रिकाओं में कैसे आ गई. इस बार मैं परेशान होने के बजाय हंस पड़ी कि कहानी तो छप चुकी थी. पाठक पढ़ भी चुके थे. मैं भला कैसे उसे अनहुआ करती. हां, एक ख़याल ज़रूर आया कि नए लेखकों को लेकर कितने पूर्वाग्रह होते हैं. उन्हें आसानी से स्वीकृति नहीं मिलती. अगर किसी वरिष्ठ लेखक की कहानी दो जगह प्रकाशित हो गई होती क्या तब भी इतना ही आश्चर्य प्रकट किया जाता?
स्त्रियों के प्रति रवैया
इन सब बातों के बीच जो बात मुझे हतप्रभ करती है वह है स्त्रियों के प्रति पढ़ने-लिखने वालों की सोच. अभी तक जो घटता आ रहा था वह मैंने उदारता से देखा, जिया. अनुभव संचित करती रही. कभी हैरान हुई, कभी हुलास से भरी. किंतु एक प्रसंग ऐसा है कि याद कर क्रोध आता है.
किसी पत्रिका में कहानी पढ़कर वृद्धावस्था की दहलीज़ पर खड़े एक पुरुष का फोन आया था. उसके बाद कहीं भी कुछ छपता, वे फोन करते. लेखन को लेकर बातें होतीं. एक दिन उनका कॉल, उनकी मानसिकता की परतें उधेड़ता चला गया. लेखन की बातों के मध्य, अपना मुखौटा हटा, गर्व से बता रहे थे कि वे इतने निर्दोष और पवित्र हैं कि एक ताज़ातरीन लेखिका को डिनर पर ले गए और केवल खाना खिलाकर छोड़ दिया.
मैं अचरज से भरी सोच रही थी कि क्या किसी स्त्री का पुरुष के साथ डिनर करने का दूसरा अर्थ भी होता है बल्कि उस पुरुष जैसे लोगों की दृष्टि में दूसरा ही अर्थ होता है. मैं उस लेखिका के बारे में सोच रही थी जो उस पुरुष से मैत्री भाव रखे होगी और वह पुरुष अपने पौरुष के दंभ में चूर उसके बारे में क्या-क्या कल्पनाएं करता होगा. यह बात मुझे बताने का औचित्य ही क्या था! फिर उन्होंने बातों का रुख़ अपनी ओर मोड़ दिया. वे कह रहे थे कि उनकी सभी कहानियों की नायिकाएं असल स्त्रियां हैं और वे जीवन में आने वाली लगभग हर स्त्री के प्रति आकर्षित हुए हैं. कुछ को आकर्षित करने में सफल भी रहे.
बात यहीं समाप्त नहीं हुई थी. आगे की बातों में वे समकालीन लेखिकाओं के प्रेम संबंधों की ओर संकेत कर रहे थे. मुझसे ये बातें क्यों? निहायत फूहड़ बातें. मैंने उनकी बातों पर विराम लगाया, फोन रखकर उनको ब्लॉक कर दिया. जो पुरुष अपने जीवन में आई स्त्रियों का सम्मान न कर सका, मित्र होने का शिष्टाचार न बरत सका, लेखक होने की गरिमा का वहन न कर सका उस से बात करने का क्या अर्थ!
इस बात ने मुझे बहुत क्लेश दिया था. जेंडर के दबाव से मुक्त होकर पुरुषों से संवाद करना आज भी स्त्रियों के लिए संभव नहीं. यह केवल एक मुग़ालता है और हमारा समाज इसके लिए प्रस्तुत नहीं.
बातें, क़िस्से यहीं समाप्त नहीं होते. कई लोगों से राब्ता हुआ. अजब-ग़ज़ब लगने वाली साधारण घटनाएं घटीं.
सामान्य लगने वालीं हैरतज़दा बातें हुईं. एक बात से कई बातें निकल आती हैं. तल्लीन होकर कोई काम करते हों तो रोज़ नई-नवेली बातें जन्म लेती हैं. जीवन है सुराख़ वाला पात्र, बातें हैं पानी. पात्र में जल भरते रहो, नीचे से रिसता जाएगा. ठहरेगा नहीं. कोई बात हम पर कैसा असर करती है, यह हम पर निर्भर करता है.
इन बातों ने ‘मोमेंट्स क्रिएट’ किए. ऐसे क्षण जो एक टैग के साथ रह गए, स्मृतियों को और गाढ़ा करते हुए. बहुत-सी छोटी-छोटी बातें चेतना में हैं. छपना शुरू किया उस दौरान की, उस से पहले की, बाद की. लोगों के संपर्क में आने की, जीवन में उनके प्रवेश और प्रस्थान की. इन्हीं बातों से आउटसाइडर एक रोज़ इनसाइडर बन जाते हैं- एक वरिष्ठ लेखक ने कहा था.
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आउटसाइडर सचमुच इनसाइडर बन पाते हैं? और क्या इनसाइडर बनना वाक़ई आवश्यक है?
(जानकीपुल से साभार)
