देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार द्वारा केंद्रीय चुनाव आयोग की मिलीभगत से चुनावों में जिस वोट चोरी के रास्ते जनादेश को अनुचित रूप से अपने पक्ष में कर लेने के विरुद्ध विपक्षी दलों को सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है, क्या वह तब भी संभव होती, जब केंद्र और राज्यों में अलग-अलग स्वतंत्र रूप से काम करने वाले चुनाव आयोग होते?
सवाल सुनकर चौंकिए नहीं. संविधान सभा में संविधान के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी तो उसके मसौदे के अनुच्छेद 289 में यह प्रावधान प्रस्तावित था कि केंद्र और राज्यों के ‘अलग-अलग और एक दूसरे से स्वतंत्र’ चुनाव आयोग हों.
इस प्रस्ताव के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यह था कि तब, चूंकि चुनावों के संचालन से जुड़ी शक्तियों का विकेंद्रीकरण हो जाएगा, केंद्रीय चुनाव आयोग की किसी भी तरह की मनमानी पर राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोगों की मनमानी पर केंद्रीय चुनाव आयोग अंकुश लगा दिया करेगा. इससे चुनावों की व्यवस्था और संचालन से जुड़ी कवायद में संतुलन बना रहेगा.
ऐसे में आज यह क्यों नहीं सोचा जा सकता कि उस स्थिति में केंद्रीय चुनाव आयोग के लिए किसी राज्य की मतदाता सूची में हेर-फेर या वोट चोरी का कोई अवसर नहीं रह जाता और अपनी शक्तियों का अतिक्रमण करके वह ऐसा कोई ‘अवसर’ उत्पन्न करने की कोशिश करता भी, तो आसानी से कठघरे में खड़ा कर दिया जाता.
प्रश्न स्वाभाविक है कि संविधान सभा में इस प्रावधान के प्रस्ताव पर पूरी सहमति क्यों नहीं बन पाई और क्यों, जैसा कि सभा के सदस्य पं. हृदयनाथ कुंजरू ने 16 जून, 1949 को उसकी बैठक में कहा था, बहुत-सी राजनीतिक शक्तियां राष्ट्रपति के हाथ में छोड़कर (भी) मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों और अफसरों की नियुक्ति में केंद्र सरकार द्वारा राजनीतिक प्रभाव की गुंजाइश छोड़ दी गई.
ज्ञातव्य है कि पं. कुंजरू ने इस व्यवस्था को लेकर जो अंदेशा जताया था, आज वह पूर्ण रूपेण सही सिद्ध होता दिख रहा है. उन्होंने कहा था कि ऐसे में राष्ट्रपति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त को प्रधानमंत्री की मंत्रणा पर नियुक्त करना होगा और प्रधानमंत्री किसी दलीय व्यक्ति की नियुक्ति का सुझाव रखे तो राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री द्वारा नाम निर्देशित व्यक्ति को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई उपाय न रहेगा. चाहे वह व्यक्ति सार्वजनिक कारणों से उस पद के दायित्व निर्वहन के लिए कितना भी अनुपयुक्त हो.
वरिष्ठ राजनीति विज्ञानी और संविधान के गंभीर अध्येता डॉ. रामबहादुर वर्मा बताते हैं कि संविधान सभा में इस बात को लेकर गहरे मतभेद थे कि संघ की संसद एवं राज्यों की विधान सभाओं/विधानमंडलों के चुनाव कैसे कराए जाएं? चुनाव संबंधी समस्त कार्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त चुनाव आयोग द्वारा कराये जाएं अथवा संसद के चुनाव के लिए अलग और विधानसभाओं/विधानमंडलों के चुनाव के लिए अलग चुनाव आयोग हो. जहां कई सदस्य इस मत के थे कि संपूर्ण देश में चुनाव के लिए एक ही चुनाव आयोग हो, वहीं कई सदस्य राज्यों के लिए ऐसे पृथक चुनाव आयोग के पक्षधर थे, जो केंद्रीय चुनाव आयोग से सर्वथा स्वतंत्र रहकर कार्य करे.
गौरतलब है कि संविधान सभा द्वारा नियुक्त संघ विधान समिति (जिसके सभापति जवाहरलाल नेहरू थे) ने 4 जुलाई, 1947 को संविधान सभा के अध्यक्ष को अपनी जो रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, उसके अध्याय 4 खंड 24 में कहा गया था कि इस संविधान के अंतर्गत होने वाले सभी चुनावों, चाहे वे संघ संबंधी हों या प्रांतीय, निरीक्षण संचालन व नियंत्रण का अधिकार तथा इन चुनावों के संबंधों में उठने वाले झगड़ों व संदेहों पर निर्णय देने के लिए चुनाव ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त आयोग को प्राप्त होगा.
29 जुलाई, 1947 को एन. गोपालास्वामी आयंगर ने संविधान सभा में इसे पेश किया तो उससे असहमत सदस्य एचवी पातस्कर ने उसमें एक संशोधन पेश किया. यह कि उसमें ‘चाहे वे संघ संबंधी हों या प्रांतीय’ के बजाय ‘संघ संबंधी सभी चुनावों’ कर दिया जाए और प्रांतीय चुनावों के लिए अलग व्यवस्था की जाए.
इस संशोधन के पक्ष में उनका कहना था कि अब (यानी तब) तक प्रांतीय चुनावों के निर्देशन व निरीक्षण पर नियंत्रण का काम प्रांतों के गवर्नर देखते रहे हैं. इसलिए यह अधिकार प्रांतों के पास ही रहने दिया जाना बेहतर होगा.
सभा के दो अन्य सदस्यों टी. प्रकाशम् और नजीरुद्दीन अहमद ने भी उनके संशोधन का समर्थन किया था, जिसके बाद संविधान सभा ने उसको स्वीकार कर लिया और संघीय (केंद्रीय) चुनावों के निरीक्षण, निर्देश व नियंत्रण का अधिकार एक आयोग को दिया, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी.
अनंतर, संविधान की डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता वाली मसौदा समिति (ड्राफ्ट कमेटी) के बनाए मसौदे के अनुच्छेद 289 में यह प्रावधान प्रस्तावित किया गया कि केंद्रीय विधान मंडल के उच्च और निम्न सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) के निर्वाचन के लिए एक आयोग होगा, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा. इसी तरह प्रत्येक प्रांत/राज्य के लिए पृथक निर्वाचन आयोग होगा, जिसे राज्यपाल अथवा राज प्रमुख नियुक्त करेंगे.
पर डॉ. वर्मा बताते हैं कि जानें क्यों, डॉ. आंबेडकर ने 15 जून,1949 को संविधान सभा में इस अनुच्छेद को पेश किया तो उसमें आधारभूत परिवर्तन करके स्थिति को पूरी तरह बदल दिया. उन्होंने व्यवस्था कर दी कि देश में एक ही केंद्रीय चुनाव आयोग होगा और राज्यों में नियुक्त प्रादेशिक आयुक्त उसकी सहायता करेंगे. ये आयुक्त प्रांतीय सरकार के अधीन नहीं, बल्कि केंद्रीय चुनाव आयोग के नियंत्रण में ही काम करेंगे.
इस व्यवस्था को लेकर डॉ. आंबेडकर का अपना अलग ही नजरिया था. उसे व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि प्रांतों में सरकारें इस प्रकार के प्रबंध कर रही हैं कि उन लोगों को, जिनका मूल वंश, भाषा और संस्कृति उस प्रदेश के निवासियों से भिन्न है, मतदाता सूचियों में स्थान नहीं दिया जा रहा है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘यदि किसी वयस्क मतदाता का नाम स्थानीय सरकार के विद्वेष के कारण अथवा किसी पदाधिकारी की सनक के कारण मतदाता सूची में नहीं रहता तो जनतंत्रात्मक सरकार के मूल आधार पर ही आघात होगा. इसलिए अनुच्छेद 289 में परिवर्तन कर दिया गया है.’
इसके बाद कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, आरके सिंघल, नजीरुद्दीन अहमद और प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना जैसे सदस्यों ने उनके प्रस्ताव का समर्थन कर दिया.
इनमें प्रो. सक्सेना ने प्रस्ताव में यह प्रावधान जोड़ने पर भी जोर दिया कि राष्ट्रपति द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य आयुक्तों की नियुक्ति का संसद के दोनों सदनों के दो तिहाई बहुमत से अनुमोदन जरूरी होना चाहिए, जिससे केंद्र में सत्तारूढ़ दल मनमाने ढंग से अपने ही विश्वासपात्र को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त न कर सके.
लेकिन एचबी पातस्कर व कुलधर चालिहा ने इसका तीव्र विरोध किया. इनमें पातस्कर ने कहा कि यदि राष्ट्रपति केंद्र के लिए एक आयोग स्थापित कर सकता है तो विभिन्न प्रांतों के लिए निर्वाचन आयुक्तों की भी नियुक्ति क्यों नहीं कर सकता?
उन्होंने कहा कि सच यह है कि इस तरह हम संघीय शासन के विचार का परित्याग कर रहे और सारी शक्तियां केंद्र सरकार को दे दें रहे हैं, जबकि यदि प्रांतीय सरकारें गलत करती हैं तो उसको ठीक किया जा सकता है.
इसी तरह कुलधर चालिहा ने भी, जो असम से निर्वाचित होकर सभा में आए थे, कहा कि ‘यदि आपको प्रांतों पर संदेह हैं और केंद्र के लिए अधिक शक्ति रखना चाहते हैं, तो इसके परिणाम अवांछनीय होंगे. आप अपने ही लोगों को पक्षपाती, अन्यायी और बेईमान कहकर नीचा क्यों दिखाना चाहते हैं?’
इसी क्रम में उन्होंने यह कहने से भी संकोच नहीं किया कि यदि हम अपने ही लोगों पर विश्वास नहीं कर सकते तो हम स्वाधीनता के योग्य ही नहीं हैं. साथ ही आरोप लगाया कि प्रांतों के साथ अन्याय और उन पर व्यर्थ संदेह किया जा रहा है.
उन्होंने सभा के सदस्यों पर तंज भी किया कि ‘आप समझते हैं कि आपमें प्रांतों के लोगों से अधिक गुण हैं, पर मुझे पता है, वहां बहुत से ऐसे लोग हैं जो आप से अच्छे हैं. यदि आप अपने ही लोगों की ईमानदारी पर विश्वास नहीं कर सकते तो आप लोकतंत्र को सफल नहीं बना सकते.’
विडम्बना यह कि इसके बावजूद वे डॉ. आंबेडकर को कायल नहीं कर पाये और एक ही केंद्रीय चुनाव आयोग की व्यवस्था का प्रावधान संविधान में बना रह गया.
डॉ. रामबहादुर वर्मा इसे संविधान सभा की भूल की संज्ञा देते और कहते हैं कि आज की तारीख में उसकी यह भूल देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था के रास्ते का शूल बन गई है. उनकी मानें तो इसी कारण आज केंद्रीय चुनाव आयोग निर्लज्जतापूर्वक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के इशारे पर काम और सत्तारूढ़ भाजपा के चुनावी लाभ के लिए ढीठ चोर जैसा बर्ताव कर रहा है.
उसके विरुद्ध मतदाता सूचियां बनाने में गड़बड़ी की ही नहीं, मतदान एवं मतगणना में पक्षपात बरतने की भी शिकायतें हैं. उसके पक्षपात के चलते चुनाव प्रक्रिया में प्रचार के अवसर पर उसके द्वारा लागू की गई आदर्श आचार संहिता की सारी बंदिशें महज विपक्षी दलों पर लागू होती हैं और भाजपा उसको कोई अंकुश नहीं मानती.
ऐसे में पं. हृदयनाथ कुंजरू द्वारा 16 जून, 1949 को संविधान सभा में कही गई बात याद आती है:
प्रांतों की राजनीतिक शक्ति कम करना ठीक हो सकता है, पर इससे केंद्रीय सरकार का राजनीतिक पक्षपात उन सब जगहों पर प्रभावी हो जाएगा, जहां अन्यथा प्रांतीय सरकारों का राजनीतिक पक्षपात प्रभावी होता.
उनके कहने का आशय यह था कि प्रांतीय सरकारें राजनीतिक पक्षपात पर उतरें तो उनके कस-बल ढीले करके सही राह पर लाया जा सकता है, लेकिन केंद्र सरकार के पक्षपात से निपटना उतना आसान नहीं होगा.
डॉ. वर्मा पूछते हैं कि क्या संविधान निर्माताओं को इसका जरा-सा भी अंदेशा नहीं था कि संविधान लागू होने के सात दशक बाद ही ऐसा दिन आ जाएगा, जब चुनाव आयोग केंद्र में सत्तारूढ़ दल के एजेंट के रूप में काम करने लगेगा? अगर था तो उन्होंने यह पहाड़-सी भूल क्योंकर हो जाने दी?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
