अवध दरबार के वे शायर, जो न ग़ालिब को सटियाते थे न ही नवाब साहब को!

अवध में उर्दू शायरी के लखनऊ स्कूल की 18वीं शताब्दी के अंत से 19वीं शताब्दी के आरंभ तक की बुलंदी किसी से छिपी नहीं है. मगर जब यह स्कूल आसमान चूम रहा था, तब भी उसमें सब हरा-हरा ही नहीं था. उस दौर में अवध दरबार में उर्दू शायरी की अनेक नामी शख़्सियत की परवरिश जरूर हुई, लेकिन ‘शेखचिल्ली’ भी कुछ कम नहीं थे.

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अवध दरबार में उर्दू शायरी की अनेक नामी शख्सियतों की परवरिश जरूर हुई, लेकिन ‘शेखचिल्ली’ भी कुछ कम नहीं पले-बढ़े. (पेंटिंग: Gates of the Palace at Lucknow by W. Daniell, 1801)

अवध में उर्दू शायरी के लखनऊ स्कूल की 18वीं शताब्दी के अंत से 19वीं शताब्दी के आरंभ तक की बुलंदी किसी से छिपी नहीं है. उसके उरूज़ के इस दौर में दिल्ली के मुगल बादशाहों की हुकूमत की हालत खस्ता होने की ओर बढ़ चली थी और उसके आश्रय में पल रहे अनेक दरबारी शायर अवध के नवाबों (जिनका सूरज उन दिनों कुछ ज्यादा ही चमकने लगा था) की सरपरस्ती में अपना भविष्य तलाशना बेहतर समझ रहे थे.

इसी तलाश के क्रम में मकबूल शायर शेख़ इमाम बख़्श नासिख़ ने उर्दू शायरी के दिल्ली स्कूल के बरक्स लखनऊ स्कूल की नींव रखी तो उसने अपनी अलग पहचान बनाने में देरी नहीं की. यह और बात है कि शुरू में इस स्कूल में भी दिल्ली से आए शायरों का ही वर्चस्व रहा और इसके वसंत की उम्र भी बहुत लंबी नहीं हो पाई.

कुछ ही दशक बीते थे कि मुगलों की ही तरह ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों इन नवाबों के इकबाल का भी खात्मा शुरू हो गया. साथ ही लखनऊ स्कूल का आसमान की ऊंचाइयां चूमने का वक्त भी जाता रहा. लेकिन जब यह स्कूल आसमान चूम रहा था, तब भी ऐसा नहीं कि उसमें सब हरा-हरा ही रहा हो. जानकार बताते हैं कि उस दौर में अवध दरबार में उर्दू शायरी की अनेक नामी शख्सियतों की परवरिश जरूर हुई, लेकिन ‘शेखचिल्ली’ भी कुछ कम नहीं पले-बढ़े.

उस दौर के दो शायरों मिर्ज़ा मोहम्मद हसन कतील और मिर्ज़ा यास यगाना चंगेजी अजीमाबादी को तो उनकी शायरी से ज्यादा शेखचिल्लीपने के लिए ही जाना जाता है.

इनमें मिर्ज़ा यास पटना से लखनऊ तशरीफ़ लाए थे और उन पर लखनऊ का रंग कुछ ऐसा चढ़ गया था कि वे ‘अजीमाबादी’ से ‘लखनवी’ हो गए थे. अपने शेखचिल्लीपने में उन्होंने ‘यास, यगाना और चंगेजी’ के घालमेल से अपने कई और उपनाम भी बना डाले थे.

लखनऊ स्कूल में वे मिर्ज़ा मोहम्मद हसन क़तील से थोड़े ही आगे-पीछे सक्रिय हुए थे और इन दोनों में शेखचिल्लीपने के लिहाज से, कहना मुश्किल था कि, कौन छोटा है और कौन बड़ा.

मिर्ज़ा कतील तो कहते हैं कि ‘बू-ए-कबाब’ के लिए ही अपना धर्म बदलकर मुसलमान हो गए थे. यों, वे दिल्ली के एक पंजाबी खत्री परिवार में पैदा हुए थे. उन्होंने लिखा भी है- ‘बू-ए-कबाब मरा मुसलमान कर्द’ (कबाब की खुशबू ने मुझे मुसलमान बना दिया.)

उनके संदर्भ में शेखचिल्लीपने की हद यह थी कि उनके ‘लगुए-भगुए’ (चाटुकार) उन्हें मिर्ज़ा गालिब के मानिंद और कई मायनों में उनसे भी बड़ा शायर मानते थे. एक समय उनकी कृति ‘हफ्त तमाशा’ भी उन्हें शोहरत के केंद्र में ले आई थी.

लेकिन इस शोहरत की उम्र ज्यादा लंबी नहीं हो पाई और बाद के वर्षों में लखनऊ में फारसी के प्रचार-प्रसार में जी-जान लगा देने के बावजूद वे उसके दिल में जगह नहीं बना पाए.

ग़ालिब का मजाक

मिर्ज़ा यगाना ‘यास’ के बारे में तो, उनके प्रशंसकों, कहना चाहिए, मुसाहिबों द्वारा कहा जाता था कि उसका कोई सानी ही नहीं था. लेकिन उनको नापसंद करने वालों के अनुसार वे मुंहफट भी थे और बेतहजीब भी.

उन्होंने अजीमाबाद (पटना) से लखनऊ आकर एक लखनवी युवती से निकाह क्या किया, खुद को सारे लखनऊ का दामाद मानने लगे थे. इतना ही नहीं, खुदा के बंदों को चिढ़ाने वाला यह शे’र अपनी जुबान पर रखे रहते थे- ‘बुतों को देखके सबने खुदा को पहचाना, खुदा के घर तो कोई बंदा-ए-खुदा न गया.’

मिर्ज़ा कतील की ही तरह उन्हें भी मिर्ज़ा गालिब को अच्छा तो दूर, बुरा शायर तस्लीम करना भी गवारा नहीं था. अदब की महफिलें सजतीं तो उनमें गालिब की रचनाओं की पैरोडियां सुनाकर वे उनका जमकर मजाक उड़ाते.

कई बार ऐसी महफिलों में बिना बुलाए भी पहुंच जाते. कोई कहता कि आपको तो बुलाया ही नहीं गया, तो उसे झिड़ककर कहते कि वह उनसे बदतमीजी कर लखनवी तहजीब के दामन पर दाग न लगाए. समझे कि एक तो वे लखनऊ के उस्ताद-ए-यगाना (इकलौते उस्ताद शायर) हैं, दूजे उसके दामाद भी.

एक बार किसी लखनवी ने उनके नियमित नमाज न पढ़ने को लेकर उनकी लानत-मलामत शुरू कर दी तो उन्होंने उससे यह पूछने से भी गुरेज नहीं किया- समझ में कुछ नहीं आता पढ़े जाने के क्या हासिल? नमाजों के हैं कुछ मानी तो परदेसी जुबां क्यों है?

जो लखनऊवासी उन्हें ठीक से जानते थे, उनकी ऐसी ‘बदतमीजियों’ को दिल पर न लेकर हंसकर टाल देते थे. लेकिन एक बार उन्होंने अति कर दी तो आजिज आकर शहर के चौक स्थित कोतवाली से गधे पर बैठाकर और कांटों का ताज पहनाकर उनका जुलूस निकाल दिया. इस बात का भी लिहाज नहीं किया कि वे हमेशा सिपाहियाना पोशाक में रहते थे और अपने बख्तरबंद में हमेशा एक तलवार खोंसे रहते थे.

एक और वक्त किसी बात को लेकर उनके और उनसे खफा लोगों के बीच मरने-मारने की नौबत आ गई तो एक शुभचिंतक ने उन्हें अपने बगीचे में छिपाकर उनकी जान बचाई.

वतन बनाम कर्बला

फिर तो जब भी बात बिगड़ती, वह बगीचा ही उनकी शरणस्थली बन जाता. इस सबके बावजूद उन्होंने ताउम्र लखनऊ छोड़ना गवारा नहीं किया. इसकी सलाह देने वाले शुभचिंतकों से कह दिया कि दरअस्ल, लखनऊ ही मुझे नहीं छोड़ना चाहता, मुट्ठी भर ‘गलीबची’ (मिर्ज़ा गालिब के प्रशंसक) ही मुझसे लखनऊ छुड़वाना चाहते हैं.

अलबत्ता, बाद में उन्हें भी महसूस होने लगा कि: वतन को छोड़कर जिस सरजमीं से दिल लगाया था, वही अब खून की प्यासी हुई है कर्बला होकर.

1956 में दो फरवरी को लंबी बीमारी के बाद उनका इंतकाल हुआ तो दफन के बाद कब्र पर लिखा गया- जमाजेबों पे कफन ने भी दिया वो जोबन, जिसने भी देखा कलेजे से लगाना चाहा!

एक बार फिर मिर्ज़ा मोहम्मद हसन कतील पर लौटें तो सूबे में उनकी शोहरत का सबब भी उनकी शायरी उतनी नहीं थी, जितनी उनकी कई अजीबोगरीब आदतें. पहले जिन आदतों का उल्लेख कर आए हैं, उनसे भी ज्यादा अजीबोगरीब आदतें.

इनमें से एक तो यह थी कि वे हरदम तुर्रम खां बने रहते और अपने आगे किसी को भी कुछ न समझते. कई बार तो नवाब को भी नहीं. दूसरी यह कि उन्हें अपने आसपास किसी का भी धूम्रपान करना कतई नाकाबिल-ए-बर्दाश्त होता. हुक्के की गुड़गुड़ तो उन्हें इतनी सख्त नापसंद थी कि वे उसे गुड़गुड़ाने वाले को अपने नजदीक फटकने तक न देते.

और तीसरी यह कि जहां अन्य शायर नवाब के दरबार में हाजिरी लगाने और उनकी आंखों में चढ़ने के मौके ताड़ते रहते थे, वे दरबार की ओर मुंह करना भी गवारा नहीं करते. कहते कि उन्हें नवाब के सिर पर सजी रहने वाली पगड़ी के पेंचोखम देखकर बहुत कोफ्त होती है, इसलिए अपने दौलतखाने पर ही अदीबों का मजमा लगाए रखता हूं और बहुत कम बाहर निकलता हूं.

कई बार तो ऐसा भी हुआ कि नवाब ने खुद मिर्ज़ा कतील को अपने महल या दरबार में देखने की ख्वाहिश जताई, जो मिर्ज़ा तक पहुंचाई भी गई. लेकिन उन्होंने उसे पूरी करना जरूरी नहीं समझा.

मिर्ज़ा के प्रशंसकों के अनुसार, इसका कारण यह था कि उनकी आजाद तबियत इसकी इजाजत नहीं देती थी.

सिड़ी दरबारियों और हुक्के से चिढ़

लेकिन आलोचकों की मानें तो दरबार से उनकी बेरुखी के पीछे यह था कि वहां कई ऐसे दरबारी शायरों का दबदबा था, जो सिड़ी समझकर उनको चिढ़ाया और मजाक उड़ाया करते थे. स्वाभाविक ही उन्हें अंदेशा सताता रहता था कि दरबार जाने पर एक तो दरबारी शायर नवाब के सामने ही उनकी ले-दे पर उतर आएंगे. दूसरे, उनको नाहक नवाब की बेतुक-ताल वाली शायरी झेलनी पड़ेगी. नवाब का ‘हुक्के का इश्क’ झेलना पड़ेगा, सो अलग.

दरअसल, नवाब सआदत अली खां द्वितीय महल में हों या दरबार में, हुक्का पिये बिना उन्हें पल भर भी चैन नहीं मिलता था. उसे पीने की बेताबी उनके सिर कुछ ऐसी चढ़ी थी कि उसकी चिलम में जलाने के लिए इमली के कोयलों की कमी न पड़ने पाए, इसके लिए उन्होंने अपनी कोठी से दिलकुशा तक इमली के पेड़ ही पेड़ लगवा डाले थे.

लेकिन एक दिन नवाब ने बाकायदा शाही फरमान भेजकर मिर्ज़ा को फौरन से पेश्तर अपनी कोठी फरहत बख्श में हाजिर होने का हुक्म दे दिया, जहां वे उन दिनों प्रायः हर रात जलवा अफरोज होते थे.

फिर तो बेचारे मिर्ज़ा के सामने विकट समस्या खड़ी हो गई. एकबारगी उन्हें समझ में आना ही बंद हो गया कि अब करें तो क्या करें? लाख तुर्रम खां थे, लेकिन हुक्मउदूली पर नवाब की नाराजगी के कहर का डर भी कुछ कम न था. कहीं वे चिढ़कर दर-ब-दर करने पर तुल जाते और उनसे लखनऊ ही छुड़ा देते तो?

इस डर से पार पाने के लिए मिर्ज़ा ने पहले तो अपनी हिम्मत व हौसले को जगाया, फिर साफगोई से काम लेते हुए शाही फरमान का बेलौस जवाब भिजवाया:

‘हुजूर, मुझे आपके दीदार के लिए आपकी कोठी में आने से कोई इनकार नहीं, मगर मुश्किल है कि वहां आपके पास वह तंबाकू का ज्वालामुखी जरूर होगा और आप जानते हैं कि मुआ हुक्का मेरी बर्दाश्त से बाहर की चीज है. दूसरे, आपके सिर पर जो पेंचदार पगड़ी रहती है, उसके पेंचोखम में मेरे दिलोदिमाग उलझकर रह जाएंगे और शे’र कहने की ताब ही खत्म हो जाएगी. तीसरे, जनाब हैं कि हर वक्त खुशामदियों व चमचों से घिरे रहते हैं और मुझे उन सबकी शक्ल से नफरत है. ऐसे में क्या यह मुमकिन हो सकता है कि हम ऐसी जगह पर और इस तरह मिल सकें कि हमारे दरम्यान ये तीनों मुसीबतें न आएं?’

झुक गए नवाब

कोई और नवाब होता तो जवाब पढ़कर भड़क उठता. यह सोचकर कि मिर्ज़ा की मजाल कि वह मुलाकात के लिए शर्तें लगाए! लेकिन शेर व सुखन के शौकीन सआदत अली खां द्वितीय ने उनकी तीनों शर्तें खुशी-खुशी मंजूर कर लीं और वे आए तो उन्हें मालामाल करके वापस भेजा. इसके बावजूद उन्हें नवाब का अहसानमंद होना गवारा नहीं हुआ.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)