नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार (12 सितंबर) को फ़िलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देने से जुड़ा प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया. कुल 193 सदस्य देशों में से 142 ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 10 देशों ने विरोध किया और 12 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया.
‘न्यूयॉर्क घोषणापत्र’ नामक इस प्रस्ताव को भारत, चीन, रूस, सऊदी अरब, क़तर, यूक्रेन, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस और जर्मनी समेत कई देशों का समर्थन प्राप्त हुआ. इसके विपरीत, अमेरिका और इज़रायल उन 10 देशों में शामिल रहे जिन्होंने विरोध में वोट डाला.
मतदान से ठीक पहले वेस्ट बैंक की अदुमीम बस्ती के दौरे पर पहुंचे इज़रायली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने साफ़ कहा था कि फिलिस्तीन को राष्ट्र का दर्जा कभी नहीं मिलेगा और यह इलाक़ा केवल इज़रायल का है.

‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’
संयुक्त राष्ट्र महासभा में फ्रांस और सऊदी अरब के सहयोग से पेश किए गए ‘न्यूयॉर्क प्रस्ताव’ को पारित किए जाने के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉ ने कहा कि 142 देशों का यह समर्थन मध्य पूर्व में स्थायी शांति की दिशा में एक अपरिवर्तनीय कदम है. उन्होंने कहा, ‘फ्रांस और सऊदी अरब की पहल पर आज न्यूयॉर्क घोषणा को अपनाया गया है, जो टू-स्टेट सॉल्यूशन (द्विराष्ट्र समाधान) को लागू करने का ठोस मार्ग प्रशस्त करता है.’
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉ ने जुलाई में फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता देने की घोषणा की थी. उन्होंने 24 जुलाई को एक्स पर लिखा था, ‘मध्य पूर्व में न्यायपूर्ण और स्थायी शांति के प्रति अपनी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता के तहत, मैंने फैसला लिया है कि फ्रांस फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देगा.’
उन्होंने कहा, ‘हमें हमास का विसैन्यीकरण (हथियारों से मुक्त करना) सुनिश्चित करना होगा, साथ ही गाज़ा को सुरक्षित बनाना और उसका पुनर्निर्माण भी करना होगा.’
राष्ट्रपति मैक्रॉ ने आगे लिखा था, ‘आज की सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि गाजा में युद्ध ख़त्म हो और नागरिकों को बचाया जाए. शांति संभव है. तत्काल युद्धविराम और सभी बंधकों की रिहाई हो. गाज़ा के लोगों को बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता की ज़रूरत है.’
फ्रांस ऐसा क़दम उठाने वाला यूरोपीय संघ का सबसे प्रभावशाली देश है. यूरोपीय संघ के स्वीडन, स्पेन, आयरलैंड और स्लोवेनिया जैसे सदस्य पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं. पोलैंड और हंगरी ने तो 80 के दशक में ही कम्युनिस्ट शासन के दौरान फिलिस्तीन को मान्यता दे दी थी.
संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 140 से ज़्यादा देश पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं. इनमें स्पेन और आयरलैंड सहित यूरोपीय संघ के कुछ देश भी शामिल हैं.
द्विराष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है भारत
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, ‘फिलिस्तीन के प्रति भारत की नीति दीर्घकालिक रही है और हमने हमेशा बातचीत के जरिए द्वि-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया है.’
विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा राज्यसभा में 13 दिसंबर, 2024 को दिए गए उत्तर में इस बात की पुष्टि की गई है कि फिलिस्तीन के प्रति भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, ‘भारत की फिलिस्तीन को लेकर नीति लंबे समय से एक जैसी रही है. इसमें बातचीत के ज़रिए द्वि-राष्ट्र समाधान का समर्थन शामिल है, जिसके तहत मान्यता प्राप्त और सुरक्षित सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और सशक्त फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना हो, जो इज़रायल के साथ शांति से रह सके. भारत फिलिस्तीन की संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता का भी समर्थन करता है.’
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में भारत ने 54 फिलिस्तीन समर्थक प्रस्तावों के पक्ष में मतदान किया है और केवल 8 प्रस्तावों पर मतदान के दौरान अनुपस्थित रहा है. हालांकि पिछले तीन सालों में कम से कम चार बार गाज़ा में युद्धविराम के आह्वान वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्तावों पर मतदान के दौरान भारत अनुपस्थित रहा है. ऐसा आखिरी बार 12 जून 2025 को हुआ था. इस अनुपस्थिति को लेकर भारत ने स्पष्ट किया था कि ऐसा ‘बातचीत की कमी और प्रस्ताव के टेक्स्ट में समग्र असंतुलन के कारण हुआ, लेकिन फिलिस्तीन के प्रति भारत की मूलभूत नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ।’
अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया, बताया ‘पब्लिसिटी स्टंट’
संयुक्त राज्य अमेरिका, जो गाज़ा युद्ध में इज़रायल का समर्थन कर रहा है, ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और इसे ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार दिया, जो उसके मुताबिक केवल हमास को फायदा पहुंचाता है.
अपने विरोध के फैसले को समझाते हुए, अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने कहा कि यूएन द्वारा न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन पर मतदान ‘भ्रामक’ है और यह उन राजनयिक प्रयासों को कमजोर करता है जिनका मकसद बंधकों को आज़ाद कराना और गाज़ा में मुश्किलों को खत्म करना है.
एक बयान में अमेरिकी मिशन ने कहा, ‘यूएन की कार्रवाई न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन पर एक और ग़लत और ग़लत समय पर किया गया पब्लिसिटी स्टंट है, जो गंभीर राजनयिक प्रयासों को कमजोर करता है जिनका उद्देश्य संघर्ष समाप्त करना है. इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि यह प्रस्ताव हमास के लिए एक तोहफ़ा है. यह निंदनीय है, साफ तौर पर घरेलू राजनीति से प्रेरित है, न कि किसी गंभीर विदेश नीति एजेंडे से.’
