क्या साठ बरसों से चला आ रहा माओवादियों का सशस्त्र संघर्ष अब समाप्ति की ओर है? क्या वे हथियार डाल रहे हैं?
प्रतिबंधित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय के नाम से जारी एक प्रेस बयान देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. 15 अगस्त की डेटलाइन से जारी यह बयान ‘अस्थाई तौर पर हथियारबंद संघर्ष को त्यागने’ और ‘हथियार डालने’ के उनके इरादे को अभिव्यक्ति देता है. यह बयान प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को ‘माननीय’ कहकर संबोधित करता है, और माओवादी आंदोलन से प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से शांति के प्रति अनुकूल रवैया अपनाने का आग्रह भी करता है.
माओवादी आंदोलन के इतिहास में यह बयान एक अभूतपूर्व दस्तावेज़ है जो उनके बदलते दृष्टिकोण की ओर संकेत देता है.
इससे पहले भी, इसी साल 2 अप्रैल को अभय के नाम से एक प्रेस बयान आया था जिसमें शांति वार्ता का ठोस प्रस्ताव था. हालांकि उसमें हथियार त्यागने के बारे में कुछ नहीं कहा गया था, लेकिन माओवादी शांति वार्ता के लिए तैयार दिखाई दे रहे थे.

इसके बाद 22 अप्रैल को माओवादी पार्टी के उत्तर-पश्चिम सबजोनल कमेटी के प्रवक्ता रूपेश ने ‘बस्तर टॉकीज़’ नाम के यूट्यूब चैनल को एक वीडियो इंटरव्यू दिया था जो कहता था सरकार संघर्ष विराम की घोषणा करे ताकि उन्हें बड़े नेताओं से सलाह-मशविरा करके कोई ठोस निर्णय लेने का मौका मिल सके.
बयानों का सिलसिला
इसके बाद अभय की ओर से 10 मई को एक और बयान आया, जिसमें हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आने के मुद्दे पर सरकार से बातचीत करने की इच्छा जताई गई. हालांकि उस बयान में भी शांति वार्ता की आवश्यकता पर ही जोर दिया गया और केंद्र सरकार से मांग की गई कि वह इसके लिए आगे आए.
गौरतलब है कि उस बयान में भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए माओवादियों ने सम्मानजनक शब्दों का उपयोग किया था. सरकारों को शोषक वर्गों का औजार मानने वाले माओवादी उनके प्रति अक्सर कठोर शब्दों का ही इस्तेमाल करते हैं. इस भाषा को लेकर कई लोगों ने उस बयान की सत्यता पर संदेह उठाया था.
अब, अभय के नाम से जो ताजा बयान सामने आया, इसने एक तरह से सबको चौंका दिया. इसमें न सिर्फ ‘हथियारबंद संघर्ष को अस्थाई तौर पर त्यागने’ की बात कही गई, बल्कि यह बात भी साफ तौर पर लिखी है कि ‘हम हथियार छोड़ने का निर्णय लिए हैं.’
देश भर में साठ बरस से चल रहे नक्सली आंदोलन के इतिहास में पहली बार ऐसा बयान आया है जिसमें उन्होंने हथियार छोड़ने की बात कही है.
इसके अलावा, इस बयान में अभय की तस्वीर भी संलग्न है. यह आश्चर्यजनक ही नहीं, बल्कि अभूतपूर्व है. किसी भूमिगत माओवादी नेता का अपनी तस्वीर दुनिया के सामने पेश करना अप्रत्याशित है. बयान में ईमेल पता और फेसबुक आईडी भी दर्ज हैं. ऐसा कभी नहीं हुआ है. पहले कई लोगों को इस बयान की सत्यता पर संदेह पैदा हुआ था, लेकिन बाद में इसका ऑडियो सामने आने के बाद यह साफ हो गया कि यह वाकई अभय का बयान था.
साथ ही, इस बयान में मई महीने में अबूझमाड़ के गुण्डेकोट के जंगलों में सुरक्षा बलों के साथ हुई कथित मुठभेड़ में मारे गए माओवादी पार्टी महासचिव नंबाला केशवराव (बसवराजू) का जिक्र करते हुए, उनके द्वारा छोड़े गए अधूरे शांति वार्ता के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की बात भी कही गई है.
इस बयान के कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें बारीकी से समझने की जरूरत है. लेकिन इसके पहले अभय और माओवादी आंदोलन में उनके महत्व को समझने की कोशिश करते हैं.
कौन हैं अभय?
माओवादी आंदोलन पर गहरी नज़र रखने वाले और पुलिस द्वारा समय-समय पर दिए गए बयानों के मुताबिक, अभय का असली नाम मल्लोजुला वेणुगोपाल है. उनकी उम्र 69 बताई जा रही है. तेलंगाना के पेद्दापल्ली शहर में एक ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था.
1970 के दशक के आखिर से, यानी लगभग 45-50 सालों से भूमिगत होकर काम करने वाले वेणुगोपाल के बड़े भाई मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ़ ‘किशनजी’ थे, जिनकी मृत्यु 2011 में पश्चिम बंगाल में एक कथित मुठभेड़ में हुई थी. दोनों भाई लंबे समय तक माओवादी पार्टी की केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यूरो में महत्वपूर्ण सदस्य रहे थे.
वेणुगोपाल को सांगठनिक और सैद्धांतिक मामलों में बड़े रणनीतिकार माना जाता है. उनको पार्टी में भूपति और सोनू के नाम से जाना जाता है. 2010 में पार्टी के प्रवक्ता चेरकूरी राजकुमार (आज़ाद) के मारे जाने के बाद से वेणुगोपाल पार्टी प्रवक्ता बने और तब से वे ‘अभय’ के नाम से प्रेस बयान जारी करते आ रहे हैं.
शुरुआती दौर में वेणुगोपाल ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में माओवादी आंदोलन खड़ा किया था और उसके बाद दंडकारण्य के नेता बने. लगभग पिछले 28 सालों से वे केंद्रीय कमेटी के मेंबर के रूप में काम कर रहे हैं.

वेणुगोपाल की पत्नी विमला सिड़ाम उर्फ तारक्का ने कुछ अन्य साथियों के साथ दिसम्बर 2024 में महाराष्ट्र पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया. उन्होंने बताया था कि अपनी बिगड़ती तबीयत और सशस्त्र बलों के बढ़ते हमलों के कारण उन्हें संघर्ष का रास्ता छोड़ना पड़ा. वेणुगोपाल की भाभी (जो कोटेश्वरराव की पत्नी हैं) पोतुला पद्मावती उर्फ सुजाता (उम्र 62) ने हाल ही, 13 सितंबर को हैदराबाद में सरेंडर किया. वे भी केंद्रीय कमेटी की सदस्य थीं.
दलित नेता पार्टी के महासचिव बने, आदिवासी कमांडर दंडकारण्य के सचिव
21 मई को अबूझमाड़ में हुई ‘मुठभेड़’ में माओवादी पार्टी के महासचिव नंबाला केशवराव समेत 28 कैडर मारे गए थे. इसके बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि वेणुगोपाल पार्टी के अगले महासचिव बन सकते हैं, क्योंकि वरीयता के क्रम में उन्हीं का नंबर पहले आता है. लेकिन सितंबर के दूसरे सप्ताह में ख़बर आई कि तिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी को नया महासचिव बनाया गया है.
इसके अलावा दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव का पद चर्चित कमांडर हिड़मा को मिला. हालांकि माओवादी पार्टी की तरफ से इसकी आधिकारिक पुष्टि तो नहीं हुई, लेकिन छत्तीसगढ़ से रिपोर्टिंग करने वाले एक पत्रकार ने इसकी पुष्टि द वायर हिंदी से की.
अगर देवजी और हिड़मा की पदोन्नति की ख़बर सच है, तो इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं.
तेलंगाना के कोरुट्ला शहर में जन्म लेने वाले देवजी दलित पृष्ठभूमि से आते हैं और दक्षिण बस्तर के पुव्वर्ति गांव में जन्मे हिड़मा आदिवासी हैं. 1960 के दशक के आखिरी चरण में नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुए माओवादी आंदोलन के लगभग 57 सालों के इतिहास में, यानी चारू मजूमदार, कन्हाई चटर्जी के समय से लेकर आज तक किसी दलित को पार्टी में सर्वोच्च पद पहली बार मिला है.
उसी तरह दंडकारण्य में 1980 से लेकर अब तक, यानी पिछले 45 सालों से जारी संघर्ष में किसी स्थानीय आदिवासी को दंडकारण्य कमेटी की बागडोर पहली बार मिली है.
अगर यह खबर सच है तो केंद्रीय कमेटी में वेणुगोपाल समेत कुछ अन्य वरिष्ठ लोगों को ताक पर रखकर देवजी को महासचिव बनाया गया. उसी तरह, दंडकारण्य कमेटी में भी कुछ अन्य वरिष्ठ सदस्यों को किनारे कर सैन्य कमांडर हिड़मा को उच्च पद पर बिठाया.
यह इंगित करता है कि माओवादी पार्टी ने सैन्य मोर्चे को तवज्जो दिया. यह इस बात का भी संकेत हो सकता है कि अगले साल 31 मार्च तक आंदोलन को जड़ से खत्म करने के सरकार के वायदे का मुकाबला माओवादी सैन्य तरीके से ही करना चाहते हैं.
इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि माओवादी संभवतः उन आलोचनाओं पर पूर्णविराम लगाना चाहते हैं कि दलित और आदिवासियों को पार्टी में सर्वोच्च पद कभी नहीं दिए जाते, बल्कि अगड़ी जातियों के लोग ही सर्वोच्च पदों पर काबिज हो जाते हैं.
एक हफ्ते में दो बयान – दो अलग सुर
हाल ही में भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी द्वारा पार्टी के 21वें वर्षगांठ के उपलक्ष्य में जारी किए गए एक बयान और अभय के हालिया बयान को एकसाथ पढ़ने से कई सवाल खड़े हो जाते हैं. बल्कि यह संदेह भी पैदा हो जाता है कि पार्टी दो धड़ों में बंट तो नहीं गई?
वर्षगांठ वाले बयान में लिखा गया है, ‘अगर केंद्र सरकार ऑपरेशन कगार को रोक दे और क्रांतिकारी क्षेत्र में सशस्त्र बलों के शिविरों की स्थापना पर रोक लगा दे, तो हमारी पार्टी जनता के व्यापक हित में शांति वार्ता के लिए हमेशा तैयार है.’
अभय का बयान इससे एकदम विपरीत है.
एक बयान कहता है कि वे कुछ शर्तों पर शांति वार्ता के लिए तैयार है, जबकि अभय के बयान का सारांश यह है कि वो बिना शर्त हथियार छोड़ने को तैयार है, बस सरकार एक महीने की मोहलत दे.
इसके अलावा सोशल मीडिया पर एक और आत्मालोचना रिपोर्ट वायरल हो रहा है जो सोनू की ओर से जारी हुआ है. तेलुगु में लिखी इस रिपोर्ट की पुष्टि तो नहीं हो पाई, लेकिन उसे देखकर लगता है कि वह अभय के बयान का विस्तार भर है. ध्यान रहे कि अभय और सोनू, दोनों नाम वेणुगोपाल के ही हैं. उस रिपोर्ट का मूल लेखक जो भी हो, उससे कई सवालों का जवाब भी मिलते हैं, और कई और नए सवाल पैदा भी हो जाते हैं.
संदेह का परदा उठना बाकी है
अभय के ताजा बयान के बाद अब इन सवालों का जवाब मिलना बाकी है कि पार्टी प्रवक्ता की हैसियत से उन्होंने ‘सशस्त्र संघर्ष का अस्थाई विराम’ और ‘हथियार त्यागने’ का प्रस्ताव जो सामने रखा, उस पर उनके नए महासचिव (अगर वे चुने गए हैं तो) की मुहर है या नहीं?
अगर नए महासचिव का चुनाव अब तक नहीं हुआ है, तो इसका जिक्र इस बयान में क्यों नहीं है कि महासचिव की गैर-मौजूदगी में पार्टी की तरफ से अभय यह बयान दे रहे हैं. जब वे यह कह रहे हैं कि उनके प्रस्ताव पर कुछ ही बड़े कैडरों की सहमति है, तब इसका यह मतलब नहीं होगा कि इस प्रस्ताव पर पार्टी की आम सहमति या व्यापक सहमति नहीं है?
जिस दंडकारण्य क्षेत्र को माओवादी अपना सबसे बड़ा आधार बताते हैं, उस क्षेत्र के सबसे तेजतर्रार कमांडर और अब संभवतः दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव हिड़मा इस प्रस्ताव से सहमत हैं या नहीं? प्रवक्ता अभय के नाम से जारी बयान के अलावा पोलितब्यूरो सदस्य सोनू के नाम से जारी की गई आत्मालोचनात्मक रिपोर्ट पार्टी की साझी रिपोर्ट है, या उनकी व्यक्तिगत रिपोर्ट है?
बहुमत के आधार पर साझा निर्णय लेने के अपने उसूलों के उलट, वेणुगोपाल को क्यों निजी बयान जारी करने पड़ रहे हैं? क्या पार्टी में या केंद्रीय कमेटी में वे अलग-थलग पड़ गए हैं? या यह इस बात का संकेत है कि पार्टी पहले ही दो धड़ों में बंट चुकी है और वेणुगोपाल माओवादियों के संभवतः एक धड़े का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?

चाहे ये प्रस्ताव जिस भी माओवादी धड़े से सामने आया हो, सरकार इसे सकारात्मकता से लेती है या नहीं, ये अभी तक स्पष्ट नहीं है. अगर माओवादी हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहते हैं, तो इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए उसको सुलभ बनाने का दायित्व न सिर्फ सरकारों पर, बल्कि सिविल सोसाइटी पर भी होगा. इस पर फिलहाल संदेह की स्थिति बनी हुई है.
इतना ही नहीं, अगर माओवादी हथियार डाल देते हैं, तो उसके बाद उनके आगे के क्रियाकलाप क्या होंगे? अभय के बयान में इस बात का जिक्र था, ‘हम जन समस्याओं पर तमाम राजनीतिक पार्टियों और संघर्षरत संस्थाओं से, जहां तक संभव हो, कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करेंगे’.
ऐसे में सवाल उठता है कि वे किन राजनीतिक पार्टियों की बात कर रहे हैं. वामपंथी पार्टियों के साथ, या अन्य पार्टियों के साथ जिनको वो अब तक बुर्जुवाई पार्टी कहते आ रहे थे? या वो अपनी वर्तमान पार्टी को ही कानूनी तौर पर चलने वाली आम राजनीतिक पार्टी के रूप में परिवर्तित करना चाहेंगे?
एक सवाल यह भी उठता है कि आदिवासियों के विस्थापन, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों पर और जंगलों में कॉरपोरेट कंपनियों की घुसपैठ, पेसा कानून और अन्य पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के मामले उनके प्रमुख मुद्दे बने रहेंगे या नहीं?
इन सारे सवालों पर से परदा तब तक नहीं उठेगा, जब तक देवजी या हिड़मा की ओर से से कोई बयान सामने न आ जाए.
