नई दिल्ली: झारखंड के टाटा नगर रेलवे स्टेशन पर शुक्रवार (19 सितंबर) रात एक कैथोलिक नन और 19 आदिवासी नाबालिगों से साउथ बिहार एक्सप्रेस से उतरने के तुरंत बाद लगभग पांच घंटे तक पूछताछ की गई.
बताया गया है कि बजरंग दल के सदस्यों ने धर्मांतरण की आशंका जताई थी- हालांकि जांचकर्ताओं और चाइल्ड हेल्पलाइन अधिकारियों को अभी तक इसमें कोई सच्चाई नहीं मिली है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना के बाद ईसाई अधिकार समूहों ने आरोप लगाया है कि बजरंग दल के सदस्यों ने नाबालिगों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भी फैलाए. इस समूह में चार लड़के और 15 लड़कियां शामिल थीं.
सरायकेला-खरसावां जिले के आदिवासी बहुल गांवों में किशोर जागरूकता परियोजनाओं पर काम करने वाली नन ने आरोप लगाया कि शुक्रवार शाम को जीवन कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए खरसावां से जमशेदपुर जाते समय दो लोगों ने उनका और उनके बच्चों का पीछा किया.
उन्होंने कहा, ‘वे हमारा पीछा कर रहे थे और एक समय पर टीटीई ने धीरे से मुझसे पूछा कि मैं उन्हें कहां ले जा रही हूं. बाद में एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई, मानो मैं कोई अपराधी हूं. यात्रियों और टीटीई ने नाबालिगों के धर्म के बारे में पूछताछ शुरू कर दी.’
अखबार के अनुसार, नन ने बताया कि उसने टीटीई को अनुमति पत्र दिखाए, जिसमें अभिभावकों और गांव के मुंडा (मुखिया) ने बच्चों को उसके साथ जाने की अनुमति दी थी. उन्होंने कहा, ‘हम हर कुछ महीनों में यह कार्यक्रम आयोजित करते हैं, और ये बच्चे पिछले कुछ सालों से हमारे संपर्क में हैं. गैर-ईसाई परिवारों के बच्चे भी हैं, जो अब भी अपने धर्म का पालन करते हैं, ईसाई धर्म का नहीं.’
उन्होंने कहा कि कुछ बच्चों के पास आधार कार्ड नहीं थे क्योंकि उन्होंने आखिरी समय में कार्यक्रम में शामिल होने का फैसला किया था.
उसने बताया कि जब टीटीई ने कहा कि वह उन्हें पुलिस के हवाले कर देगा, तो उसने डर के मारे एक फादर-बीरेंद्र टेटे, जो कार्यक्रम के निदेशक भी हैं, को फोन किया.
टेटे ने आरोप लगाया, ‘मैं स्टेशन पहुंचा तो देखा कि कुछ नाबालिग प्लेटफ़ॉर्म पर बैठी थीं, जहां कोई महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थी. सभी को बजरंग दल के सदस्यों ने घेर रखा था और वे नाबालिग लड़कियों की तस्वीरें ले रहे थे.’
उनके अनुसार, बच्चे शुक्रवार रात 11 बजे से शनिवार सुबह लगभग 4 बजे तक वहां थे, कुछ देर के लिए रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के साथ, उसके बाद राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) वहां पहुंची और उनसे पूछताछ की. आख़िरकार, बजरंग दल के सदस्य वहां से चले गए और बच्चों को दो वाहनों में कार्यक्रम स्थल ले जाया गया.
जांच में कुछ नहीं मिला
अखबार के अनुसार, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 के एक अधिकारी पंकज गुप्ता ने कहा कि उन्हें अभी तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं मिली है. उन्होंने कहा, ‘चाइल्ड हेल्पलाइन की भूमिका बच्चों के कल्याण को सुनिश्चित करने तक ही सीमित थी.’
जीआरपी की पुलिस उपाधीक्षक जयश्री कुजूर ने कहा, ‘अभी तक किसी भी धर्मांतरण की पुष्टि नहीं हुई है. जांच जारी है.’
बजरंग दल की स्थानीय इकाई के प्रमुख अरुण सिंह ने कहा कि ट्रेन में यात्रा कर रहे एक कार्यकर्ता ने बच्चों के हाथों में बंधे धागे देखे और उनसे पूछताछ शुरू कर दी.
उन्होंने कहा, ‘बच्चे स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए. जब नन और पादरी से पूछा गया, तो उन्होंने दावा किया कि उनके पास माता-पिता की अनुमति है और वे बच्चों को जीवन कौशल पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए जमशेदपुर ले जा रहे हैं.’ उन्होंने दावा किया कि बच्चे कार्यक्रम को समझने के लिए बहुत छोटे थे.
उन्होंने दावा किया, ‘अधिकारियों को सूचित किया गया और आरपीएफ अधिकारियों ने नाबालिगों को अपने साथ लिया और उनसे आधार कार्ड जैसे दस्तावेज़ मांगे, जो उपलब्ध नहीं थे. फिर बच्चों को जीआरपी अधिकारियों को सौंप दिया गया.’
नाबालिगों की तस्वीरें और वीडियो लेने के बारे में सिंह ने कहा कि उनके सदस्यों ने ‘सबूत जुटाने’ के लिए ऐसा किया था. आखिरकार, बच्चों ने घर वापस भेजे जाने से पहले दो दिवसीय कार्यक्रम में भाग लिया.
इस घटनाक्रम के बाद ऑल इंडिया क्रिश्चियन माइनॉरिटी फ्रंट के उपाध्यक्ष और अल्पसंख्यक अधिकार कार्यकर्ता अजीत तिर्की ने कहा कि वे इस मुद्दे को अधिकारियों के समक्ष उठाएंगे और कार्रवाई की मांग करेंगे.
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 28 जुलाई को छत्तीसगढ़ पुलिस ने बजरंग दल के सदस्यों के विरोध प्रदर्शन के बाद दुर्ग रेलवे स्टेशन पर 18-19 साल की तीन महिलाओं के साथ दो नान और एक पुरुष पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया था. ईसाई समुदाय ने इन गिरफ़्तारियों की कड़ी निंदा की थी.
