मुंबई: 2008 के मालेगांव आतंकी बम विस्फोट मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की एक विशेष अदालत द्वारा बरी किए जाने के दो महीने से भी कम समय में भारतीय सेना ने उन्हें कर्नल के पद पर पदोन्नत कर दिया है.
पुरोहित, उन सात आरोपियों में से एक थे जिन पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ आतंकी विस्फोट में उनकी भूमिका के लिए मुकदमा चलाया गया था. अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में मामला साबित न कर पाने के बाद उन्हें बरी कर दिया गया.
विशेष एनआईए अदालत के न्यायाधीश एके लाहोटी ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि उनके खिलाफ ‘गंभीर संदेह’ था. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ‘गंभीर संदेह की पुष्टि’ तो हो जाती है, लेकिन यह आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है.
अपने फैसले में उन्होंने लिखा, ‘गंभीर संदेह हो सकता है, लेकिन केवल संदेह ही उन्हें दंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.’
एनआईए, जिसने दावा किया था कि वह बॉम्बे हाईकोर्ट में बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने के बारे में कानूनी सलाह लेगी, ने मामले को आगे बढ़ाने के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है. इस बीच, विस्फोट में मारे गए छह लोगों के परिवारों ने बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी है.
मीडिया से बात करते हुए पुरोहित की पत्नी अपर्णा ने पदोन्नति की पुष्टि की. इस पदोन्नति को सरकार द्वारा एक ऐसे व्यक्ति के समर्थन में स्पष्ट रुख के रूप में देखा जा रहा है जो 17 साल से अधिक समय से आतंकवाद के आरोपी थे.
इस बीच कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने पुरोहित के पदभार ग्रहण समारोह की एक तस्वीर साझा की और उन्हें बधाई दी. सिंह ने लिखा, ‘कर्नल पुरोहित को वर्दी में वापस आने पर बधाई. सरकार उन देशभक्तों के साथ पूरी तरह खड़ी है जो साहस और निष्ठा के साथ देश की सेवा करते हैं.’
यह घटना 29 सितंबर, 2008 को हुई थी, जब मालेगांव के भिक्कू चौक पर एक बम विस्फोट हुआ था. यह चौक कभी अपने पावरलूम उद्योग के लिए जाना जाता था. घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस में प्राथमिकी दर्ज की गई थी. बाद में जांच एटीएस को सौंप दी गई थी.
एटीएस के अनुसार, पुरोहित ने 2006 में अभिनव भारत संगठन की स्थापना की, जिसके माध्यम से कथित तौर पर धन एकत्र किया गया और साजिश रची गई. एटीएस ने दावा किया कि इस संगठन के माध्यम से पुरोहित का लक्ष्य एक ‘हिंदू राष्ट्र’ स्थापित करना था, जिसका अपना संविधान, झंडा और ‘निर्वासित सरकार’ (government in exile) हो, जिसका संचालन इज़रायल या थाईलैंड से किया जाए.
एटीएस ने वित्तीय संबंध स्थापित करने का भी दावा किया और मामले में आर्थिक गतिविधियों की जांच के लिए महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 (मकोका) की धाराएं भी लगाईं. हालांकि मुकदमे के शुरुआती चरण में मकोका के आरोप हटा दिए गए थे, लेकिन पुरोहित और अन्य आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया गया.
तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जो 26 नवंबर, 2008 को एक अन्य मुंबई आतंकवादी हमले में मारे गए थे, ने शुरुआत में जांच का नेतृत्व किया था. सात आरोपियों पर विभिन्न आरोपों के तहत मुकदमा चलाया गया, जिनमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और हत्या और साजिश के लिए भारतीय दंड संहिता के प्रावधान शामिल थे.
लगभग 17 वर्षों तक चले इस मामले में कई नाटकीय घटनाक्रम हुए. शुरुआत में, इस मामले में 12 लोगों के नाम थे और उन्होंने लगभग नौ साल जेल में बिताए. मई 2016 में, जब एनआईए ने एक पूरक आरोपपत्र दाखिल किया, तो उसने ठाकुर सहित छह नामों को हटा दिया. एजेंसी द्वारा उन्हें मामले से बरी करने के प्रयास को चुनौती दी गई और उन पर मुकदमा चलता रहा.
