नई दिल्ली: लद्दाख में हालिया हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच, एपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) के सह-अध्यक्ष और लद्दाख बौद्ध संघ के प्रमुख चेयरिंग दोरजे लाकरुक ने कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से यहां बेरोज़गारी, स्थानीय प्रतिनिधित्व की कमी और जमीन के असुरक्षित होने जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी हो गई हैं.
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि विरोध प्रदर्शन हिंसक जरूर हुए, लेकिन यह ‘छह साल से पनप रहे असंतोष और युवा बेरोज़गारी का नतीजा’ था.
लाकरुक ने कहा, ‘जब 4-5 हजार लोग सड़क पर उतरते हैं, तो कुछ असामाजिक तत्व शामिल हो सकते हैं. लेकिन ज्यादातर शिक्षित और बेरोज़गार युवा थे. अगर वे सब गुंडे होते, तो भाजपा दफ्तर पर हमले के वक्त राष्ट्रीय ध्वज और भाजपा झंडे में फर्क नहीं कर पाते. उन्होंने सिर्फ भाजपा झंडे को फाड़ा, लेकिन तिरंगे को नहीं छुआ.’
बेरोज़गारी और ठेके की नौकरियां
लाकरुक ने आरोप लगाया कि केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) बनने के बाद रोजगार की स्थिति बदतर हुई है. उनके मुताबिक, ‘पहले राज्य भर्ती अभियानों में स्थानीय युवाओं को नौकरी मिल जाती थी. अब यह सब बंद है. कुछ लोगों को ठेके पर नौकरी दी गई है, जो असल में गुलामी जैसी है. उनसे लंबे घंटे काम कराया जाता है और कभी भी निकाला जा सकता है.’
उन्होंने कहा कि यूटी प्रशासन ने सचिवालय तो बनाया, लेकिन न तो नई भर्तियां हुईं और न ही पब्लिक सर्विस कमीशन स्थापित किया गया. ‘नतीजा यह है कि न कोई गजेटेड पद भरा गया और न ही सेवानिवृत्त कर्मचारियों के स्थान पर नए लोगों को लिया गया. कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम भ्रष्टाचार को जन्म दे रहा है, जहां ठेकेदार और अफसर मिलकर शिक्षकों तक की तनख्वाह काट लेते हैं.’
‘काउंसिल बेजान हो गई है’
लाकरुक ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद स्वायत्त हिल काउंसिल भी अप्रभावी हो गई है.
‘काउंसिल कर्मचारी अब यूटी प्रशासन का काम कर रहे हैं और उसी की सुनते हैं. जमीन और अन्य मामलों में भी उनकी सिफारिशें अनदेखी हो रही हैं. जनता में यही गुस्सा भड़का.’
जमीन और होटल कारोबार पर खतरा
उन्होंने पुराने कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि पहले बंजर ज़मीन पर खेती करने वाले बाद में मालिक बन जाते थे, लेकिन अब यूटी प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी है.
‘लोग घर और होटल बनाने की इजाज़त के लिए भटक रहे हैं. दो वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के बाहर की जमीन निजी निवेशकों के लिए खुली है. ऐसे में छोटे गेस्ट हाउस बड़े होटल चेन से कैसे मुकाबला करेंगे?’
‘केंद्र शासित प्रदेश तो चाहा, पर विधानमंडल के साथ’
जब लाकरुक से पूछा गया कि वे लोग तो हमेशा से केंद्र शासित प्रदेश चाहते थे, फिर अब अब विरोध क्यों कर रहे हैं? इसका जवाब देते हुए लाकरुक ने कहा कि हमने कभी सिर्फ़ यूटी की मांग नहीं की थी. हम हमेशा विधानमंडल वाला यूटी चाहते थे.
‘श्रीनगर दूर था, लेकिन दिल्ली उससे भी ज़्यादा दूर है. अब केंद्र से जो फंड आते हैं, उनमें से सिर्फ़ 10% काउंसिल को मिलते हैं. अगर हमारे पास विधानमंडल वाला यूटी होता, तो सारा फंड विधानसभा को आता. अब यहां एलजी, कमिश्नर और सचिव हमारे शासक बन गए हैं.’
अनुच्छेद 370 से मिली सुरक्षा को याद करते हुए वह कहते हैं, ‘हम अनुच्छेद 370 को कोसते थे, क्योंकि वह हमें यूटी बनने में बाधा लगता था. लेकिन उसने हमें 70 साल सुरक्षा दी. हमारी ज़मीन पूरी तरह सुरक्षित थी. यहां तक कि जम्मू-कश्मीर के लोग भी यहां नहीं आते थे. लेकिन अब लद्दाख पूरे भारत के लिए खोल दिया गया है. हमारे पास कोई सुरक्षा नहीं है. बहुत से बाहरी लोगों ने ज़मीन खरीद ली है. होटल चेन आ गए हैं, जो स्थानीय लोगों की रोज़ी-रोटी छीन रहे हैं.’
सोलर प्रोजेक्ट और संस्कृति पर संकट
लाकरुक ने 15,000 मेगावाट सोलर प्रोजेक्ट को लेकर भी गंभीर चिंता जताई. उन्होंने कहा, ‘यह प्रोजेक्ट पश्मीना बकरियों की चरागाह भूमि पर बन रहा है. इससे हज़ारों एकड़ जमीन प्रभावित होगी. 45,000 बाहरी कर्मचारी यहां आएंगे जबकि इलाके की आबादी ही 15,000 है. इससे हमारी पारिस्थितिकी और संस्कृति दोनों खत्म हो जाएंगे.’
केंद्र से टकराव क्यों?
लाकरुक के मुताबिक, सरकार उनकी मांगें इसलिए नहीं मान रही क्योंकि ‘भाजपा की विचारधारा सबको एक जैसा बनाने की है. वे स्थानीय लोगों को शक्तिशाली नहीं देखना चाहते. जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कभी हमारी परंपराओं में दखल नहीं दिया, लेकिन अब गांवों के बुजुर्ग मुखियाओं तक को हटाया जा रहा है, जबकि वे रीति-रिवाजों के असली जानकार हैं.’
लाकरुक ने दो टूक कहा, ‘छह साल से हम सरकार से बातचीत कर रहे हैं और अब तक केवल डोमिसाइल आधारित आरक्षण मिला है, वह भी अधूरा. मुख्य मुद्दे पर चर्चा तक नहीं हुई. क्या हमें और छह साल इंतज़ार करना होगा?’
