आज 2 अक्टूबर को भारत की तीन महान विभूतियों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, महाशय मसुरियादीन पासी की जयंती देश में मनाई जा रही है. इसमें दो महापुरुषों के बारे में हमे अधिक लिखित जानकारी प्राप्त होती है, लेकिन महाशय मसुरियादीन के बारे में लिखित जानकारी कम प्राप्त होती है इस लेख में उन्हीं के जीवन संघर्षों के बारे में बताने के प्रयास किया गया है.
महाशय मसुरियादीन पासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संविधान सभा सदस्य, सामाजिक चिंतक तथा कुशल राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा सामाजिक चिंतक के रूप में दलित एवं पिछड़ों का नेतृत्व किया.
पासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले महाशय मसुरियादीन पासी का जन्म 2 अक्टूबर 1911 को जोधवल तेलियरगंज, इलाहाबाद संयुक्त प्रांत में हुआ था. इनके पिता श्री बिंदेश्वरी प्रसाद पासी एक साधारण किसान थे, तथा माता पार्वती देवी थी. यह दो भाइयों में बड़े थे. इन्होंने प्राथमिक शिक्षा गवर्नमेंट नॉर्मल स्कूल कटरा, इलाहाबाद से शिक्षा प्राप्त की. महाशय मसुरियादीन की बचपन से ही शिक्षा के प्रति विशेष रुचि थी.
पासी समुदाय पर ब्रिटिश कालीन 1871 में आपराधिक जनजाति अधिनियम (क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट) लगाया गया था. उन्होंने बचपन से समाज को प्रताड़ित होते हए देखा.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर मसुरियादीन पढ़ाई छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए. आजादी के बाद उनकी योग्यता को देखते हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी कोर्ट की तरफ से उन्हें स्नातक की उपाधि दी गई. आर्य समाजी होने के कारण इनको महाशय कहकर पुकारा जाने लगा.
आज़ादी की लड़ाई के सिपाही
1928 में महाशय जी ने कांग्रेस सदस्यता ग्रहण की. इलाहाबाद के कांग्रेस के सदस्यों मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय, जवाहरलाल नेहरू आदि कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में आए. इन्होंने कटरा इलाहाबाद में एक प्रिंटिंग प्रेस खोला था जहां से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लेखों तथा पोस्टरों की छपाई करते थे.
आजादी के आंदोलन की क्रांति को मजबूत करने के क्रांतिकारी लेख छापने कारण इनको ब्रिटिश सरकार द्वारा जेल भेज दिया गया. जब यह जेल में थे, तभी इनकी पत्नी का बीमारी के कारण देहांत हो गया. ब्रिटिश सरकार की शर्तों को न मानने की वजह से अपनी पत्नी के अंत्योष्टि में भी नही पहुंच सके. इन्होंने कांग्रेस में अपनी एक पहचान बनाई और जवाहरलाल नेहरू के काफी करीबी हो गए.
महाशय जी आजादी के आंदोलन के दिनों में 1932 से 1944 के बीच विभिन्न अवसरों पर कारावास की कठोरतम यातनाएं सही. इलाहाबाद का नेतृत्व किया तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ कई बार जेल गए. इन्होंने 1936 से 1947 तक शहर कांग्रेस कमेटी इलाहाबाद उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया तथा 1947-1948 में इनको शहर कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष चुना गया.

महाशय मसुरियादीन ने ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास लीग, हरिजन कल्याण परिषद तथा अखिल भारतीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में अपना योगदान दिया. ईश्वर शरण हरिजन आश्रम इलाहाबाद की कार्यकारिणी समिति तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय कोर्ट के सदस्य रहते हुए सेवाएं समर्पित की. इन्होंने एमईएस यूनियन इलाहाबाद, पोस्टमैन यूनियन में कार्य किया. अखिल भारतीय पासी महासभा के अध्यक्ष रहते हुए पासी समाज को एक नई दिशा प्रदान की.
महाशय मसुरियादीन 1946 से 1952 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे. इन्होंने संविधान सभा सदस्य तथा 1946 से 1950 अंतरिम संसद में कार्य करते हुए राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1952 से 1971 तक सुरक्षित लोकसभा सीट से निर्वाचित होकर जनता का प्रतिनिधित्व किया.
पहली और दूसरी (1952 तथा 1957) बारमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट ईस्ट कम जौनपुर डिस्ट्रिक्ट बेस्ट और तीसरी और चौथी (1962 और 1967) बार चायल (सुरक्षित) संसदीय सीट से निर्वाचित होकर जनता का प्रतिनिधित्व किया.
समुदाय के लिए लड़ाई
पासी जाति ने 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. जिसके कारण उत्तर भारत में 1871 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ लगाकर चोर या डकैत कहा गया, जिससे भारतीय समाज इनको घृणा की दृश्य से देखने लगा और वह समाज मे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर से कमजोर हो गए. यह कानून इतना कठोर था कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता था.
इस एक्ट के अंतर्गत आने वाली जातियों को जमीन रखने का अधिकार नही था. ब्रिटिश सरकार के अनुमति के बिना कहीं आने जाने की आजादी नहीं थी. तथा हफ्ते में एक दिन थाने में हाजिरी लगानी पड़ती थी और इस एक्ट के अंतर्गत सबसे बड़ी बात यह थी कि यह जन्मजात चलता था. यदि पिता पर यह कानून लगा है, तो जन्म लेने वाले बच्चे के 14 वर्ष होने पर कानून लग जाता था. लेकिन इस सबके बावजूद महाशय मसुरियादीन ने स्वाधीनता आंदोलन एवं सामाजिक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.
महाशय जी ने आपराधिक जनजाति अधिनियम कानून को हटवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके लिए उन्होंने इलाहाबाद सहित पूरे प्रदेश में एक पृष्ठभूमि तैयार की तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरु को इस कानून से समाज की समस्याओं को अवगत कराकर हटवाने का दबाव बनाया, जिससे यह कानून 31 अगस्त 1952 को आजादी के 5 वर्ष बाद भारत सरकार द्वारा समाप्त किया गया.
पासी समुदाय इस कानून से उनको मुक्तिदाता के रूप में देखता है.
सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़
सामाजिक सुधारक के रूप में महाशय जी ने भारतीय समाज मे फैली अंधविश्वास, छुआछूत, बाल विवाह के खिलाफ पर आवाज उठाई तथा दलित समुदाय में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए अपने सहयोगियों के साथ क्षेत्रों में घूम-घूमकर कार्य किया.
दलित एवं पिछड़ों के लिए महाशय मसुरियादीन ने जीवनपर्यंत कार्य किया. दलित समुदाय में शिक्षा की अलख जगाने के लिए महाशय जी ने अपने सहयोगियों के साथ गांव-गांव में सभाएं करके लोगों को जागरूक किया तथा लोगों को अपने बच्चों को शिक्षा ग्रहण कराने लिए प्रेरित किया. दलित समुदाय के बच्चों को सुलभ शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने 14 कॉलेजों का निर्माण करवाया. विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए देश के अनेक क्षेत्रों से छात्र आने लगे थे. उसमें दलित समुदाय के छात्र भी थे. समाज में जाति व्यवस्था के कारण दलित छात्रों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था. महाशय मसुरियादीन ने दलित समुदाय के बच्चों को रहने के लिए इलाहाबाद शहर में हॉस्टलों का निर्माण कराया. उनके द्वारा समाज को नशा मुक्त बनाने के लिए लोगों को जागरूक करते थे.
दलित समुदाय के लोग खासकर पासी समुदाय महाशय जी को अपना नायक मानते हैं. पासी समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर देश के विभिन्न हिस्सों में उनकी जयंती मना रहे हैं तथा 31 अगस्त को विमुक्ति दिवस के रूप में मनाते है. उसी दिन 1952 में ब्रिटिश सरकार के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871’ को निरस्त किया गया था.
(प्रदीप कुमार इलाहाबाद के जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोधार्थी हैं.)
