नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि किसी अन्य देश के समर्थन में मैसेज पोस्ट करने मात्र से भारत के नागरिकों में रोष या वैमनस्य पैदा हो सकता है और यह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196 (शत्रुता को बढ़ावा देना) के तहत दंडनीय भी हो सकता है, लेकिन यह धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य) के कठोर प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आएगा.
लाइल लॉ की खबर के मुताबिक, जस्टिस संतोष राय की पीठ ने यह टिप्पणी साजिद चौधरी नामक व्यक्ति को ज़मानत देते हुए की, जिन पर ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ वाली एक फेसबुक पोस्ट फॉरवर्ड करने का आरोप लगा है.
पीठ के समक्ष उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने कहीं भी कोई वीडियो पोस्ट/प्रसारित नहीं किया है और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और अगर उन्हें ज़मानत मिल जाती है, तो न्याय से भागने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोई संभावना नहीं है.
अभियोजन पक्ष ने ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि आवेदक एक अलगाववादी हैं और पहले भी इसी तरह के अपराध कर चुके हैं. हालांकि, यह स्वीकार किया गया कि उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.
यह भी बताया गया कि आवेदक ने एक पाकिस्तानी व्यक्ति की पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ‘कामरान भट्टी, मुझे आप पर गर्व है, पाकिस्तान ज़िंदाबाद.’
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ वाले सोशल मीडिया पोस्ट की एक प्रति संलग्न तो की गई थी, लेकिन अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह पता चले कि आवेदक ने भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ कोई बयान दिया था.
‘बीएनएस की धारा 152 को उचित सावधानी के साथ लागू किया जाना चाहिए’
अदालत ने आगे कहा कि बीएनएस की धारा 152, जो कठोर दंड का नया प्रावधान है और आईपीसी में इसके अनुरूप कोई धारा नहीं है, को उचित सावधानी के साथ लागू किया जाना चाहिए.
अदालत ने कहा, ‘सोशल मीडिया पर बोले गए शब्द या पोस्ट भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें तब तक संकीर्ण रूप से नहीं समझा जाना चाहिए जब तक कि वे ऐसी प्रकृति के न हों, जो किसी देश की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित करते हों या अलगाववाद को बढ़ावा देते हों.’
बीएनएस की धारा 152 के दायरे की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा कि इसके तहत मौखिक या लिखित शब्दों, संकेतों, दृश्य प्रतिरूपों, इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से अलगाव, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियों को बढ़ावा देना, अलगाव की भावना को बढ़ावा देना या भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य अनिवार्य हैं.
जस्टिस संतोष राय ने आगे कहा कि किसी विदेशी देश का समर्थन करने वाला मात्र सोशल मीडिया संदेश बीएनएस की धारा 196 के अंतर्गत आ सकता है, जिसके लिए सात साल तक की कैद की सजा हो सकती है, लेकिन यह ‘निश्चित रूप से धारा 152 बीएनएस के प्रावधानों पर लागू नहीं हो सकता’.
इस संबंध में न्यायालय ने इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य 2025 (एससी) 362 में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह दोहराया गया था कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की आधारशिला है और सोशल मीडिया पोस्ट का मूल्यांकन कमज़ोर और अस्थिर मानसिकता वाले व्यक्तियों के बजाय ‘विवेकशील, दृढ़-चित्त, दृढ़ और साहसी व्यक्ति’ के नज़रिए से किया जाना चाहिए.
इस पृष्ठभूमि में मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना अदालत ने साजिद चौधरी को कड़ी शर्तों के अधीन, निजी मुचलके और ज़मानत राशि जमा करने की शर्त पर ज़मानत दे दी.
‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ कहना देशद्रोह नहीं’
मालूम हो कि इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा था कि बिना भारत की निंदा किए किसी अन्य देश की प्रशंसा करना राजद्रोह नहीं है. अदालत ने ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ वाले सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में आरोपी को ज़मानत देते हुए माना था कि धारा 152 के तहत लगाए आरोपों से उन्हें जोड़ने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं.
गौरतलब है कि भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152 ‘भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों’ को दंडित करती है. इस धारा में राजद्रोह शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता की धारा 124A का स्थान लेती है, जो राजद्रोह से संबंधित थी.
हालांकि, बीएनएस के लागू होने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा के तहत लंबित आपराधिक मुकदमों और अदालती कार्यवाही को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था जब तक कि सरकार कानून पर पुनर्विचार नहीं कर लेती.
