एल्गार परिषद केस: हाईकोर्ट की अनिच्छा के बाद आनंद तेलतुम्बड़े ने विदेश यात्रा की याचिका वापस ली

एल्गार परिषद मामले में आरोपी शिक्षाविद आनंद तेलतुम्बड़े ने कुछ व्याख्यान देने के लिए विदेश यात्रा की अनुमति मांगने वाली अपनी याचिका वापस ले ली, क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसकी अनुमति देने में अनिच्छा व्यक्त की थी. उन्हें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर पर व्याख्यान देने के लिए नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम आमंत्रित किया गया है.

आनंद तेलतुंबड़े. (फाइल फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

नई दिल्ली: एल्गार परिषद मामले में आरोपी शिक्षाविद आनंद तेलतुम्बड़े ने बुधवार को एक व्याख्यान देने के लिए विदेश यात्रा की अनुमति मांगने वाली अपनी याचिका वापस ले ली, क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसकी अनुमति देने में अनिच्छा व्यक्त की थी.

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एएस गडकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह कहते हुए कि वह याचिका स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं है, कहा कि तेलतुम्बड़े वर्चुअल माध्यम से व्याख्यान दे सकते हैं.

तेलतुम्बड़े के वकील मिहिर देसाई ने अदालत को बताया कि कार्यकर्ता को सेमिनार भी आयोजित करने होंगे. हालांकि, हाईकोर्ट ने अपनी अनिच्छा व्यक्त की और यह भी उल्लेख किया कि एक विशेष अदालत ने हाल ही में तेलतुम्बड़े द्वारा मामले से बरी करने की मांग वाली एक याचिका को खारिज कर दिया था.

इसके बाद देसाई ने याचिका वापस लेने की मांग की, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया.

अभियोजन एजेंसी, एनआईए ने इस याचिका का विरोध करते हुए दावा किया था कि उनके फरार होने और विदेश में शरण लेने की संभावना है.

इससे पहले मार्च में तेलतुम्बड़े ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए अप्रैल और मई में विदेश यात्रा की अनुमति मांगी थी.

ज्ञात हो कि शिक्षाविद और कार्यकर्ता, जो वर्तमान में ज़मानत पर हैं, ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर पर व्याख्यान देने के लिए नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम आमंत्रित किया गया है.

एनआईए ने इस याचिका का विरोध करते हुए दावा किया कि तेलतुम्बड़े और मामले के अन्य आरोपियों पर माओवाद और नक्सलवाद की विचारधारा फैलाने के गंभीर और जघन्य आरोप हैं. एजेंसी का यह भी कहना था कि तेलतुम्बड़े को विदेश यात्रा करने की कोई आवश्यकता नहीं है और वे व्याख्यान ऑनलाइन दिए जा सकते हैं.

एनआईए ने आरोप लगाया था कि तेलतुम्बड़े प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के एक वरिष्ठ और सक्रिय सदस्य हैं और अपनी नापाक गतिविधियों को जारी रखने के लिए अपने शैक्षणिक पद का इस्तेमाल कर रहे हैं.

तेलतुम्बड़े ने अपनी याचिका में कहा कि वह डॉ. आंबेडकर, दलित आंदोलन, जाति, सार्वजनिक नीति और भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों के एक प्रमुख विशेषज्ञ हैं.

याचिका में बताया गया है कि एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय ने अप्रैल में चार सप्ताह के कार्यक्रम के लिए तेलतुम्बड़े का चयन किया था, जहां उन्हें सेमिनारों में भाग लेने, व्याख्यान देने, पीएचडी अभ्यार्थियों के साथ कक्षाएं संचालित करने और स्कॉलर्स व फैकल्टी सदस्यों से व्यक्तिगत तौर पर मिलने का अवसर मिला था.

उन्हें नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय ने भी 16 अप्रैल को व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था. इसके अलावा, यूनाइटेड किंगडम के नॉटिंघम ट्रेंट विश्वविद्यालय ने भी उन्हें मई के पहले दो हफ्तों के लिए स्कॉलर-इन-रेजिडेंस के रूप में आमंत्रित किया था. याचिका में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय सहित यूके के तीन और विश्वविद्यालयों द्वारा दिए गए निमंत्रणों का भी उल्लेख किया गया है.

कार्यकर्ता ने अपनी याचिका में अपने पासपोर्ट को जारी करने का निर्देश देने की मांग की ताकि वे वीज़ा संबंधी औपचारिकताएं पूरी कर सकें.

ज्ञात हो कि 18 नवंबर, 2022 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने तेलतुम्बड़े को नियमित ज़मानत दे दी थी. बाद में एनआईए की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप न करने का निर्णय लिया.

गौरतलब है कि तेलतुम्बड़े और अन्य आरोपियों के खिलाफ यह मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में एल्गार परिषद के कार्यक्रम से जुड़ा है. पुलिस का दावा है कि कार्यक्रम के दौरान भड़काऊ बयानों के कारण इसके अगले दिन पुणे के बाहरी इलाके कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़की थी. पुलिस का यह भी दावा है कि इस कार्यक्रम को माओवादियों का समर्थन हासिल था. बाद में इस मामले की जांच एनआईए को सौंप दी गई थी.