नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बीते रविवार (29 सितंबर) को ह्वाइट हाउस में गाज़ा में शांति की नई योजना प्रस्तुत की थी, जिसे इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने समर्थन दिया था और इस प्रस्ताव पर हमास के राजी होने का इंतज़ार किया जा रहा है.
इस बीच, इज़रायली नौसेना ने गुरुवार (2 अक्टूबर) को ग़ाज़ा के लिए सहायता सामग्री लेकर जा रही करीब 40 नौकाओं को रोककर उनमें सवार पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग सहित 450 से ज़्यादा विदेशी कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था.
अब ग्रेटा थनबर्ग के साथ हिरासत में बदसलूकी के आरोप सामने आए हैं.
द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वीडिश विदेश मंत्रालय को भेजे गए एक ईमेल में कहा गया कि एक अधिकारी, जो हिरासत के दौरान ग्रेटा से मिलने पहुंचे थे, ने बताया कि ग्रेटा ने दावा किया है कि उन्हें एक ऐसी कोठरी में रखा गया था, जो खटमलों से भरी थी. उन्हें बहुत कम खाना और पानी दिया गया.
ईमेल में आगे कहा गया कि ग्रेटा को लंबे समय तक कठोर सतह पर बैठने के लिए मजबूर किया गया और जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया गया.
उनके साथ हिरासत में लिए गए एक अन्य कार्यकर्ता ने बताया कि ग्रेटा को जबरन इज़रायल का झंडा पकड़ने के लिए कहा गया और उनकी तस्वीरें खींची गईं. ग्रेटा को चिंता थी कि उनकी तस्वीरों का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है.
स्वीडिश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि इस दावे की पुष्टि फ्लोटिला के दो अन्य सदस्यों ने भी की, जिन्हें इज़रायली बलों ने हिरासत में लिया था और शनिवार को रिहा किया गया.

ग्रेटा के साथ दुर्व्यवहार के आरोप
तुर्की की एक अन्य कार्यकर्ता एरसिन सेलिक, ने बताया कि ग्रेटा को उनकी आंखों के सामने बाल पकड़कर घसीटा गया, अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया और जबरन इज़रायल का झंडा चूमने के लिए मजबूर किया गया. उन्हें एक उदाहरण के तौर पर पेश किया गया और चेतावनी दी गई.
दूसरी ओर, इज़रायली विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि हिरासत में लिए गए लोगों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें झूठी हैं.
बीबीसी के अनुसार, इस मामले को लेकर पहले इज़रायल के विदेश मंत्रालय ने बताया था कि इन नौकाओं को ‘सुरक्षित रूप से रोका गया’ और इनमें सवार लोगों को इज़रायल के एक बंदरगाह पर ले जाया गया है.
इज़रायल का कहना था कि नौकाओं को अपना रास्ता बदलने के लिए कहा गया था, क्योंकि वे ‘युद्ध क्षेत्र के पास’ जा रहे थे.
वहीं, ग्लोबल सुमुद फ्लोटिला (जीएसएफ़) ने इस कार्रवाई को ‘ग़ैरक़ानूनी’ करार देते हुए कहा था कि यह ‘रक्षा नहीं, बल्कि हताशा’ को दर्शाता है.
जीएसएफ़ ने आरोप लगाया है कि ग़ाज़ा की ओर जा रही उनकी एक नाव को इज़रायली नौसेना ने जानबूझकर टक्कर मारी और कुछ नौकाओं पर पानी की बौछार की गई.
संगठन का कहना है कि यह दिखाता है कि ग़ाज़ा की नाकेबंदी बनाए रखने के लिए इज़रायल ‘किसी भी हद तक जा सकता है’.
इज़रायल ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि फ़्लोटिला को पहले ही चेतावनी दी गई थी कि वह ‘क़ानूनी नौसैनिक नाकेबंदी’ का उल्लंघन कर रहा है.
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नौकाएं वास्तव में प्रतिबंधित क्षेत्र में दाख़िल हुई थीं या नहीं.
कई देशों ने इज़रायल की निंदा की
पाकिस्तान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, ब्राज़ील समेत कई देशों ने इज़रायल के इस कदम की कड़ी आलोचना की थी.
पाकिस्तानी के प्रधान मंत्री शहबाज़ शरीफ़ और विदेश मंत्रालय ने इस हमले की निंदा की है.
उन्होंने कहा कि इज़रायल ने 40 जहाजों वाले फ्लोटिला पर गलत हमला किया, जिसमें 450 से ज्यादा लोग मदद लेकर जा रहे थे.
शहबाज़ ने आगे कहा, ‘हम पकड़े गए लोगों की रिहाई और उनकी सुरक्षा की मांग करते हैं. उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे ग़ाज़ा के लोगों की मदद कर रहे थे. यह क्रूरता बंद होनी चाहिए.’
वहीं, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह हमला इज़रायल की ग़ाज़ा नाकाबंदी और आक्रामकता का हिस्सा है.
तुर्की ने इस कार्रवाई को आतंकवाद जैसा बताया और कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है. दक्षिण अफ्रीका ने संयम बरतने और बेड़े में शामिल निहत्थे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की.
ग्रीस और इटली ने इज़रायल से कहा कि फ्लोटिला में शामिल लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.
वहीं, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने फ्लोटिला से यात्रा रोकने की अपील करते हुए कहा कि इससे ग़ाज़ा शांति वार्ता को नुकसान पहुंच सकता है.
स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने कहा कि ये कार्यकर्ता इज़रायल के लिए कोई खतरा नहीं हैं और उम्मीद जताई कि इज़रायल भी इन्हें खतरे में नहीं डालेगा.
गौरतलब है कि इज़रायल ने ग़ाज़ा पहुंचने की कोशिश में ग्रेटा थनबर्ग को दूसरी बार हिरासत में लिया है. वे इससे पहले इस साल जून में यह कोशिश कर चुकी हैं. तब वे मेडलीन नाम के जहाज पर 11 लोगों के साथ ग़ाज़ा के लिए रवाना हुई थीं.
इज़रायल ने उनके जहाज को कब्जे में लेकर सभी 12 लोगों को हिरासत में ले लिया था. इसके बाद ग्रेटा और उनके साथियों को प्लेन में बैठाकर वापस भेज दिया गया था.
इज़रायली हमलों में अब तक कम से कम 66,055 लोग मारे जा चुके हैं
मालूम हो कि करीब दो साल पहले इज़रायली सेना ने गाज़ा में यह अभियान हमास के उस हमले के जवाब में शुरू किया था, जो 7 अक्तूबर 2023 को दक्षिण इसरायल में हुआ था.
इस हमले में क़रीब 1,200 लोग मारे गए और 251 को बंधक बना लिया गया था.
वहीं गाज़ा में हमास के नियंत्रण वाले स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, तब से इज़रायली हमलों में अब तक कम से कम 66,055 लोग मारे जा चुके हैं.
बीते रविवार को डोनाल्ड ट्रंप ने ह्वाइट हाउस में ग़ाज़ा शांति प्रस्ताव के तहत ने 20 सूत्रीय शांति योजना को ‘शांति के लिए एक ऐतिहासिक’ बताते हुए चेतावनी दी थी की अगर हमास इस योजना को स्वीकार नहीं करता है तो अमेरिका नेतन्याहू के साथ खड़ा होगा.
इस नए प्रस्ताव के मुताबिक़ गाज़ा में सैन्य कार्रवाई तुरंत रोकने की बात कही गई है. प्रस्ताव में ये भी कहा गया है कि जब तक बंदी बनाए गए लोगों और मृतकों के शवों की वापसी की शर्तें पूरी नहीं हो जातीं मौजूदा स्थिति बहाल रहेगी.
योजना के मुताबिक हमास अपने हथियार त्याग देगा, इसके साथ ही उसकी सुरंगें और हथियार बनाने के ठिकाने नष्ट कर दिए जाएंगे. गाज़ा के शासन में हमास की कोई भूमिका नहीं होगी. इसके तहत फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के लिए राह खुल जाएगी.
योजना में यह भी कहा गया है कि जैसे ही दोनों पक्ष इस प्रस्ताव पर सहमत होंगे, ‘गाज़ा पट्टी में तुरंत पूरी सहायता भेजी जाएगी.’
नई योजना में ट्रंप के पहले के बयानों से हटकर, यह भी कहा गया है कि फ़िलिस्तीनी लोगों को गाज़ा छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा.
प्रस्ताव में ट्रंप ने कहा है, ‘लोगों को वहीं रहने और बेहतर गाज़ा बनाने का अवसर दिया जाएगा.’
इस योजना में फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की संभावना के लिए दरवाज़ा खुला छोड़ा गया है.
इसके अलावा इस प्रस्ताव में एक नए बोर्ड ऑफ पीस और इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स का गठन भी शामिल है.
