दिल्ली: जब एक्यूआई मापने वाले यंत्र ही दम तोड़ दें; प्रदूषण की असली तस्वीर छुपाने का खेल

दीपावली की रात दिल्ली के 77% प्रदूषण मॉनिटर बंद हो गए थे. 39 में से 30 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों ने डेटा देना बंद कर दिया था. कई स्टेशनों ने रात भर डेटा नहीं दिया. जहां के डेटा उपलब्ध हैं, उनसे पता चलता है कि उस रात पीएम 2.5 का स्तर 1,700 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया था.

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21 अक्टूबर को दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में छायी धुंध और स्मॉग. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दीपावली की रात जब आतिशबाजी से दिल्ली का आसमान रोशन हो रहा था, तब धरती पर एक अजीब सन्नाटा पसरा हुआ था. यह सन्नाटा उन यंत्रों के थम जाने का था जिन पर शहर की सांस में जा रही हवा की गुणवत्ता को जांचने की जिम्मेदारी थी.

उस रात दिल्ली के 39 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से 30 यानी करीब 77 फीसदी बंद हो गए थे, जब शहर को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. जब प्रदूषण अपने चरम पर था, तब डेटा गायब था.

यह महज तकनीकी खामी नहीं, बल्कि एक ऐसा सवाल है जो सरकारी पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है.

जब मॉनिटरिंग स्टेशन सबसे जरूरी घड़ी में चुप हो गए

हिंदुस्तान टाइम्स के विश्लेषण के अनुसार, सोमवार की आधी रात से मंगलवार सुबह 11 बजे तक के महत्वपूर्ण 36 घंटों के दौरान महज 9 स्टेशन यानी शहर के कुल निगरानी नेटवर्क का मात्र 23 फीसदी ही लगातार डेटा दे पाए. बाकी स्टेशनों में एक से लेकर नौ घंटे तक की ब्लैकआउट दर्ज की गई.

द्वारका सेक्टर 8 में स्थिति सबसे खराब रही, जहां 36 में से महज 27 घंटों का डेटा उपलब्ध था. जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नेहरू नगर, पटपड़गंज और आरके पुरम के मॉनिटरिंग स्टेशनों ने करीब आठ घंटों की रीडिंग गंवा दी.

चार अन्य स्टेशनों ने सिर्फ एक घंटे का डेटा खोया, लेकिन 10 महत्वपूर्ण निगरानी बिंदुओं पर छह घंटे या उससे अधिक समय का डेटा उपलब्ध नहीं है, यानी वह अवधि जब आतिशबाजी से निकलने वाला उत्सर्जन आमतौर पर चरम पर होता है.​​

हर साल दीपावली के दौरान जब प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, तो कई निगरानी स्टेशन डेटा देना बंद कर देते हैं. यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था एक निश्चित सीमा से ऊपर के प्रदूषण भार को संभालने में असमर्थ है.​ (फोटो: पीटीआई)

जहां के डेटा उपलब्ध, वहां की स्थिति तस्वीर भयावह

जहां के डेटा उपलब्ध हैं, वहां की तस्वीर चौंकाने वाली है. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के मंदिर मार्ग स्टेशन ने आधी रात को पीएम2.5 की सांद्रता 1,066 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की, उसके बाद रात 1 बजे से सुबह 4 बजे तक यह स्टेशन ऑफलाइन रहा.

नेहरू नगर में, जो दिल्ली का दीपावली की रात सबसे प्रदूषित स्टेशन था, पीएम2.5 का स्तर रात 10 बजे 1,763 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया, लेकिन यह स्टेशन भी रात 1 बजे से सुबह 5 बजे तक चार घंटे ऑफलाइन रहा.

आरके पुरम में पीएम2.5 का स्तर आधी रात के आसपास 1,476 तक पहुंच गया. अजीब बात यह है कि इस स्टेशन का डेटा डीपीसीसी की वेबसाइट से पांच घंटे के लिए गायब हो गया. सुबह 6 बजे तक डेटा फिर से दिखाई देने लगा, लेकिन इस बार डेटा था- 1,187 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर.

इसी तरह सीपीसीबी के आईटीओ स्टेशन ने रात 1 बजे 923 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया, लेकिन अगले छह घंटों का डेटा गायब था. एनएसआईटी द्वारका में आधी रात से सुबह 5 बजे तक पीएम10 की रीडिंग गायब हो गई, और आईएमडी के आयनगर स्टेशन ने पीएम10 और पीएम2.5 दोनों के पांच घंटे का डेटा खो दिया.​

क्या डेटा छिपाया जा रहा है?

यह समस्या नई नहीं है. हर साल दीपावली के दौरान जब प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, तो कई निगरानी स्टेशन डेटा देना बंद कर देते हैं. यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था एक निश्चित सीमा से ऊपर के प्रदूषण भार को संभालने में असमर्थ है.​

एनवायरोकैटलिस्ट्स थिंक टैंक के संस्थापक और प्रमुख विश्लेषक सुनील दहिया ने कहा, ‘देखे गए पैटर्न से पता चलता है कि अधिकांश स्टेशनों ने 1,000 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के आसपास पहुंचते ही डेटा देना बंद कर दिया, जबकि आनंद विहार, नेहरू नगर, मुंडका जैसे स्टेशन ऐसे भी थे जिन्होंने 1,000 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर के मान दर्ज किए. इससे साफ है कि तकनीक की उपलब्धता कम से कम मुद्दा नहीं है. हमने पिछले कई वर्षों से यह देखा है.’​

दहिया ने कहा कि यह डेटा छुपाना नहीं है, बल्कि एक तकनीकी सीमा है कि कुछ स्टेशन एक निश्चित सीमा से परे पूर्ण और सटीक डेटा रिकॉर्ड नहीं कर पाते. उन्होंने स्टेशनों को उचित रूप से अपग्रेड करने की मांग की.

सीपीसीबी बनाम आईक्यू एयर (IQAir): एक ही शहर के दो तरह के डेटा

इन सब के बीच एक और विवाद खड़ा हो गया जब अंतरराष्ट्रीय ऐप्स जैसे IQAir ने दिल्ली के लिए 2,000 से अधिक एक्यूआई दिखाया, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 400 से कम आंकड़े बताए.

उदाहरण के लिए, दीपावली की रात 12:30 बजे सीरी फोर्ट में सीपीसीबी ने एक्यूआई 272 दर्ज किया, जबकि IQAir ने 2,449 की रिपोर्ट की. यह भारी अंतर दिल्ली के निवासियों को अवाक कर देने वाला था.

इस विसंगति से दिल्ली-एनसीआर में वास्तविक एक्यूआई को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सीपीसीबी और IQAir दोनों के आंकड़े तकनीकी रूप से सही हैं, क्योंकि वे विभिन्न माप विधियों और पैमानों का उपयोग करते हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के पूर्व अतिरिक्त निदेशक डॉ. मोहन पी जॉर्ज ने बताया कि भारत का एक्यूआई छह मुख्य मापदंडों पर आधारित है: पीएम2.5, पीएम10, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड, जिसका पैमाना 0 से 500 तक है. 400 से ऊपर की किसी भी चीज को ‘गंभीर’ माना जाता है.

मंगलवार को राष्ट्रपति भवन के नज़दीक स्मॉग कम करने के लिए पानी का छिड़काव किया गया. (फोटो: पीटीआई)

इसके विपरीत, IQAir अमेरिकी मॉडल का अनुसरण करता है, जिसका सूचकांक 0 से 500 तक है, लेकिन 500 से ऊपर के आंकड़ों को अत्यंत खतरनाक के रूप में रिपोर्ट करता है. भारत में 500 से आगे के स्तर को ‘व्यावहारिक रूप से बेकार’ माना जाता है क्योंकि वे पहले से ही गंभीर स्वास्थ्य खतरों का संकेत देते हैं.​

विशेषज्ञों का मानना है कि मतभेदों के बावजूद, दोनों प्लेटफॉर्म दिल्ली की वायु गुणवत्ता की भयावह स्थिति को उजागर करते हैं, जो पीएम2.5 के स्तर को खतरनाक सीमा से बहुत ऊपर दिखाते हैं. चाहे एक्यूआई 400 हो या 2000, निष्कर्ष स्पष्ट है: दिल्ली की हवा खतरनाक रूप से प्रदूषित है.

आतिशबाजी का योगदान: 30-40 फीसदी प्रदूषण

टाइम्स ऑफ इंडिया ने विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि दीपावली पर आतिशबाजी के उत्सर्जन ने शहर के प्रदूषण में 30 से 40 फीसदी तक का योगदान दिया हो सकता है, शांत मौसम की स्थिति ने मुख्य रूप से प्रभाव को बदतर बनाया और रिकवरी में देरी की.

सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) के संस्थापक और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (NIAS) के चेयर प्रोफेसर गुफरान बेग के अनुसार, डेटा के प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि सोमवार रात 9 बजे से मंगलवार सुबह 5 बजे के बीच प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा.

बेग ने कहा, ‘दिल्ली बेहतर एक्यूआई दर्ज कर सकती थी अगर आतिशबाजी को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया गया होता.’​

एनवायरोकैटलिस्ट्स द्वारा पर्यावरण शोधकर्ता सुनील दहिया के नेतृत्व में किए गए डेटा विश्लेषण में भी इसी तरह के रुझान मिले. समूह ने पाया कि दीपावली की रात प्रदूषण का स्तर पिछले दिनों की शाम के स्तर से सात से आठ गुना अधिक बढ़ गया, जो पीएम2.5 के 650 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक पर पहुंच गया, राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक से 11 गुना से अधिक और डब्लूएचओ की दैनिक दिशानिर्देश से 67 गुना.

दहिया ने कहा, ‘दीपावली की रात, प्रति घंटा औसत सांद्रता लगभग 500 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ गई, जो लगभग पूरी तरह से पटाखों के फटने के कारण थी.’

वायु प्रदूषण और स्मॉग केवल दिल्ली शहर तक सीमित नहीं हैं. नोएडा का आसमान भी धुंध से ढका हुआ है. (फोटो: पीटीआई)

दिल्ली की सबसे शोर भरी दीपावली: 23 में से 26 स्टेशनों ने सीमा तोड़ी

प्रदूषण के साथ-साथ दिल्ली ने इस साल पिछले तीन वर्षों की तुलना में सबसे शोर भरी दीपावली भी देखी. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के रीयल-टाइम डेटा से पता चला कि शहर भर में 26 सक्रिय ध्वनि निगरानी स्टेशनों में से 23 ने निर्धारित मानकों से ऊपर ध्वनि स्तर दर्ज किया. 2024 में ऐसे 22 स्टेशन और 2023 में 13 थे.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, दिल्ली के ध्वनि निगरानी स्टेशनों को चार क्षेत्रों में विभाजित किया गया है- साइलेंस जोन, आवासीय जोन, वाणिज्यिक जोन और औद्योगिक जोन. साइलेंस जोन में रात को अधिकतम अनुमेय सीमा 40 dB(A) से लेकर औद्योगिक क्षेत्रों में 70 dB(A) तक है.

सबसे ज्यादा आतिशबाजी का शोर रात 9 से 11 बजे के बीच था, लेकिन कई जगहों पर आधी रात के बाद भी उच्च रीडिंग जारी रही. यहां तक कि साइलेंस जोन, जहां सख्त सीमाएं लागू होनी चाहिए, वहां भी शांत नहीं थी.​

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और ज़मीनी हकीकत

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को दिल्ली-एनसीआर में ‘परीक्षण के आधार पर’ ग्रीन पटाखों की बिक्री और उपयोग की अनुमति दी थी. कोर्ट ने निर्देश दिया था कि पटाखे केवल सुबह 6 से 7 बजे और शाम 8 से 10 बजे के बीच, दिवाली से एक दिन पहले और दिवाली के दिन ही फोड़े जा सकते हैं.

कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी थी कि दिल्ली-एनसीआर से बाहर से कोई पटाखे नहीं लाया जाना चाहिए और केवल NEERI द्वारा प्रमाणित ग्रीन पटाखे ही अनुमति होंगे. कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर नकली पटाखे पाए गए तो विक्रेता का लाइसेंस निलंबित कर दिया जाएगा.​

हालांकि, जमीनी हकीकत अलग रही. सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशानिर्देशों के बावजूद, रात 10 बजे के बाद भी कई इलाकों में पटाखे फोड़े गए और ध्वनि प्रदूषण के आंकड़े बताते हैं कि समय सीमा का पालन नहीं किया गया.

पर्यावरण मंत्री का दावा: ‘सभी डेटा उपलब्ध है’

गायब डेटा के दावों के बीच, दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इससे इनकार किया और कहा, ‘सभी डेटा सीपीसीबी और डीपीसीसी की वेबसाइटों पर उपलब्ध है. जो लोग अन्यथा दावा करते हैं, उनके अपने उद्देश्य हैं.’

हालांकि, सीपीसीबी, डीपीसीसी और कमिशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट ने इस मुद्दे पर कोई सफाई नहीं पेश की है.

पारदर्शिता पर सवाल

दिल्ली की वायु गुणवत्ता निगरानी व्यवस्था की यह विफलता महज तकनीकी समस्या नहीं है. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य डेटा की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाती है. जब 77 फीसदी मॉनिटरिंग स्टेशन सबसे जरूरी घड़ी में काम करना बंद कर दें, जब अलग-अलग एजेंसियां अलग-अलग आंकड़े पेश करें, और जब सरकार डेटा गायब होने की समस्या से इनकार करे, तो जाहिर है कि व्यवस्था में कुछ गड़बड़ है.

यह सिर्फ आंकड़ों का सवाल नहीं है, यह जन स्वास्थ्य, आपातकालीन हस्तक्षेप और दीर्घकालिक नीति निर्माण का सवाल है. बिना विश्वसनीय डेटा के, दोनों अल्पकालिक हस्तक्षेप और दीर्घकालिक योजना अंदाजे पर आधारित हो जाते हैं.

20 अक्टूबर को स्मॉग से घिरा इंडिया गेट. (फोटो: पीटीआई)

जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनका शहर कितना प्रदूषित है, और यह जानकारी छुपाना या तकनीकी सीमाओं के पीछे छिपना लोकतांत्रिक जवाबदेही के खिलाफ है. अगर निगरानी तंत्र 1,000 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर के प्रदूषण को नहीं माप सकता, तो उसे तुरंत अपग्रेड किया जाना चाहिए न कि इस तथ्य को छुपाया जाना चाहिए.