गुजरात हाईकोर्ट ने संजीव भट्ट के जेल बदलने पर रोक लगाने की याचिका ख़ारिज की

गुजरात के पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की पत्नी गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने पति को पालनपुर जेल से स्थानांतरित किए जाने से रोकने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि भट्ट को जेल स्थानांतरण की मांग करने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है. हिरासत का स्थान प्रशासन द्वारा हिरासत प्राधिकारी के चयन का मामला है.

**FILE** New Delhi: In this file photo dated October 01, 2011, shows suspended IPS officer Sanjiv Bhatt being produced in the court, in Ahmadabad. According to the officials, Bhatt was arrested on Wednesday, Sept 05, 2018, by the Gujarat CID in connection with a 22-year-old case of alleged planting of drugs to arrest a man. (PTI Photo) (PTI9_5_2018_000267B)
पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट. (फाइल फोटो: पीटीआई)

पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी संजीव भट्ट की कानूनी मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं. अब गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी पत्नी की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्हें पालनपुर के अलावा किसी अन्य जेल में स्थानांतरित करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी.

आईआईटी मुंबई से स्नातक और गुजरात के आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट एक लंबे कानूनी विवाद के केंद्र में रहे हैं, जिसमें कई गंभीर आरोप, आधिकारिक बर्खास्तगी, सेवा से निष्कासन और कई आपराधिक दोषसिद्धि शामिल हैं.

अब गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी पत्नी श्वेता भट्ट की एक याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने अपने पति को पालनपुर जेल से स्थानांतरित होने से रोकने की मांग की थी. अदालत ने कहा कि भट्ट को जेल स्थानांतरण की मांग करने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है.

भट्ट को जामनगर सत्र न्यायालय ने 20 जून, 2019 को हिरासत में मौत के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. वह जामनगर जेल में बंद थे. बाद में एनडीपीएस के एक मुकदमे के दौरान बनासकांठा सत्र न्यायालय ने 27 मार्च, 2024 को उन्हें दोषी ठहराया.

एनडीपीएस मुकदमे के दौरान भट्ट को पालनपुर जेल में रखा गया था. उनकी पत्नी को डर था कि अधिकारी उन्हें किसी अन्य जेल में स्थानांतरित कर सकते हैं, जिसके कारण उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की.

राज्य ने अदालत को बताया कि सरकारी नियमों के अनुसार, भट्ट को राजकोट केंद्रीय जेल में आजीवन कारावास की सजा काटनी होगी. जामनगर जिले के कैदियों को नियमित रूप से वहां रखा जाता है. राज्य ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता को स्थानांतरण की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है.

वाइब्स ऑफ इंडिया के अनुसार, अदालत ने कहा, ‘इस अदालत का यह सुविचारित मत है कि याचिकाकर्ता के पति को जेल स्थानांतरण की मांग करने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है. यदि हम याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दी गई दलीलों को स्वीकार करते हैं, तब भी अपील लंबित रहने तक कैदी का स्थानांतरण नहीं किया जाना चाहिए.’

अदालत ने कहा, ‘अतः, उपरोक्त के मद्देनजर नियम 9 याचिकाकर्ता के पति के लिए कोई सहायता प्रदान नहीं करेगा… हिरासत का स्थान प्रशासन द्वारा हिरासत प्राधिकारी के चयन का मामला है… उसे राजकोट सेंट्रल जेल में हिरासत में रखा जाना आवश्यक है और वह राजकोट जेल में बंद है.’

अदालत ने कहा कि भट्ट को अस्थायी रूप से पालनपुर जेल इसलिए भेजा गया क्योंकि वह एनडीपीएस मामले में विचाराधीन कैदी थे. उस मुकदमे की सुनवाई समाप्त होने के बाद वह अपनी आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए राजकोट जेल लौट गए.

अदालत ने कहा, ‘इसलिए, उपरोक्त तथ्यों पर विचार करते हुए… राज्य के आदेश में कोई मनमानी या दुर्भावना नहीं दिखती… दोषी/कैदी को किसी विशेष स्थान या जेल में रहने या हिरासत में रखने की मांग करने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है.’

भट्ट के तबादले पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई. अदालत ने नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक अधिकारों का हवाला दिया.

भट्ट और कांस्टेबल वजुभाई चौ, जिनके खिलाफ उनकी मृत्यु के बाद मामला समाप्त कर दिया गया था, पर नारन जाधव नामक व्यक्ति की शिकायत पर भारतीय दंड संहिता की धारा 330 और 324 के तहत आरोप लगाए गए थे, जिसमें कहा गया था कि आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (टाडा) और शस्त्र अधिनियम के मामले में कबूलनामा करवाने के लिए पुलिस हिरासत में उन्हें शारीरिक और मानसिक यातना दी गई थी.

संजीव भट्ट गुजरात कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं. मोदी सरकार ने उन्हें निशाने पर लिया है क्योंकि उन्होंने तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर 2002 के दंगों में उनकी संलिप्तता का आरोप लगाया था.

हलफनामे में संजीव भट्ट ने कहा कि वह (भट्ट) एक बैठक में शामिल हुए थे, जिसमें मोदी ने कथित तौर पर शीर्ष पुलिस अधिकारियों से हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ अपना गुस्सा निकालने देने का आग्रह किया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल ने निष्कर्ष निकाला कि भट्ट ऐसी किसी बैठक में शामिल नहीं हुए थे और उनके आरोपों को खारिज कर दिया.

2015 में भट्ट को ‘अनधिकृत अनुपस्थिति’ के आधार पर पुलिस सेवा से हटा दिया गया था. अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार द्वारा उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की भट्ट की याचिका को खारिज कर दिया. अदालत ने इन मामलों में उनके मुकदमे पर लगी रोक हटा दी और उन्हें अभियोजन का सामना करने का आदेश दिया.

अदालत ने कहा, ‘भट्ट प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ सक्रिय संपर्क में थे, गैर-सरकारी संगठनों द्वारा उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा था, वे राजनीति और दबाव बनाने की सक्रियता में शामिल थे, यहां तक कि इस अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ, न्यायमित्र और कई अन्य लोगों पर भी.’

20 जून, 2019 को उन्हें 1990 के हिरासत में मौत के एक मामले में गुजरात के जामनगर जिले की सत्र अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. 27 मार्च, 2024 में भट्ट को पालनपुर सत्र न्यायालय ने ड्रग तस्करी के एक मामले में दोषी ठहराया.

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