केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- ओडिशा में खनन के लिए कोई सीमा तय कर देने से विकास को हानि होगी

अवैध खनन का हवाला देते हुए ओडिशा में खनन पर सीमा लगाने संबंधी याचिका के जवाब में केंद्र और ओडिशा सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि राज्य में लौह अयस्क खनन पर सीमा लगाने से भारत के विकास की गति बाधित होगी और आत्मनिर्भर भारत का सपना चकनाचूर हो जाएगा.

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले में एक लौह अयस्क खान (फोटो साभार: Thriveni.com)

नई दिल्ली: केंद्र और ओडिशा सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ओडिशा में लौह अयस्क खनन पर सीमा लगाने से भारत के विकास की गति बाधित होगी और आत्मनिर्भर भारत का सपना चकनाचूर हो जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर कर्नाटक और गोवा में लगाई गई सीमा, के समान खनन पर सीमा लगाने संबंधी एक याचिका पर विचार कर रहा है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दो केंद्रीय मंत्रालयों- खान मंत्रालय (एमओएम) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने अदालत को बताया कि 2013 में कर्नाटक और उसके बाद गोवा में लौह अयस्क खनन पर सीमा लगाने के बाद से हालात बदल गए हैं.

उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक में अदालत द्वारा चिह्नित अवैध खनन, जो मौजूदा कानूनों का उल्लंघन है, को रोकने के लिए कड़े नियामक नियंत्रण और कानूनी सुरक्षा उपाय लागू किए जा रहे हैं.

ज्ञात हो कि ओडिशा वर्तमान में देश के लौह अयस्क उत्पादन में आधे का योगदान देता है. केंद्र ने तर्क दिया कि लाखों टन अयस्क निकाले जाने के बावजूद राज्य में संसाधनों में 133% की वृद्धि हुई है, जो 2000 में 418 करोड़ टन से बढ़कर 2023 में 9737.24 करोड़ टन हो गया है. आने वाले वर्षों में इस संसाधन आधार में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है.

खान मंत्रालय ने कहा है कि राज्य में लौह अयस्क के संभावित क्षेत्र का 71.52% भूगर्भीय अन्वेषण अभी बाकी है.

सरकार ने कहा कि लौह अयस्क या मैंगनीज निष्कर्षण पर किसी भी प्रकार की सीमा लगाने से इस्पात उत्पादन प्रभावित होगा. उन्होंने स्पष्ट किया, ‘भारत वर्तमान में उच्च विकास पथ पर अग्रसर है, जिसका समग्र उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में व्यापक सुधार लाना है. अपनी विकास क्षमता का पूर्ण दोहन करने के लिए देश को हवाई अड्डों, रेलवे, पुलों, बंदरगाहों, रियल एस्टेट, विनिर्माण आदि जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता है. इन सभी में इस्पात का स्वदेशी उत्पादन अत्यंत महत्वपूर्ण होगा.’

एक अलग हलफनामे में ओडिशा सरकार ने कहा, ‘हर उद्योग (रक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ऑटोमोबाइल, आदि) इस्पात उत्पादन पर निर्भर है, जो लगातार बढ़ रहा है. लौह अयस्क खनन पर सीमा लगाने से इस्पात और अन्य धातुओं के उत्पादन में भारी कमी आएगी. आत्मनिर्भर भारत का सपना खनिज उत्पादन पर निर्भर है, जो अनुचित सीमा लगाने से विफल हो जाएगा.’

केंद्र ने अदालत को आगे बताया कि संरक्षण का अर्थ खनिजों के खनन पर प्रतिबंध या सीमा लगाना नहीं है. केंद्र ने कहा, ‘इसे देश की विकास आवश्यकताओं, संसाधन या भंडार वृद्धि और पुनर्चक्रण की क्षमता को ध्यान में रखते हुए समग्र रूप से समझा जाना चाहिए. इन सभी मानकों पर आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि ओडिशा में लौह अयस्क के उत्पादन पर कोई सीमा लगाने की आवश्यकता नहीं है.’

यह हलफनामा शीर्ष अदालत द्वारा पारित एक आदेश के जवाब में आया है, जो गैर-लाभकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर एक याचिका की जांच कर रहा है, जिसने कर्नाटक और गोवा में बड़े पैमाने पर अवैध खनन के पूर्व उदाहरणों के आधार पर ओडिशा में खनन पर सीमा लगाने की वकालत की है.

कोर्ट ने अवैध खनन पट्टाधारकों से मुआवज़ा वसूली में देरी पर ओडिशा सरकार को फटकार लगाई

अधिवक्ता प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेवा के नेतृत्व में याचिकाकर्ता ने बताया कि अगस्त 2017 में शीर्ष अदालत ने ओडिशा में तय सीमा से अधिक लौह अयस्क खनन करने वाले खनिकों से मुआवज़ा वसूलने का निर्देश दिया था. भूषण ने कहा कि राज्य 2,700 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वसूलने में विफल रहा है.

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 2017 में पारित आदेश के बावजूद मुआवज़े की राशि वसूल न करने पर राज्य को फटकार लगाई.

पीठ ने राज्य को निजी खनिकों से बकाया राशि वसूलने के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में बताने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया. खनन पर सीमा के संबंध में न्यायालय ने मामले को जनवरी में विचार के लिए सूचीबद्ध किया और कॉमन कॉज और न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता एडीएन राव को दोनों हलफनामों पर जवाब देने की अनुमति दी.

खान मंत्रालय के अलावा और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी अदालत को बताया कि ओडिशा में लौह अयस्क का उत्पादन 159.22 मिलियन टन है, जबकि ओडिशा में लौह अयस्क खदानों के लिए स्वीकृत पर्यावरणीय वहन क्षमता (ईसीसी) 2024-25 तक 272.98 मिलियन टन है. इस प्रकार, इसने कहा कि वास्तविक उत्पादन ईसीसी द्वारा स्वीकृत क्षमता से काफी कम है.