क्या इंदिरा गांधी को बस तानाशाह की छवि में सीमित कर देना सही है

इंदिरा गांधी को आम तौर पर उनके बड़े फैसलों, करिश्मों और कीर्तिमानों आदि की रोशनी में 'आयरन लेडी' या कि तानाशाह की छवि को मजबूत करने वाले आईने में ही देखा जाता है, जबकि उन्हें उनके दैनंदिन जीवन के छोटे-छोटे फैसलों के आईने में देखना भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है.

कई बार इंदिरा गांधी के छोटे-छोटे फैसलों में उनके व्यक्तित्व की ऐसी छिपी हुई परतें उभरकर आती हैं, जो न सिर्फ हमें चौंकातीं, बल्कि चमत्कृत करके भी रख देती हैं. (फोटो साभार: फेसबुक/राहुल गांधी)

देश की पहली (और अब तक की एकमात्र) महिला प्रधानमंत्री, जो श्रीलंका की सिरिमाओ भंडारनायके के बाद दुनिया की दूसरी महिला प्रधानमंत्री थीं. 1977 में जिन्होंने अपने पद पर रहते हुए लोकसभा चुनाव में न सिर्फ सत्ता बल्कि रायबरेली की अपनी सीट तक हार जाने का अब तक अटूट राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. इससे पहले वे देश की एकमात्र ऐसी प्रधानमंत्री भी बन चुकी थीं, सरकारी अधिकारियों व संसाधनों के दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिसका चुनाव अवैध घोषित कर दिया था.

तब पद से इस्तीफा देने की बढ़ती मांगों के बीच आंतरिक सुरक्षा को खतरे के बहाने देश पर इमरजेंसी थोपकर देशवासियों के प्रायः सारे नागरिक अधिकार छीन लेने का उनका कदम भी ‘अभूतपूर्व’ ही था.

हां, इससे भी पहले 19 जुलाई, 1969 को उन्होंने 14 बड़े निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसा ‘क्रांतिकारी’ कदम उठाकर तहलका मचा दिया था और दो साल बाद 1971 में संविधान में 26वें संविधान संशोधन की मार्फत राजाओं-महाराजाओं के उस प्रिवीपर्स का खात्मा कर डाला था, आजादी के बाद जिसकी एवज में वे अपनी रियासतों के भारत में एकीकरण के सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सहमत हुए थे.

फिर इस प्रधानमंत्री ने इसी साल दृढ़ संकल्प के साथ पाकिस्तान को चुनौती देकर उसके कोई एक लाख सैनिकों से आत्मसमर्पण कराया और उसके पूर्वी हिस्से का स्वतंत्र बंगलादेश के रूप में उदय करा दिया.

इंदिरा गांधी, जिनका आज शहादत दिवस है, को उनकी निर्मम हत्या के चार दशकों बाद भी आम तौर पर उनके इस तरह के बड़े फैसलों, करिश्मों और कीर्तिमानों आदि के उनकी लौह महिला या कि तानाशाह की छवि को मजबूत करने वाले आईने में ही देखा जाता है, जबकि उन्हें उनके दैनंदिन जीवन के छोटे-छोटे फैसलों के आईने में देखना भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है.

कई बार इन छोटे-छोटे फैसलों में लौह महिला या तानाशाह के बरक्स उनके व्यक्तित्व की कई ऐसी छिपी हुई चमकीली परतें उभरकर सामने आती हैं, जो न सिर्फ हमें चौंकातीं, बल्कि चमत्कृत करके भी रख देती हैं.

‘पागलपन’ से परे

इसकी एक बड़ी मिसाल 1984 का वह छोटा-सा वाकया है, जो तब घटित हुआ, जब प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल यूरी एल्डोखिन के साथ मिलकर फिल्म्स डिवीजन ऑफ इंडिया, रूस के सेंटर-नौच-फिल्म स्टूडियोज और सोविन फिल्म्स के लिए पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जीवन पर ‘नेहरू’ शीर्षक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे थे.

एक दिन वे इंदिरा गांधी के कक्ष में इस फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो बहुत उत्साहित होकर उनसे कहा कि वे चाहते हैं कि फिल्म में उन्हें कक्ष की एक दीवार पर लगी नेहरू की तस्वीर की गर्द साफ करती दिखाएं. उनका मानना था कि इससे नेहरू के प्रति इंदिरा का लगाव कुछ इस तरह प्रदर्शित होगा, जो दर्शकों को इमोशनल कर देगा. उनसे सहमत इंदिरा फौरन शूटिंग के लिए तैयार हो गईं, तो बेनेगल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

लेकिन वे बहुत निराश हुए, जब उन्होंने किसी कर्मचारी से एक झाड़न मंगाई और उससे उक्त तस्वीर साफ करने लगीं. उन्हें ऐसा करती देख बेनेगल बहुत निराश हुए क्योंकि वे चाहते थे कि वे तस्वीर को अपनी साड़ी के पल्लू से साफ करें ताकि उनका उससे लगाव ज्यादा आत्मीय दिखे. लेकिन उन्होंने बेनेगल को यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि फिल्म बनाते-बनाते पागल मत बनिए, मुझे गर्द से कोई लगाव नहीं है. बेनेगल को इसका कोई जवाब नहीं सूझा।

बाद में इसी फिल्म ने 32वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक पुनर्निर्माण और संकलन फिल्म का पुरस्कार जीता.

कार्यकर्ता बनाम आम लोग

इसी 1984 का ही एक और वाकया है. जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकवादियों ने ब्रिटेन के बर्मिंघम में भारतीय राजनयिक रविन्द्र म्हात्रे का अपहरण कर उन्हें मार डाला. क्योंकि इंदिरा की सरकार ने उनके बदले दस लाख रुपयों की फिरौती देने और फ्रंट के संस्थापक अलगाववादी मकबूल भट्ट को रिहा करने की उनकी मांग मानने से इनकार कर दिया.

6 फरवरी, 1984 को म्हात्रे का शव बर्मिंघम की एक गली में पाया गया था और उनको न बचा पाने को लेकर इंदिरा गांधी और उनकी सरकार की बहुत लानत-मलामत की गई थी. कुछ अरसे बाद इंदिरा गांधी मुंबई में म्हात्रे के घर जाकर उनकी पत्नी से मिलीं और उनसे उनके पति की जान नहीं बचा पाने के लिए माफी मांगी. साथ ही वादा किया कि जब तक उनके स्कूल में पढ़ रहे दोनों बच्चे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते, वे निजी तौर पर उनका खर्च उठाएंगी. उन्होंने इस मुलाकात में अपने साथ उनके घर गए लोगों को सख्ती से ताकीद की कि वे उनके इस वादे का न प्रचार करें, न ही उन्हें इसका श्रेय दिलाना चाहें.‌

इससे पहले का वाकया और भी दिलचस्प है. वे म्हात्रे के घर जा रही थीं तो देखा कि एक आम-सी दिखने वाली महिला उनके स्वागत में सड़क पर हाथ में फूलों की माला लिए खड़ी है. इस पर उन्होंने आगे निकल चुका अपना काफिला रुकवाया और कार से उतरकर उसके पास जाने लगीं. इस पर सुरक्षाकर्मियों ने रोका तो बोलीं, ‘वह मुझसे मिलने के लिए बहुत देर से तेज धूप में खड़ी होगी. मुझे उससे मिलना चाहिए.’

लेकिन उसके पास पहुंचीं तो उसी की जबानी उनको पता चला कि वह कोई आम महिला न होकर कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता है. फिर तो वे इतनी नाराज हुईं कि उससे माला लेने तक से इनकार कर दिया और चेतावनी भी दी कि वह आगे कभी फिर ऐसा न करे! उससे कहा कि तुम तो कार्यकर्ता के तौर पर मुझसे दूसरे किसी मौके पर भी मिल सकती हो. ऐसा कदम तो उनको ही उठाना चाहिए जिन्हें लगे कि उनके मुझ तक पहुंचने के दूसरे सारे रास्ते बंद हैं.

नेताओं द्वारा आम लोगों पर पार्टी कार्यकर्ताओं को तरजीह देने के आज के दौर में यह वाकया मिसाल है कि वे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर उन आम लोगों को प्राथमिकता देती थीं, जो साधन और पहुंच के अभाव में उनसे अपनी बात कहने के लिए इस उम्मीद में सड़क के किनारे खड़े रहते थे कि वे मिलेंगी तो उनकी समस्याओं का समाधान कर देंगी.

अशोभन हमलों के विरुद्ध

1966 में लालबहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद वे पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें विपक्षी दलों और नेताओं की ओर से अनेक अशोभन और व्यक्तिगत हमले झेलने पड़े. इनमें से कई में उनके महिला होने को भी निशाने पर लिया गया. ऐसे हमलावरों में उनके पुरखे भी शामिल थे, जो आज प्रधानमंत्री पद के तथाकथित सम्मान को लेकर कुछ ज्यादा ही ‘सतर्क’ रहते हैं.

देश के पहले, अंतिम और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी (जिन्होंने 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाकर नई राजनीति शुरू की थी) ने तो इंदिरा गांधी के शपथ ग्रहण के बाद ही यह टिप्पणी करके चौंका दिया था कि ‘अब हमें हर सुबह अख़बारों के पहले पन्ने पर एक खूबसूरत महिला की तस्वीर देखने को मिलेगी.’

सोचिए जरा, क्या अर्थ था इसका? लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी. समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने उनको ‘गूंगी गुड़िया’ करार दिया तो जल्दी ही विपक्ष के ज्यादातर नेताओं ने उसकी रट लगानी शुरू कर दी. लेकिन ऐसी टिप्पणियां करने वालों से निपटने का इंदिरा गांधी का अपना ही तरीका था, जिससे सांप भी मर जाता था और लाठी भी साबुत बची रहती थी. न टिप्पणी उन पर चस्पां हो पाती थी, न ही उन्हें करने वाले हीरो बन पाते थे.

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि उनको महिला होने के कारण अपने पद के दायित्व निभाने में असुविधा के बजाय बहुत सुविधा होती है.
यों, काम के वक्त वे खुद को महिला समझती ही नहीं हैं. एक बार उनके एक मंत्री ने कथित रूप से उनके साथ कुछ ज्यादा छूट लेने की कोशिश में उनके ‘सलीके और सुंदरता’ की ‘तारीफ’ कर दी तो उन्होंने बिना कुछ कहे कुछ दिनों बाद उनकी छुट्टी करके सारा बखेड़ा खत्म कर दिया था.

यों, वक्त-वक्त पर कई सदाशयी टिप्पणियां भी उनके हिस्से आईं. 1971 में पाकिस्तान से युद्ध की तैयारियों के दौर में तत्कालीन सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ ने उनके बालों की सुंदरता की तारीफ करते हुए उन्हें ‘स्वीटी’ कहा था. इससे पहले गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में उनके अध्ययनकाल में एक साक्षात्कार के दौरान उन्हें प्रियदर्शिनी नाम दिया, तो इसे उनके नाम में जोड़कर ‘इंदिरा’ के तुरंत बाद लिखने लगे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)