सुप्रीम कोर्ट में उमर खालिद व अन्य की ज़मानत पर सुनवाई, वकील बोले- आपराधिक न्याय प्रणाली का पतन

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 अक्टूबर) को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में साल 2020 में हुए दंगों की तथाकथित ‘बड़ी साज़िश’ के मामले में अभियुक्त उमर ख़ालिद, शरजील इमाम और गुलफ़िशा फ़ातिमा की ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई की. ये तीनों ही इस मामले में बिना ट्रायल के पांच साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: संतोषी मरकाम/द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 अक्टूबर) को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में साल 2020 में हुए दंगों की तथाकथित ‘बड़ी साज़िश’ के मामले में अभियुक्त उमर ख़ालिद, शरजील इमाम और गुलफ़िशा फ़ातिमा की ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई की. इन सभी पर दिल्ली पुलिस ने 2020 के दिल्ली दंगों की योजना बनाने और उसे अंजाम देने का आरोप लगाया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपियों के वकीलों ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में ज़मानत के लिए अपनी दलीलें रखीं. ये तीनों ही इस मामले में बिना ट्रायल के पांच साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं.

इस संबंध में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ के समक्ष पेश हुए याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि उनका फरवरी 2020 में राजधानी में हुई हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है, जिसमें 50 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

उन्होंने यह भी कहा कि उनके सभी मुवक्किल पांच साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं.

पुलिस ने इस मामले की विवादास्पद एफआईआर संख्या 59 में दंगा, राजद्रोह, हत्या और दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद-रोधी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धाराएं भी लगाई हैं.

मालूम हो कि खालिद और अन्य ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2 सितंबर को ज़मानत देने से इनकार करने के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ किया है.

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार को करेगी

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने मामले की सुनवाई सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी है. अदालत इस दिन सह-आरोपी मीरान हैदर, मोहम्मद सलीम खान और शिफा उर-रहमान के साथ-साथ दिल्ली पुलिस की दलीलें भी सुनेगी.

खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने पीठ को बताया कि दंगे होने के समय उनके मुवक्किल मौजूद नहीं थे और किसी भी गवाह ने उन्हें ‘उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा की किसी भी वास्तविक घटना’ से जोड़ने वाला बयान नहीं दिया, जहां दंगे हुए थे.

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि खालिद के पास से हिंसा या दंगों से जुड़े कोई भी भौतिक साक्ष्य बरामद नहीं हुए, साथ ही आतंकी फंडिंग जुटाने से संबंधित कोई आरोप या बरामदगी भी नहीं हुई है.

वकील और राज्यसभा सांसद सिब्बल ने पीठ से पूछा, ‘751 एफआईआर हैं. एक में तो मुझ पर भी आरोप लगाया गया है. अगर यह एक साजिश है, तो यह थोड़ा आश्चर्यजनक है, नहीं, माईलॉर्ड, क्या मैं दंगों के लिए ज़िम्मेदार हूं?’

उन्होंने यह भी बताया कि खालिद को 2022 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास में दर्ज उस एकमात्र अन्य एफआईआर, जिसमें वे नामजद थे, से भी बरी कर दिया गया था.

दंगों से कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के अमरावती में खालिद द्वारा दिए गए एक भाषण का ज़िक्र करते हुए, जिसे पुलिस ने ‘भड़काऊ’ माना है, सिब्बल ने कहा कि उनके मुवक्किल ने उस भाषण में ‘किसी भी हिंसात्मक कार्रवाई’ या दंगों के बारे में कुछ नहीं कहा था.

इस संबंध में उन्होंने बताया कि ‘भाषण, जिसमें गांधीवादी अहिंसा के सिद्धांतों का आह्वान किया गया है और भारत के संविधान का संदर्भ दिया गया है, के एक साधारण अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसे किसी भी तरह से भड़काऊ नहीं माना जा सकता.’

वहीं, इमाम की ओर से पेश हुए सिद्धार्थ दवे ने कहा कि दंगे के समय छात्र कार्यकर्ता जनवरी 2020 के एक मामले में पहले से ही हिरासत में थे.

दवे ने कहा, ‘मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूं कि मैं (इमाम) दंगों के किसी भी मामले में आरोपी नहीं हूं… मुझ पर सिर्फ़ भड़काऊ भाषण देने का आरोप है.’

उन्होंने आगे कहा कि इमाम को इन भाषणों से जुड़े कई मामलों में ज़मानत मिल चुकी है, लेकिन एफ़आईआर संख्या 59 में नहीं.

दवे ने तर्क दिया, ‘अगर माननीय सदस्य उन भाषणों को देखें, तो मुझे उनमें हिंसा से नफ़रत है.’ उन्होंने आगे कहा कि इमाम ने सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था.

इस मामले में फ़ातिमा के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से पूछा कि अगर उनके मुवक्किल को मामला दर्ज होने के छह, सात या आठ साल बाद ही ज़मानत मिलती है, तो फिर ट्रायल का क्या मतलब रह जाएगा.

सिंघवी ने कहा, ‘आज़ादी का मतलब है, आप मुझे कड़ी शर्तों पर दें, मैं कहां भागूंगी, क्या करूंगी. लेकिन आप मुझे जेल में रख रहे हैं क्योंकि आपके पास 140 संरक्षित गवाह और 900 अन्य गवाह हैं, यह किसी भी तरह का आपराधिक न्याय नहीं हो सकता.’

उन्होंने कहा कि इस मामले में ‘आपराधिक न्याय प्रणाली का पतन’ हो रहा है.

सिंघवी ने आगे कहा, ‘जहां भी मैं (फ़ातिमा) मौजूद थी, या मेरे (विरोध) स्थलों पर हिंसा से संबंधित कोई आरोप, तस्वीर, फिल्म या कुछ भी नहीं है.’

उन्होंने यह भी बताया कि उनकी मुवक्किल इस मामले में हिरासत में रहने वाली एकमात्र महिला आरोपी हैं.

दिल्ली पुलिस ने ‘भारत की संप्रभुता पर प्रहार करने की साज़िश’ का आरोप लगाया

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय में अपना हलफ़नामा दायर किया, जबकि कुछ दिन पहले ही पीठ ने दो हफ़्ते का और समय दिए जाने के उसके अनुरोध पर नकारात्मक रुख़ अपनाया था. पुलिस ने आरोपियों की ज़मानत के ख़िलाफ़ दलील दी है.

पुलिस के हलफ़नामे में आरोप लगाया गया है कि ‘याचिकाकर्ता द्वारा रची गई, पोषित और क्रियान्वित की गई साज़िश का उद्देश्य सांप्रदायिक सद्भाव को नष्ट करके देश की संप्रभुता और अखंडता पर प्रहार करना था; इसमें भीड़ को न केवल सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने के लिए उकसाना था, बल्कि उन्हें सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाना था.’

इसमें आगे कहा गया है कि ‘पिछले कुछ वर्षों में विकसित अंतरराष्ट्रीय थ्योरी ने इस प्रकार के संगठित/प्रायोजित विरोध प्रदर्शनों को ‘सत्ता परिवर्तन अभियान’ कहा है.’

पुलिस का तर्क है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (सीएए), जिसके खिलाफ आरोपियों ने दंगों से पहले विरोध प्रदर्शन किया था, को ‘शांतिपूर्ण विरोध’ के नाम पर ‘कट्टरपंथी उत्प्रेरक’ के रूप में पेश करने के लिए ‘सावधानीपूर्वक’ विषय के रूप में चुना गया था.

इसने मामले में देरी के लिए याचिकाकर्ताओं को दोषी ठहराया गया और तर्क दिया कि उनका यह दावा कि 900 से ज़्यादा गवाह हैं, एक ‘भ्रामक’ है क्योंकि दोहराए गए या तकनीकी गवाहों को छोड़ देने के बाद ‘केवल 100-150 गवाह ही अपराध साबित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे’.

दिल्ली पुलिस का मामला मुख्यतः सीएए के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान आरोपी कार्यकर्ताओं की वाट्सऐप ग्रुपों में मौजूदगी या भागीदारी पर आधारित है.

ज्ञात हो कि जेल में बंद इन कार्यकर्ताओं ने कई अपीलें दायर कीं, जिसे अदालतों ने स्थगित कर बाद में खारिज कर दिया. इसकी दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ‘न्याय का उपहास’ बताते हुए निंदा की है.

इस हिंसा की जांच में दिल्ली पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं.